पहचान

खुद से, जिंदगी से और खुशियों से

56 Posts

1749 comments

div81


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

मौन तोडिये कि हम जिन्दा है

Posted On: 19 Jul, 2014  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

35 Comments

बेबस हिंदी

Posted On: 14 Sep, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

16 Comments

“सरफरोशी की तमन्ना”

Posted On: 14 Aug, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

5 Comments

माँ तुम मेरी सहेली हो

Posted On: 9 May, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (8 votes, average: 4.75 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

34 Comments

सच का आइना

Posted On: 1 May, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 4.75 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

31 Comments

वो घर वापस न आएगा”

Posted On: 16 Mar, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

12 Comments

प्यार से जियो और जीने दो

Posted On: 6 Mar, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others मस्ती मालगाड़ी में

32 Comments

इश्क कि दास्तान है प्यारे

Posted On: 10 Feb, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 4.80 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

38 Comments

तलाश

Posted On: 4 Dec, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (8 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

44 Comments

कोई है इनका भी

Posted On: 10 Oct, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

में

31 Comments

Page 1 of 612345»...Last »

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा:

चुभने लगता है ये आक्रोश जब हम बहुत जोश के साथ निकलते है और फिर वो आवाज कब ख़ामोशी इख़्तियार कर लेती है क्यों चुप्पी साध लेते है कुछ दिनों के बाद क्या कर लोगे चौक चौराहे में जाके मोमबत्ती जला के या एक पीडिता के लिए संवेदना स्वरूप मौन प्रदर्शन करके क्यूँ नहीं प्रतिकार करते हो जब कोई मनचला छेड़ता है लड़की को क्यूँ नहीं आवाज बुलंद करते हो? जब घर में ही निकलता है घृणित मानसिकता का कोई तो क्यूँ हो जाते हो खामोश? क्यूँ ये ख़ामोशी किस लिए? ये उदासीनता अब तोड़नी होगी इसे एक आग एक आक्रोश धधकती रहनी चाहिए तब तक जब तक की खत्म न हो जाए समाज से पाशविक, विकृति मनोवृति वाले वहशी लोग लड़कियों तुम कमजोर नहीं हो तुम्हरी आत्मा को कोई छलनी कर रहा है तुम मार दो, बन जाओ अब रणचंडी दुर्गा जिसके सामने दैत्य भी हारे है … हिम्मत दिखानी होगी लड़कियों और महिलाओं को ! ठीक है , आप कह सकते हो पुरुष कहाँ गए ? लेकिन ये ऐसा मामला है जहां महिलाओं को कमान थामनी होगी , पुरुष उसके पीछे चलेगा और मुझे लगता है पुरुष इस युद्ध में महिलाओं के पीछे चलने को तैयार हैं ! उठो तो सही , चलो तो सही , बढ़ो तो सही , आवाज़ उठाओ तो सही , कब तक सरकार , पुलिस और महिला संगठनों के सहारे बैठे रहोगे ? सशक्त लेखन के साथ आपका स्वागत है दिव्या जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा:

के द्वारा: div81 div81

के द्वारा: div81 div81

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

बहुत ही मार्मिक रचना ....भारत कि सीमा पर मरने वाले जवान ..भिन्न भिन्न प्रान्तों के हैं ,भिन्न भिन्न जातियों धर्मो के हैं ,सब हम लोगों कि सुरक्षा के लिए अपना बलिदान कर दिए, शहादत को प्राप्त हुए ...पर सियासतदान सीमाओं और जातियो धर्मो के नाम पर लोगों के उकसा रहे हैं|कफन बेच के अपने घर भर रहे हैं |फेसबुक जैसे सामाजिक माध्यम पर मैंने देखा की पढ़े लिखे डॉ ,इंजिनीयर ,{कुछ इंटर्नशिप वाले भी }.....जातिगत /धार्मिक चीजों से नही उठे हैं ...लानत हैं ऐसे लोगों पर ...ये तो इसी सब में अपनी उर्जा बर्बाद कर रहे हैं ....जब कुछ अच्छा करने को होता हैं तो ...इन सब का पता नही चलता हैं ...जिनकी सुरक्षा के लिए कभी जियाउल हक तो कभी सैनिक हेमराज ने अपने सिर कटवा दिए |उनका सबका जो रक्त बहा एक जैसा था | कोई बेवा हुयी ,किसी के सिर से बाप का साया उठ गया .....कौन समझेंगा ????नौकरी या अन्य सहूलतें देने कि बड़ी बड़ी बाते ...बाद में फाईल दफ्तरों में चक्कर काटती हैं | दिव्या आप एक बहुत ही सवेंदनशील कवियत्री हैं |आपकी यह रचना ....ने मेरी आँखों में आँशु ला दिए .कुछ .दृश्य जीवंत हों गए,जो हाल में घटी ऐसी घटनाओं में देखा |

के द्वारा: ajaykr ajaykr

दिव्या जी, सादर स्नेह... आजकल के sms और इन्टरनेट के दौर मैं ख़त (चिट्ठियों) वाले दिनों के याद दिलाना और वो ही बड़ी सटीक रचना के माध्यम से, बहुत बहुत साधुवाद..... सुश्री अंजुम रहबर की एक बरी ही सुन्दर रचना है चिट्ठियों के दौर के बारे मैं.... "पड़ती रहती हूँ मैं सारी चिठ्ठियाँ| रात है और हैं तुम्हारी चिठ्ठियाँ| तुम हो मेरे पास लेकिन दुःख है ये, अब नहीं आती तुम्हारी चिठ्ठियाँ| हम नज़र आयेंगे एक एक हर्फ़ (अक्क्षर) मैं, जब जलाओगे हमारी चिठ्ठियाँ| लिख तो राखी हैं मगर भेजी नहीं, हैं अभी तक वो कुंवारी चिठ्ठियाँ| डाँटते "अंजुम" हैं मुझको घर के लोग, सबने पद ली हैं तुम्हारी चिठ्ठियाँ|" अच्छे लेखन के लिए धन्यवाद..............

के द्वारा: Himanshu Nirbhay Himanshu Nirbhay

अलाना फलाना ढीमकाना डे हो या फिर ...मुझे ये बात समझ नहीं आती कि पूरे साल भर लड़ो मरो और एक रोज डे को जा कर फूल थमा दो प्यार है तो है इसमें कोई ख़ास दिन चुन कर भावना का प्रदर्शन हो वो दिखावा ही हुआ न ………………… लीजिये मदर्स डे आ गया अम्मा आज हम बताते है आप कित्ता कुछ किये हो हमारे ख़ातिर ये लो इन सब के लिए तुच्छ सा तोहफ़ा अरे साहब क्या पूरे साल इस मिश्री मिली बोली को नहीं अपनाया जा सकता ? ? क्या पूरे साल माँ के लिए छोटी मोटी तुच्छ भेंट नहीं लायी जा सकती ???? क्या पूरे साल उनको उनके किये के लिए आभार प्रकट नहीं किया जा सकता |... बहुत अच्छा लगा पढ़ के , और अलाना फलाना से तप भारतेन्दुजी की याद दिला दी आपने .... बहुत बहुत धन्यवाद आपका इतना अच्छा लिखने के लिए ....

के द्वारा: sachinkumardixitswar sachinkumardixitswar

किसी ने इसी सन्दर्भ में लिखा की हम कुछ जानी पहिचानी शख्सियतों का नाम लेकर महिलाओं के बढ़ते कदम की ओर इशारा करते हैं और बड़े गर्व से कहते हैं की महिलाएं आगे आ रही हैं ! आ रही हैं ! सच है ! लेकिन , क्या महिलाएं सच में आगे आ रही हैं ? मैंने नहीं देखा की जब किसी बेटी या बहन की आबरू लुट रही होती है तो वो आगे आती हों ? मुझे नहीं दीखता की जब देश पर आंच आती है तो वो आगे आती हैं ? तमाशा देखते हैं हम सब ! महिला भी और पुरुष भी ! शायद मैं भी और शायद आप भी ! कल को मीरा कुमारया किसी और को महिला शक्ति के नाम पर पुरस्कार दीजियेगा , उसी समय उत्तर प्रदेश या बिहार या हरियाणा के किसी शहर में या किसी गाँव में किसी लड़की का शरीर नोचा जा रहा होगा ! पुलिस रिपोर्ट न लिखने का कह रही होगी और कोई महिला देश का चेहरा बनकर टीवी पर चमक रही होगी ! किसका महिला दिवस दिव्या जी , कैसा महिला दिवस ? चोचले हैं ये सब ! सिर्फ नॉक्रि करके ज्यादा पैसा बना लेना या बिज़नस संभाल लेना नारी शक्ति का प्रतीक नहीं हो सकता ! नारी शक्ति का प्रतीक तब होगा जब हर नारी रात के २ बजे भी अकेली अपने घर को जा सकेगी , तब कहियेगा की आज , नारी दिवस है ! तब कहियेगा की आज महिला दिवस है ! मैं us दिन खुश होकर मिठाई बाटूंगा , दिए जलाऊंगा ! तब मैं भी कहूँगा की हाँ , आज महिला दिवस है ! और तब शायद ये झूठे दिवस मनाने की या कहने की जरुरत ही न रहे !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

दिव्या विद्वान (विदुषी) हैं । उनकी बातों में दम झलकना कोई नई बात नहीं है । हमेशा ही बड़ी-बड़ी बातें बहुत सहज ढंग से कह जाती हैं । पढ़ते समय रचना अत्यन्त साधारण सी लगती है, परन्तु उसके मर्म सतसैया के दोहरों जैसे पैने होते हैं । मैं तो जानबूझ कर सबसे ऊपरी पंक्तियों को ही पकड़कर बैठ गया, क्योंकि मुझे इसवक़्त महिला दिवस पर बहस करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी । मैं किसी महिला को प्रेम की प्रतिकृति से अलग रूप में नहीं देख पाता । चाहे माँ हो, बहन हो, प्रेयसी हो, या माता रानी ही क्यों न हों । और जहाँ प्रेम भाव होगा, वहाँ सम्मान खुद ब खुद बिना बुलाए पहुँच जाएगा । प्रेम अर्थात भावनात्मक सम्बंध । अपने से किसी श्रेष्ठ के प्रति भी जब तक प्रेम और श्रद्धा का भाव नहीं पैदा होता, हम उसे हृदय से सम्मान दे ही नहीं सकते । दिखावे की बात और है, जो दूर से ही समझ में आ जाता है ।

के द्वारा:

आपके इन्कार करने भर से नहीं मान लूँगा कि आपको यह दिव्य ज्ञान मेरे ज्ञानी जी के अतिरिक्त भी कोई दे सकता है । इसकी रायल्टी तो आपको आज नहीं तो कल गुरुद्वारे पहुँचानी ही होगी । खैर, क्या ज्ञान दिया है मेरे गुरु ने । एक-एक वाक्य से मौलिकता की खुशबू आ रही है । बधाई ! सत्य है कि प्रेम किसी दिवस निर्धारण का कभी मोहताज़ नहीं हो सकता । यह एहसास तो फ़ूल में रची-बसी खुशबू की तरह तब तक फ़ूल के साथ ही चिपका रहेगा, जब तक उसका वज़ूद बरक़रार है । परन्तु एहसास को पुष्ट होने के लिये अभिव्यक्ति आवश्यक है, अन्यथा बहुत सारे अफ़ेयर्स (मामले) अनकहे रहकर ही बेमौत मर जाते हैं । यदि रूबरू होने का मौका है, तो एहसास बाँडी लैंगुएज के माध्यम से भी अभिव्यक्त किया जा सकता है । दूरी है, पत्रमित्रता है, या आज की सोशल नेटवर्किंग वाला अफ़ेयर है, फ़िर तो खुलकर किये गए इजहार के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता । जहाँ भावनात्मक लगाव होगा, वहाँ एकदूसरे को सम्मान देने के लिये भी अलग से कुछ सोचने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी, सम्मान भाव भी खुद ब खुद प्रकट होगा । अफ़ेयर (मामला) यदि व्यापारिक है, तो मुस्कुराहट और इजहार भी व्यावसायिक ही होंगे, जिसे आदान-प्रदान करने वाले दोनों ही खूब समझते हैं । कुछ अफ़ेयर 'मान न मान मैं तेरा मेहमान' वाले भी होते हैं, जिन्हें यदि भूलवश गर्दन में एक बार लटका लिया जाय, फ़िर तो पूछिये मत । आप इधर-उधर भागकर गर्दन झटकते रहिये, इस रिश्ते का मरा साँप जल्दी गर्दन छोड़ने के लिये तैयार ही नहीं होता । यह सारा ज्ञान मुझे मेरे गुरुदेव परम ज्ञानी जी महाराज ने ही दिया है, जिसे मैं एक थीसिस के रूप में एसेम्बुल कर बहुत शीघ्र ही आप सभी मित्रों के समक्ष प्रस्तुत करने वाला हूँ ।

के द्वारा:

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

आदरणीय दिव्या दीदी, सादर प्रणाम इस दुनिया में यूँ तो इंसान कई रोगों से ग्रसित है किन्तु वास्तव में जो रोग इंसान के साथ आजकल इंसानियत को भी खाती जा रही है वो है बुढापे का रोग............इंसान अक्सर दुनिया की मौलिक तथ्यों को भूल जाता है की कभी उसे भी ऐसे दिन देखने पड़ेंगे...................मैंने भी लिखा था "वो चल रहा".........किन्तु आपकी लेखनी के आगे कहीं नहीं ठहरती ............फिर भी जो भी हो मैं अपने आप में गौरवान्वित हूँ ऐसे मुद्दे को उठाने के लिए.....और आपको न सिर्फ बधाई देता हूँ बल्कि धन्यवाद भी कहना चाहूँगा एक सफल रचना के लिए.....सम्वेदना से भरी हुई एक पूर्ण रचना जो की आपके विशाल ह्रदय को दर्शाती है........................लिखते रहें........ वैसे आपके जानकारी के लिए बतला दूँ की आपके रचना को सबसे पहले शायद मैंने ही पढ़ा था और पञ्च में पांच वोट दे आपको पूर्ण बहुमत दिया था...............फिर भी कमेन्ट देर से देने के लिए क्षमा

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

दिव्या जी, गुवाहाटी की घटना सभ्य कहे जाने वाले समाज के मुँह पर करारा चाँटा है....क्या हमारा समाज इतना नीचे गिर गया है कि उसकी नजर में महिलाओं के लिये कोई इज्जत नही रही.....भीड का हिस्सा गलत काम रोकने के लिये बनना चाहिये ना कि गलत काम में साथ देने के लिये......इस घटना के लिये जिम्मेदार कौन है, निश्चित ही ये समाज जो आने वाली पीढीओं को सही रास्ता नही दिखा पा रही है.....हम सभी भी इस समाज का एक हिस्सा है, बद्लाव जरुरी है और बद्लाव की शुरुआत हमें अपने आप से, अपने घर से और अपने आस-पास से करनी होगी........ दिव्या जी, समय की कमी के कारण पहले हम आपका ये लेख नही पढ पाये थे, बहुत ही अच्छा लिखा आपने, आपको ढेर सारी बधाइयाँ......

के द्वारा: Dr. Aditi Kailash Dr. Aditi Kailash

बहुत खूब दिव्या, "आग जलनी चाहिए" आपके लेख से ऐसी ही आग शोला बनकर उबल रही है ,आपने आज औरतों ,लड़कियों ,मासूम बच्चियों पर जो जुल्म हो रहा है उसका सही चित्रण किया है और सही मायनो में आज के माँ गांधारी और बाप धिर्त्राष्ट्र ही बने दिखाई एते हैं क्यूंकि जैसी घटनाएँ रोज घटित हो रही है उससे यही समझ में आता है आखिर क्या बात है, उन हैवान युवाओं एवं लाचार युवतियों दोनों को जन्म देने वाली माँ ही है जो एक नारी ही होती है आखिर ये दुष्ट लोग क्यूँ कर पैदा हो रहे हैं? उस माँ की कोख से , जहाँ तक मैं समझ सकता हूँ यह सारा दोष हमारे देश की सिक्छा में आया गिरावट का है स्कूलों में भी अब चरित्र निर्माण पर कोई ध्यान नहीं हम इंजिनीअर , मनेजर वैज्ञानिक तो बना रहे हैं पर एक अच्छा इन्सान कोई बने इसकी पढाई जीरो है फिर तो ऐसी मानसिकता के लोग की हिन् बहुतायत होगी और बुरी ख़बरों को मिडिया भी खूब तेजी से और ज्यादा करके दिखाता है जिससे लोगों में नफरत का माहौल ही बनता है आज के समाज में मुझे नहीं लगता औरते इतनी मजबूर हैं उनको भी सामान अधिकार देने की बात हमारी सर्कार भी कर रही है और आज हर छेत्र में लडकिया अव्वल आ भी रही हैं पर अफ़सोस महिलाएं ही महिलाओं की मदद नहीं कर रही है समाज के इस पहलु पर भी विचार करने की जरुरत है वर्ना यहाँ तो नवरात्रे में कंजका खिलाने को लोग कन्याओं को ढूंढते फिरते हैं उनकी पूजा करते हैं फिर उसे प्रेम से भोजन कराते हैं समाज का यह दृश्य और फिर गोहाटी जैसी घटना ये दोनों तो समाज के लोग ही तो कर रहे हैं क्या कहियेगा इस समाज को अतः लड़कियों को अपनी सुरक्छा कैसे की जाये इसके लिए और मजबूत बन्ने की जरुरत है जुडो कराटे सिखने की जरुरत है और इतना बलवान और साहसी बन्ने की जरुरत है की एक लड़की दस लड़के पर भारी पड़े वर्ना दरिन्दे तो यूँ ही दरिंदगी करते रहेंगे क्यूंकि उनको अपना कानून कोई सजा भी तो नहीं दिलवा पता पुलिस उन अपराधियों को पकडती भी है तो वे जमानत पर छूट जाते हैं जब तक ऐसे गुनाहगारों को सख्त से सख्त सजा नहीं मिलती ऐसे अपराध रोज दुहराए जायेंगे क्यूंकि दरिंदो की नजर में कोई माँ नहीं कोई बहन नहीं होती .

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

समाज कहाँ और पतन की किस गर्त में चला जा रहा है ! यह सिलसिला कबतक चलेगा ? क्या कहीं इसका अंत है ? या फिर यह अंतहीन है ? इसका जवाब किसके पास है और कौन उत्तरदायी है ? यह सुनिश्चित करना पडेगा | जिनको उत्तर देना है वे कहीं अन्यत्र व्यस्त हैं , इस बात की उन्हें कोई चिंता नहीं ! ऐसे में मुझे दुष्यंत कुमार की निम्न पंक्तियाँ याद आती हैं .. कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं | गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं || अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ! ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं!! दिव्या जी, मैं आप को धन्यवाद देता हूँ कि आप ने ऐसी गंभीर और ज्वलंत समस्या को अपनी धारदार लेखिनी के माध्यम से पाठकों के सामने रखा है | पुनश्च ......बेस्ट ब्लौगर बनने पर अतिरिक्त बधाई !!

के द्वारा: Acharya Vijay Gunjan Acharya Vijay Gunjan

आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार .... सादर अभिवादन ! दिव्या बहिन ने इस मंच पर “दंश” नामक शीर्षक के तहत अपनी एक रचना 29 june -2012 को पोस्ट की थी ..... अभी कल के अखबार में ही पढ़ा था की सरकार ने लड़कियों पर तेजाब फेंकने वालों के लिए सजा को बढ़ा कर दस लाख का जुर्माना तथा दस साल की सजा तक कर दिया है .... अक्सर ही हम अखबारों में देखा करते है की समाचारपत्र द्वारा “IMPECT” शीर्षक के तहत अपनी पुराणी खबर और प्रशासन द्वारा उस पर कार्यवाही को बतलाया और दिखलाया जाता है चित्रों के माध्यम से .... आपसे प्रार्थना है की अगर किसी ब्लागर के लेख के बाद सयोंगवश ही अगर कुछ इस तरह से होता है तो उसका उत्साहवर्धन भी आपको करना चाहिए ..... जागरण पर मैं इसके शुरूआती दिनों से हूँ .... इस विषय पर शायद ही कोई दूसरी कविता इस मंच पर पहले इस तरह से लिखी गई होगी ..... आपका इस दिशा में उठाया गया कोई भी कदम इस गरिमामय मंच की गरिमा + स्तर तथा इसकी विश्वसनीयता को आसमान की बुलंदियो तक पहुंचा देगा , जिसकी की हम सभी कामना भी करते है ..... एक सकारात्मक और सार्थक पहल की आशा में अग्रिम आभार सहित

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरनीय दिव्या जी,सादर प्रणाम | गुवाहाटी की घटना सभ्य समाज के मुख पर कालिख हैं |ऐसी ना जाने कितनी घटनाये हमारे देश में रोजाना होती हैं ,उन्हें राष्ट्रीय शर्म तक घोषित किया जाता हैं पर उनके रोकने का कोई उपाय नही सुझाया जाता |भांड मीडिया ,अश्लील फूहड़ फिल्मे ,गंदे डायलाग ,युवा पीढ़ी की मानसिकता को पंगु बना रहें हैं ,यहाँ कोई सरकारी रोक टोक नही हैं टी वी पर आती अडल्ट फिल्मे ,केबिन दार कैफे ,बिना नियम कानून के चलते हैं .......मेरा उद्देश्य किसी पर कीचड उछालना नही हैं ...................... रिमोट सदैव अपने हाथ में हैं ......जिंदगी में हर चीज का चुनाव करतें हैं हम लोग ...... चाहे तो बुद्धू बक्सा देखें या ना देखे अपना चुनाव हैं | चोरी हत्या बलात्कार से भरे सुबह के अखबार पढ़ना ना पढ़ना अपने हाथ में हैं ,विशेष करके सुबह ,जब हमारा दिन को प्रोग्राम करने का वक्त होता हैं ....... मानव मस्तिष्क की प्रोग्रम्मिंग हम करना ही भूल गए हैं ,टीवी से लोग ट्यूसन लेते हैं ,अश्लीलता को फैशन कहते हैं ,,,,,,हमारा मस्तिष्क दूसरों के इशारे पर चलता हैं | जरूरत हैं खुद को और apne बच्चों को बचपन सही शिक्षा देने की,उन्हें बनाने की जरूरत होती हैं ,बच्चे पैदा नही होते उन्हें बनाना होता हैं [मैं खुद डॉ हूँ ,इसी आधार पर कह रहा हूँ] इस समाज में किसी लड़की से बलात्कार होता हैं तो उसे समाज में जीने नही दिया जाता ,पीडिता /पीडिता कह के सब अपना उसका मानसिक बलात्कार करते हैं |सबसे बड़ी सामाजिक गलत मानसिकता हैं ये ...............यौन अंगों की शुचिता सिर्फ महिलाओ तक ही क्यूँ जब की इसमें कोई अपूरणीय क्षति नही होती ,महिलाओं ने अपनी पसंद से हमेशा यौन सम्बन्ध बनाये हैं .....और कभी कभी अपनी मर्जी के खिलाफ पति के लिए भी.......

के द्वारा: ajaykr ajaykr

दिव्याजी, हम उसी समाज में जी रहे हैं जिसका निर्माण हमने किया ........ ! आखिर कब हमने समाज में आ रही गिरावट के लिए एकजूट हो कदम उठाये ....... कब हमने आधुनिक शिक्षा के साथ साथ नैतिक शिक्षा पर बल दिया, कब हमने पडोसी पर आये संकट को अपना समझा.......! सब अपने स्वार्थ के वशीभूत काम को महत्त्व देते रहे .......... स्त्रियों ने कभी भी वास्तविकता के आधार पर कभी एकजुट हो आवाज उठाई, जितने भी नारी संगठन हैं क्या केवल वो दिखावा मात्र नहीं हैं क्या वास्तव में उन्हें नारियों का समर्थन मिला ........ ! नारियों ने केवल उस संकट को संकट समझा जो उस पर स्वयं पर आया, दूसरी औरत पर आये संकट के लिए कभी किसी ने आवाज उठाई और यदि उठाई भी तो क्या उसको समर्थन मिला .......... हमारे समाज में दामिनी जैसी केवल फिल्में ही बनतीं हैं परन्तु एक भी दामिनी नहीं मिलती क्यों ..........? वास्तव में, इसमें दोष स्त्री या पुरुष होने का नहीं है दोष है हमारे चारित्रिक और नैतिक पतन का हमारे निजी स्वार्थों ........... आप स्वयम आकलन कीजिये की आप और हम समाज के लिए क्या प्रतिदिन एक घंटा भी देते हैं यदि नहीं तो क्या केवल सभ्य होने या न होने का केवल आरोप लगाने के लिए हम नींद से जागे हैं.........! आपका तो मुझे पता नहीं लेकिन इन सब घटनाओं का आकलन १९९३ में जब ग्लोबलाइजेशन की शुरुआत हुई थी तो देश के कुछ सामाजिक संगठनों ने की थी और उस समय आन्दोलन भी चलाया था इसके दुष्परिणामों को लेकर पर समाज तब उन्हें पिछड़ी सोच वाला ........ दकियानूसी कहता रहा और किसी ने भी उसी समय आने वाले संस्कृति के पतन पर ध्यान नहीं दिया ............ ! अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है बस हम सबको अपने बंद कमरों से बाहर निकल एकजुट होकर समाज कल्याण के लिए आवाज उठानी होगी......... अन्यथा आप भी लिखती रहिये मैं भी लिखता रहूँगा और ये वहशियाना घटनाएं भी घटती रहेंगी........

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: div81 div81

आदरणीय भ्रमर जी, सादर प्रणाम !! बिलकुल किया है ऐसे लोगो का विरोध और साथ भी दिया है | विरोध करना बहुत जरुरी है सिर्फ एक का नहीं सभी लोगो को मिल कर विरोध करने की जरूरत है | मैं इस बात का समर्थन नहीं कर रही हूँ की बार से निकली वो लड़की सही थी मगर इस बात का हक किसने दिया है की उसके साथ बतमीजी करी जाए छेड़छाड़ करी जाए | और दूसरी बात, रात में बार से निकलना उसकी गलती थी तो यहाँ दिन के उजाले में साडी, सूट पहने लड़कियों के साथ बच्चियों और बूढी महिलाओ के साथ बतामिजियाँ और छेड़छाड़ होती है उसके लिए कसूर वार किसे ठहराया जायेगा | | इस घटना के पीछे हमारे पूरे समाज की गलती है जो घटिया पब्लिसिटी चाहती है, सस्ती लोकप्रियता चाहती है और विकास के नाम पर पश्चिम का अन्धानुकरण हो रहा है वो भी गलत है इसी लिए कहा की परिवार से ही अपने आदर्शो और मूल्यों को सिखने की आवश्यकता है | आप का तहे दिल से शुक्रिया

के द्वारा: div81 div81

के द्वारा: div81 div81

के द्वारा: div81 div81

के द्वारा: div81 div81

के द्वारा: div81 div81

के द्वारा: div81 div81

मैं यहाँ पर आप को आदरनीय निशा जी के ब्लॉग की चंद लाइन पेस्ट कर रही हूँ उम्मीद है आप उन पंक्तियों को गहराई से समझेंगे नारी पूर्ण सुरक्षित तो शायद कभी भी नहीं रही उसका अपमान तो हमेशा ही हुआ है,उसको उपभोग की वस्तु सदा ही माना गया है, उसकी शारीरिक संरचना सदा शत्रु बनी रही. इसके प्रमाण उपलब्ध हैं,हमारे पौराणिक ग्रंथों में जब धोखे से नारियों का अपहरण हुआ या शील हरण हुआ ,ऐतिहासिक वृतांतों में नारियों का अपहरण,राजाओं के रनिवासों में सुन्दर नारियों का संग्रह मानों अलमारियों में सुन्दर वस्त्र सजा कर रखे गये हों,सुन्दर नारियों को प्राप्त करने के लिए राज्यों को बर्बाद कर देना,आदि..ये प्रवृत्ति बढ़ती गयी मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन के बाद.जब मुस्लिम आक्रमणकारियों ऩे धन सम्पत्ति ,मंदिरों को तोडना और स्त्रियों को लूट कर अपने हरम की शोभा बनाया.आक्रमणकारियों ऩे तो चाहे वो मुस्लिम रहे हों,पुर्तगाली,या फिर ब्रिटिश सभी इन कुत्सित कार्यों में संलिप्त रह कर नारी को सदा अपमानित किया. urat ne janam diya mardo ko mardo ne use bazar दिया.................... निशा जी की पोस्ट का लिंक दे रही हूँ पढ़िएगा गौर से ........................... http://nishamittal.jagranjunction.com/2012/07/17/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A4/#comments

के द्वारा: div81 div81

दिव्या बहिन ..... सादर अभिवादन ! मैं भी आदरणीय विनीता जी की नीचे कही बातों से अपनी सहमति रखता हूँ ..... लेकिन साथ में यह भी जोड़ना चाहूँगा की इसमें आपकी व्यथित आत्मा की पीड़ा मानसिक उथल पुथल साफ़ दिखाई दे रही थी ..... मैंने भी अनेको ऐसे लेख लिखे है जिनको लिखते समय दिमाग में दर्द तक सहा है यह भी कैसा अजीब इत्तेफाक है की ऐसी मानसिक अवस्था में लिखे गए सारे ही लेख फीचर्ड भी हुए जिनको की सिर्फ वन सीटिंग में लिखा ..... यह लेख वाकई में इस सन्मान का हकदार है मेरी तरफ से भी ढेरों मुबारकबाद मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी+ जय हो मुनिश्री तरुण सागर जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

दिव्या जी सार्थक आलेख एक एक घटनाओ को दिखाती हुयी मानसिक रोगियों के करतूतों को उजागर करती हुयी जैसा की आप ने सब कुछ करते हुए देखा जरुर विरोध तो किया ही होगा अगर आप ने किया होगा तो इसी तरह से लोग भी यदा कदा विरोध तो करते रहते हैं लेकिन जमावड़ा देख चुपके से लोग निकल जाना भी पसंद करते है क्योंकि एकता नहीं बन पाती एक मार खाए बाकी तमाशा देखें सब तो मीडिया वाले भी नहीं की जो भी मरे जिए केवल फोटो उतारो और चैनेल की रेटिंग बढाओ बचाओ नहीं बहुत सी बाते हैं जहाँ हम सब की आप की सब की कमी है हाथ जोड़ कर चलना होगा ..... एक बात और जो आप ने लिखा की लोग लड़की की ये कमी वो कमी निकाल देंगे जरुर कमी निकलती है अपना समाज अभी यूरोप नहीं बना बहुत समय लगेगा उस तरह की मानसिकता लाने में न माने तो लोग बाद में पछताते हैं मानसिकता बदलती है कानून का राज होता है कड़ी सजा होती है तब जा के कुछ स्थिति नियंत्रण में आती है ..इस लिहाज से रात में नाईट क्लब अकेले प्रश्न तो उठता ही है .... मै बुराई का कतई समर्थक नहीं और वे जानवर से भी बदतर हैं जिन्होंने ये घृणित कार्य किया उन्हें आजीवन कारावास या फांसी जो भी हो कम है ..... बधाई आप को बेस्ट ब्लागर ऑफ द वीक चुने जाने पर... भ्रमर ५

के द्वारा:

के द्वारा:

अभी पिछले हफ्ते ही अपनी कविता दंश पोस्ट करी थी | जिसको पढ़ के अधिकतर माननीय ब्लोगर्स का मशवरा था लड़किया इक्कीसवी सदी की है कब तक डर कर और चुप रहोगी | खामोश बैठ जाना ऐसी घृणित मानसिकता के लोगो को बढ़ावा देना होगा | ये भी कहा गया कि चूँकि हम विरोध नहीं करते है तो इनका हौसला बढ़ता है | धृतराष्ट और गांधारी बनाना छोड़ना होगा की हमारा पिता पति बेटा ऐसा नहीं कर सकता, सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों औरतों का सम्मान करना आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है | स्नेही दिव्या जी,  सादर आपका लेख एवं नीचे प्रतिक्रियाएं पढ़ीं.  समाज के विकृत रूप का चित्रण वास्तविक है जिसे आपने खूबसूरत ढंग से प्रस्तुत किया है.  कारण कोई भी हों समाज में चारित्रिक पतन बहुत तेजी से हुआ है.  अपनी रक्षा स्वयं को ही करनी होगी. साथ ही लोगों को काफी सशक्त भूमिका निभानी होगी.  क्रष्ण का आना बहुत जरूरी है पर आज के समय के क्रष्ण आयेंगे जरूर पर क्या वे उस काल के क्रष्ण होंगे. शस्त्र शिक्षा. जूडो , कराटे एवं अन्य आधुनिक मूर्छा हथियार की आवश्यकता है. समाज में जाग्रति लानी होगी जब ऐसा अपराध घटित हो रहा हो तो लोग मूक दर्शक न रह कर संघर्ष करें. पुलिस पेट्रोलिंग जरूरी है.  रचना के साथ साथ आपको सम्मान मिला. मुझे अति प्रसन्नता है. बधाई. 

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

मोहिंदर कुमार जी, सादर बहुत दुःख हुआ ये जान कर की आप इस विषय को तिल का ताड़ बोल रहे है आये दिन होने वाली समयस्या जो कि विकराल रूप लेती जा रही है अब नहीं संभलेंगे तो कब संभलेंगे हम | मेरे भाई इंडियन आर्मी में है और जब कारगिल युद्ध हुआ था उस वक्त हमें पता है क्या बीत रही थी पुरे परिवार पर कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिको को भी मजाक बना कर रख दिया है हमारे नेताओ ने आप कारगिल शहीदों के विषय में अधिक पढ़ना चाहते सुनना चाहते है तो जा कर उन परिवारों से मिल कर आइयेगा जिनका बेटा शहीद हुआ है | उन शहीदों की आत्मा भी रोती होगी देख के यहाँ का हाल कि बाहरी दुश्मनों से तो हम लड़ कर वीरगति को प्राप्त हो गए मगर देश में रहने वाले क्या कर रहे है अपने देश का हाल वो नौजवान तो देश की लिए मर मिट जाते है और देश के अंदर ही जो अमानवीयता हो रही है उसके लिए आप क्या कर रहे है किसी सर्थक मुद्दे को भी आप तिल का ताड़ बोल रहे है | पहनावे और आचरण को दोष दे रहे है आप यहाँ पर सूट साडी पर्दे में रहने वाली महिलाये भी सुरक्षित नहीं रात में तो क्या यहाँ दिन के उजाले में भी महिलाये सुरक्षित नहीं है न बहार न घर के अंदर | जेजे मंच में आप को सार्थक मुद्दों पर ही पढ़ने को मिलेगा अगर आप को लगता है की तिल का ताड़ है तो माफ़ी चाहूंगी मगर आप को यहाँ पर ये ही पढ़ने को मिलेगा | प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार

के द्वारा: div81 div81

दिव्या जी, इस विष्य पर इतना पढ लिया और देख लिया कि अब लगता है हमारी मानसिकता किसी भी विषय को तिल से ताड बनाने की बन गई है... इतना तो किसी शहीद के बारे में भी नहीं लिखा जाता और न ही मिडिया में देखा जाता. है.. अधिक से अधिक एक दिन और बस. घटना तो घट चुकी है और देखना यह है कि अपराधियॊ को क्या सजा मिलती है और क्या क्या बातें ऐसी घटना को दौबारा होने से रोक सकते हैं. इसके लिये रात को किसी का भी देर तक वाहर रहना उचित नहीं... चाहे वो लडका हो या लडकी. पहनावे और आचरण का भी इसमे काफ़ी हद तक रोल है. हम न जाने क्यों एक घटना को अन्य घटनाओं के साथ मिला कर देखने लगते हैं. और किसी निर्णय पर पंहुचने से ज्यादा उसे उलझा कर एक डिवेट बना देते हैं.

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

दिव्या जी, आपने जो लिखा है वह पूर्ण रूप से सत्य है... "आप साड़ी में हो या सूट में हो या पूरी तरह से पर्दे से ढकी हो गंदी मानसिकता के लोग आप को बिना छुए ही चीर- हरण कर सकते है | यहाँ पर जब तक पांडव अपनी पत्नी को दाव में लगाते रहेंगे तब तक ऐसे दु:शासन ज़िन्दा रहेंगे | यहाँ जब तक पिता धृतराष्ट्र की तरह रहेंगे तब तक दु:शासन चीरहरण करते रहेंगे यहाँ जब तक माताएँ गांधारी बनी रहेगी तब तक दु:शासन जैसे पुत्र से समाज की हर एक लड़की इनकी गंदी नियत से बची नहीं रहेगी | दोष तो पूरे समाज का ही है जो धृतराष्ट बना हुआ है |" आधुनिक समय से समाज में ऐसी घटनाएं दिन-बदिन बढती चली जा रही हैं...टेलिविज़न, इंटरनेट, मोबाइल, फिल्मे सब के सब कहीं न कहीं ऐसी घटिया सामग्री पेश कर रहे हैं जिससे छोटे-छोटे बच्चे ही नहीं बड़े-बड़े अक्लमंद लोगों की सोंच और उनकी मानसिकता कुंठित होती चली जा रही है वे सही-गलत के चक्कर में न पड़कर बस अपनी छणिक वासना को किसी तरह से तृप्त कर लेना चाहते हैं और jab सामाजिक बन्धनों के चलते वे ऐसा नहीं कर पाते तो कुछ लड़कियों-औरतों के कपड़ों और उनके चरित्र पर उंगलियाँ उठाते हुए अपनी छिछोरी हरकतों को अंजाम देते हैं और स्वयं को समाज में फैलती हुयी अश्लीलता को ख़त्म करने का ठेकेदार बतलाने लगते हैं....जिस तरह से अश्लीलता का कारोबार फैलता चला जा रहा है वह बहुत ही भयावह हो चूका है आज लडकियां अपने ही घरों की चारदीवारी के अन्दर पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं...इसके बहुत से कारण हैं और इसे फैलाने वाले उद्योगपतियों को तथा सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि उन्हें इन सब से बहुत मोटा मुनाफा होता है...कोई भी अपना कर्त्तव्य सही से नहीं निभा रहा है...सामान्य जनता भी आधुनिकता के नाम पर ऐसी चीज़ें स्वीकार करती चली जा रही है जो स्वयं उसके परिवार और समाज के लिए बहुत घातक है...इसका आज से ही पुरजोर विरोध करना होगा हमें और आपको वर्ना न जाने इसकी भेंट कितनी मासूम लड़कियां, बच्चियां और औरतें हो जाएँ....

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

दिव्या बहन, यह सब घटनाएँ हमारे कमजोर कानून व्यवस्था के कारण हो रही है| मैं यहाँ पर एक उदाहरण दे रही हूँ, आयरलैंड में रात के एक बजे एक बीस वर्षीय युवती शराब के नशे में सडक के किनारे पड़ी थी| उसके आस पास से लोग आ जा रहे थे पर कोई उसका फायदा उठाने की कोशिश नहीं कर रहा था | और ये वहां आम बात है | क्योंकि वहां का कानून महिलाओं की अस्मिता को लेकर बहुत सख्त है| हमारे यहाँ के कानून को हम एक अरसे से देखते आ रहे हैं और इस संदर्भ में भी जल्दी ही हम लोगों को पता लग जायेगा की कितने लोगों को इस घटना में सजा हुई कितने लोग कमजोर कानून का सहारा लेकर छुट गये| एक बात और पहले यदि कोई युवक ऐसी घटना में लिप्त पाया जाता था तो उसका परिवार ही उसका बहिष्कार कर देता था| आज अगर अपने घर का कोई युवक ऐसा अपराध करें तो हम उसे थोडा-सा डांटकर उसे बचाने का प्रयास करना शुरू कर देते हैं| तो आप समझ ही सकती हैं, जब ऐसे युवको को परिवार का सहारा हैं| कानून का सहारा हैं, तो समाज में नारी का स्थान कहाँ पर है|

के द्वारा:

आदरणीय दिव्या जी, सादर ! ऐसी घटनाएं दिल हिला देती हैं ! आक्रोश बढ़ा देती हैं ! पर एक बात की विवेचना की जानी चाहिए की क्या इसके पहले तमाम पुरुष सभ्य थे ! सदाचारी थे ! तो कलतक जो सभ्य थे, सदाचारी थे वे एकाएक बलात्कारी कैसे हो गए ? क्या वजह है, ऐसी घटनाओं में वृद्धि की ? ऐसा क्या हो गया इन कुछ वर्षों में जो स्थितियां इतनी भयावह हो गईं ? क्या आज के लड़के पागल हो गए हैं ? या उनकी मानसिक स्थिति अचानक ही विकृत हो गई है ? क्या कोई खतरनाक वायरस फैल गया है समाज में ? आखिर क्या हो गया है ? कौन से ऐसे परिवर्तन हुए हैं जिनका यह दुष्प्रभाव है ? इन कारणों का विश्लेषण करना होगा, निष्पक्ष रूप से ! इस घातक बिमारी की जड़ क्या है, क्यों पिछले कुछ वर्षों से ऐसी घटनाएं बढ़ गईं ? क्यों पुरुष वर्ग इतना लोलुप हो गया ! क्यों स्त्रियाँ पुरुषों के आगे दीन बनी हुई हैं ? क्यों नहीं वे ऐसे लोगों को सबक सिखा रहीं ? तमाम कर्मक्षेत्र में पुरुषों की बराबरी कर रही स्त्रियाँ, इस क्षेत्र में पीछे क्यों हैं ? ऐसी घटनाओं के समय महिलायें ही महिलाओं का साथ क्यों नहीं देतीं ? इन सब प्रश्नों पर भी विचार होना चाहिए ? इन बातों का विश्लेषण होना चाहिए ? सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

नमस्कार दिव्या जी, गोवाहाटी मैं हो हुआ वह बहुत ही शर्मनाक हादसा है, हालाँकि इसमें गौर करने वाली बात ये है की दोषी लोग चिन्हित किये गए हैं, और जिस प्रकार से इस मामले को गंभीरता से लिया गया लगता है दोषियों के विरुध कड़ी कार्यवाही होगी ! रही बात मानसिकता की तो मनुष्य मैं एक पाशविक गुण सदा रहा है और ऐसी मानसिकता के लोगों मैं ये पाशविक गुण अकेली लड़की को देखकर जागृत हो जाता है, जिसे रोक पाना सदियों से संभव नहीं हो पाया है, ये मानसिकता इतनी आसानी से बदलने वाली नहीं है, हाँ कानून को थोडा शख्त बनाया जा सकता है और दोषियों को दण्डित कर ऐसी विकृत मानसिकता के लोगो के सामने नजीर पेश की जानी चाहिए जिससे भविष्य मैं ऐसा करते समय उन्हें इस बात का कुछ भान हो की वे क्या कर रहे हैं !

के द्वारा: allrounder allrounder

दिव्या जी घिनौने चेहरे का इंसान कभी सभ्य नहीं हो सकता.... अभी कुछ दिनों पहले इस so called सभ्य मंच पर भी एक छोटी सी बात का बतंगड़ बना था.... यहाँ तो सभी पढ़े लिखे विद्वान् सम्मानित लोग हैं (i do not know they are in real or not)...जब यहाँ ऐसा हो सकता है तो guawahati में क्यों नहीं हो सकता.... आप किसी के बोलने की बात करती हैं.... मैंने यहाँ पर भी देखा कि लड़कियां, महिलायें भी खूब बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहीं थी.... तो फिर पुरुषों पर तो भरोसा किया ही नहीं जा सकता....!! उस लड़की को बचाने कोई आगे नहीं आया कोई बड़ी बात नहीं है ये.... कायरों की जमात में हिम्मतवाले नहीं मिलते.....!! और बात छोटी हो या बड़ी गलती तो हमेशा लड़की की ही निकाली जाती है.... !! जब तक इन so called मर्दों पर dependency ख़तम नहीं होगी ये सब नहीं रुकने वाला.... मैं तो कहूँगी ऐसे वाहियात लोगो को सजा खुद उस लड़की को देनी चाहिए.... On the spot...!! कानून सरकार..... सब बकवास है....!! भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है.... !!

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

आदरणीय अजय जी, सादर प्रणाम आप ने भी शायद ध्यान से नहीं पढ़ा मैंने पुरुष समाज को कटघरे में नहीं खड़ा किया है | अंत की लाइन को ध्यान से पढ़ा गया होता तो शायद आप ये नहीं कहते धृतराष्ट और गांधारी बनाना छोड़ना होगा की हमारा पिता पति बेटा ऐसा नहीं कर सकता सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों औरतों का सम्मान करना आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है | बिलकुल भोगवाद के कारण स्थिति बत से बत्तर होती जा रही है | पूरी सामाजिक व्यवस्था को बदलने की जरूरत है, पारिवारिक, सामाजिक क़ानूनी रूप से परिवर्तन की जरूरत है | आपने अपना कीमती समय इस लेख को दिया आप का आभार सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

के द्वारा: div81 div81

आदरणीया दिव्या जी सादर नमस्कार जी हाँ...अब हमारे समाज में दानव राज ही है और कुछ भी नहीं बदलने वाला . जब महाभारत काल से ऐसा ही होता चला आ रहा है तो ऐसा कैसे सोचा जा सकता है कि अचानक से हमारे समाज में परिवर्तन हो जायेगा. पहले एक-दो दु:शासन थे अब तो बहुतेरे दु:शासन हैं..... पहले लोगों में कुछ शर्म-हया भी थी आज तो इंसान अपना सब कुछ भूलता जा रहा है. उसके अंदर का डर ही समाप्त होता जा रहा है. वह मानसिक रूप से और भी अधिक विकृत होता जा रहा है. हमारा समाज भोगवाद की ओर बढ़ रहा ओर निरंतर ही बढ़ता जा रहा... कैसे उम्मीद किया जाये कि घृणित सोच में परिवर्तन होगा....यह मेरी नकारात्मकता नहीं है, यह आज की वास्तविकता है.... सिर्फ पुरुष वर्ग को दोष दे कर इस तरह की घटनाओं की निंदा करके पल्ला झाड लिया जाये यह उचित भी नहीं है. क्या एक पिता..एक भाई...पुरुष नहीं है...क्या वह चाहेगा कि उसके घर की बहन-बेटियों के साथ ऐसा ही कुछ होने पाए.... जो लोग ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं ना तो उनके लिए कोई माँ होती है..ना ही कोई बहन होती है..ना ही बेटी...उनके पूरे परिवार के संस्कार ही ऐसे होते हैं...जहाँ उनके घर के पुरुष परायी स्त्रियों के साथ अभद्रता करते हैं और उनके घर की स्त्रियां पराये पुरुषों के साथ......यहाँ तक अपने घर के लोगों के साथ, अपने रिश्तेदारों के साथ भी ऐसा करने से बाज़ नहीं आते.... यहाँ मैं आदरणीया सरिता जी की बातों से सहमत हूँ.... जंगली जानवर अगर खुले में घूमने लगते हैं तो लोग उनसे बच के घरों में कुछ दिन भले छिप जायें लेकिन आखिरकार तो उन्हें मारना ही पड़ता है . स्थायी उपचार बचने में नहीं बल्कि उन्मूलन में है … अब वह जानवर चाहे पुरुष रूप में हो या स्त्री रूप में..... काफी आक्रोश है आपके अंदर...आज यह रूप भी देखने को मिला... आभार....

के द्वारा: Ajay Kumar Dubey Ajay Kumar Dubey

आदरणीय अशोक रक्तले जी, सादर प्रणाम माफ़ी चाहूंगी मैंने तो दिल की बात कही थी और वो आप को भाषण लगा और वो भी लंबा (अक्सर लंबे भाषण उबाऊ होते है जिनको कि हम सरसरी नजर से पढते है या सुनते है ) तो मुझे भी ऐसा ही लगा आपने मेरे लेख को ध्यान से नहीं पढ़ा अब वो लंबा था तो हो सकता है छूट गया हो जो लेख में कहा है उसी लाइन को दोहरा रही हूँ ........वो लड़की रात को निकली थी पब से तो क्या दिन के उजास में लड़कियों को बक्स दिया जाता है ?????????????????? लड़कियां सुरक्षित कहाँ है यहाँ पर | कहीं सगा सम्बन्धी ही बुरी नियत रखता है लड़की पर और मौका मिलने में जाहिर भी कर देता है अपनी कामलोलुप नज़रों से, शरीर को सहलाते गंदे और लिजलिजा स्पर्श से जतला देते है कि लड़की होना दोष है तुम्हारा | बसों में सफ़र करते समय पुरुषों द्वारा छेड़खानी, अश्लील फ़ब्तियाँ और शीलहनन की कोशिशें महिलाओं के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है। स्कूल, कॉलेज, रास्तों में ऑफिस में, सिनेमाहाल में ट्रेन, बस टेम्पो ओटो कहीं भी तो सुरक्षा की गारंटी नहीं देता ये समाज लड़कियों को | मैं समाज को कोस नहीं रही हूँ मैं भी चाहती हूँ बदलाव हो .............. और एहतियात बरतने कि जरूरत है बिलकुल है | नवाज देवबंदी का शेर याद आ रहा है: 'बद नजर उठने ही वाली थी किसी की जानिब लेकिन, अपनी बेटी का ख्याल आया तो दिल कांप गया।' माफ़ी चाहूंगी अगर कोई बात बुरी लगी हो तो

के द्वारा: div81 div81

दिव्या जी सादर नमस्कार, आपने भाषण तो बहुत लंबा झाड दिया किन्तु बताएं की क्या समाज का यह घिनौना चेहरा क्या एक दिन में ही बन गया? आपने खुद एक लम्बी सी फेहरिस्त बनाकर लिखा है की हर दिन ऐसी घटनाएं हो रही हैं. फिर क्या कारण था की वह लड़की इन सब बातों से बेखबर रही. क्या उसके माता पिता का दोष नहीं है जिन्होंने उसे कोई हिदायत नहीं दी? फिर आप ही बताएं की क्या एक सत्रह साल की लड़की को जन्मदिन मनाने के लिए बियर बार में जाना क्या उचित था? कल की ही बात है निशा जी के कांवड़ यात्रा के आलेख में लिखा था इस धार्मिक यात्रा में भी असामाजिक तत्व भी शामिल होते हैं. आप ही बताये की जब धार्मिक यात्रा में ऐसे लोग शामिल है तो फिर बिअर बार के सामने क्या संत खड़े रहेंगे? मै आसाम में ब्रम्ह्पी के साथ हुई घ्रणित घटना का समर्थन नहीं कर रहा हूँ किन्तु क्या एक ही दिन में सब बदल जाएगा? नहीं ना. तो फिर पहले समाज को बदलने की जरूरत है, प्रशासन को उसकी भूमिका याद दिलाने की जरूरत है, असामाजिक तत्वों के हौंसले तोड़ने की जरूरत है,महिलाओं को अपनी सुरक्षा उपाय बढाने की जरूरत है. बहुत काम हैं जो सुरक्षित और सभी समाज बनाने के लिए करना है तब तक एहतियात बरतने के अलावा कोई चारा नहीं है.सिर्फ समाज को चार पंक्तियों में कोसने से कुछ होने वाला नहीं है.वरना तो मेरे हाथ में आज का अखबार भी है जिसमे छः वर्ष की मासूम से दुष्कृत्य के प्रयास, पांच लोगों द्वारा कार में गैंग रेप, मशहूर एथलीट पिंकी को जान का खतरा और कानपुर में छेड़छाड़ के बाद ब्लेट से पिटाई का समाचार भी छपा है.

के द्वारा: akraktale akraktale

धृतराष्ट और गांधारी बनना छोड़ना होगा कि हमारा पिता पति बेटा ऐसा नहीं कर सकता, सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों औरतों का सम्मान करना आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती है मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है | आदरणीय दिव्या बहन, नमस्कार! निश्चय ही हम सब काफी नीचे (या कहें कि गर्त में) चले गए हैं. ये तो ठीक ऐसा ही हुआ, जैसे किसी फिल्म में कोई सीन चल रहा है और सभी मजे ले रहे हैं! हमारी मानसिकता को हो क्या गया है? कभी थाने में अपनी ही सहकर्मी से दुराचार, तो सेना के जवान का वह्सीपन ... जितनी भी भर्त्सना की जाय कम है! कुछ करना जरूरी हो गया है. सरकारी स्तर पर भी और सामाजिक स्तर पर भी!.......

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय दिव्या बहिन .... सादर अभिवादन ! ऐसे मौको पर ही कानूनों में ढील और उनको लागू करने में ढीलापन और निकम्मापन तथा अपराधियों को सख्त सजा देने और दिलवाने में नाकाम पुलिस बल और हमारा तंत्र इन सभी पर बेहद गुस्सा आता है मैं समझता हूँ की किसी नारी को जीते जी तिल -२ मरने देने पर मजबूर करने वाले गुनाहगारो को भी तालिबानी तरीके से ही सजा देनी चाहिए लेकिन हमारी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल पर भी गुस्सा है जिन्होंने जाते जाते कई फांसी की सज़ा प्राप्त बहुत से अपराधियों की सजा को उम्र कैद में बादल दिया है ..... हमारी धर्म निरपेक्ष नर्मी बहुत सी गलत जगह पर भी इस्तेमाल की जाती है तथा उसका अनुचित फायदा भी उठाया जाता है ..... इन मामलों में लंबा केस चलाने की बजाय जल्द से जल्द फैसला लेकर अपराधियों को सख्त सजा देनी चाहिए .... इस विषय पर पहली बार आपकी कलम से पढ़ने को मिला है ..... भगवान से यही प्रार्थना है की इस दंश को किसी भी नारी को ना झेलना पड़े .....

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

आदरणीय रेखा जी, सादर नमस्कार अरुणा शानबाग ये नाम सारे समाज को शर्मिंदा करने के लिए काफी है एक लड़की जिसकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने एक हैवान को इंसान बनने का सबक सिखाया था और उसकी सजा उसे मिली ३७ सालो से वो कोमा मे लकवा ग्रस्त एक शरीर मात्र है और उसको इस स्थिति तक पहुँचाने वाले दरिंदे को अदालत ने सोहनलाल पर अरुणा की हत्या की कोशिश और कान की बाली लूटने का आरोप लगा। हैरानी की बात ये है कि उसपर बलात्कार की कोशिश का आरोप तक नहीं लगा, पुलिस ने ऐसी कोई धारा नहीं लगाई। फिर भी सोहनलाल को सात साल की सजा मिली, सजा काट कर वो रिहा हो गया। लेकिन अरुणा आज भी 37 साल से बेसुध पड़ी है। कड़ी सजा क्या और किसे मिलेगी एक लड़की अपना सब कुछ गँवा चुकी होती है और हर पल एक सजा वाली जिंदगी जी रही होती है और बलात्कारी को सजा भोग के खुलेआम फिर से घूम रहा होता है ऐसे कानून के रहते लोगो का हौसला पस्त नहीं होता उनको डर नहीं है न समाज कि न कानून की तो कहाँ से घटेगी अपराधों कि संख्या | आप का शुक्रिया

के द्वारा: div81 div81

आदरणीय, अशोक जी, सादर नमस्कार !! अभी कुछ महीनो पहले कि एक घटना आप को बताती हूँ हमारी कॉलोनी मे एक परिवार है जिसमे पति, पत्नी और तीन साल कि छोटी बच्ची है इनका आपस मे अक्सर झगडा होता रहता है एक रात ऐसे ही इनके घर से चीखने चिल्लाने की आवाजे आ रही थी रोज का झगड़ा समझ किसी ने ध्यान नहीं दिया मगर आवाजे बढती जा रही थी हम से रहा नहीं गया तो अपनी दीदी के साथ उनके घर चले गए वहाँ का नजारा देख के हम डर गए पत्नी मट्टी तेल से पूरी तरह भीगी हुई है पति उसको पिट रहा है बच्ची एक तरफ डरी हुई सहमी सी रोये जा रही है भाग के हमने पापा जी को बुलाया और दूसरे लोगो को बुलाने लगे कॉलोनी मे उस वक्त सब थे मगर किसी भी घर के दरवाजे नहीं खुले ये हमारे समाज का असली चेहरा है जहां रोड पर इंसान तडफ तडफ के मर जाता है और लोग उसके बगल से निकल जाते है | इस समाज को कैसे संगठित किया जाए कि विरोधी ताकत फलफूल न सकें | आप का तहे दिल से शुक्रिया

के द्वारा: div81 div81

ऐसे ही दुनियाँ मे क्या कम दुख है जो आपने दुख बाँटने का शौक पाल रखा है.....दुख बाँटने मे एक ख़तरा भी है.....आप जितना दुख बटेंगी उतना ही दुख आपको और मिलेगा......ये गणित बड़ा उल्टा है.....जो दुखी है जीवन उसको और-और दुख देता है......मुझे डर है की दुख बाटते बाटते.....कहीं दुख आपके जीवन का ढंग न हो जाए....बहुत से लोग है....जिनका दुखी रहना स्वभाव बन गया है...वो लोगों को अपना दुख सुना कर उनसे सहानुभूती बटोरतें है..... समय रहते चेत जाइए........अगर बाँटना ही है तो आनंद बांटिए.......दुख भी भला कोई बाँटने की चीज़ है..... एक और बात है.....दुखी आदमी पर लोग दया ज़रूर कर देता है लेकिन प्रेम नहीं.......सहानुभूती को प्रेम समझने की भूल मत कीजिएगा....... (इतना सब कुछ मुझे इस लिए कहना पड़ा क्योकि आपकी फोटो देख कर मुझे लगता है...आपकी ज़िंदगी मे बहुत दुख है.....दुख अब आपके चेहरे का हिस्सा बनता जा रहा है....हम जिससे प्रेम करते है वैसा ही दिखने लगते है.......इसीलिए दुख से अब रिस्ता तोड़िए और आनंद बाँटना शुरू कीजिए.......और जैसे ही आप आनंद बाँटना शुरू करेंगी जीवन मे आनंद के और और स्रोत फूटने लगेंगे......ये मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ....बाँकी आपकी अपनी मर्ज़ी......अगर दुखी रहने मे ही आपकी मौज हो तो रहिए दुखी....................) हर आन यहाँ सेहबा-ए-कुहन एक साघर-ए-नौ में ढलती है कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है याँ हुस्न की बर्क चमकती है, याँ नूर की बारिश होती है हर आह यहाँ एक नग्मा है, हर अश्क यहाँ एक मोती है हर शाम है शाम-ए-मिस्र यहाँ, हर शब है शब-ए-शीराज़ यहाँ है सारे जहाँ का सोज़ यहाँ और सारे जहाँ का साज़ यहाँ ये दश्त-ए-जुनूँ दीवानों का, ये बज़्म-ए-वफा परवानों की ये शहर-ए-तरब रूमानों का, ये खुल्द-ए-बरीं अरमानों की इस फर्श से हमने उड़ उड़ कर अफ्लाक के तारे तोड़े हैं नहीद से की है सरगोशी, परवीन से रिश्ते जोडें हैं इस बज़्म में तेघें खेंचीं हैं, इस बज़्म में साघर तोड़े हैं इस बज़्म में आँख बिछाई है, इस बज़्म में दिल तक जोड़े हैं इस बज़्म में नेज़े खेंचे हैं, इस बज़्म में खंजर चूमे हैं इस बज़्म में गिर-गिर तड़पे हैं, इस बज़्म में पी कर झूमे हैं

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आदरणीय जवाहरभाईसाहबजी सादर प्रणाम राजकमल भाई का फिर से शुक्रिया कहूँगी कि उनके द्वारा एक और भाईसाहब हमें मिले ये बात मुझे आज ही पता चली तो माफ़ी चाहूंगी भाईसाहब ये रचना अधूरी तो नहीं हाँ अगर मैं अपने भाव को सही से नहीं रख पायी तो गलती पूरी तरह से मेरी है कोशिश करुँगी कि आइन्दा इस प्रकार की गलती दोबारा न हो अब इस डर से छुटकारा कैसे दिलाया जाए फिर से उन भावना मे बहने की कोशिश करुँगी अगर न्याय कर पायी तो इसके आगे कुछ फिर से लिखूंगी तब तक ये डर निकाल दीजिए राजकमल भाई को प्रतिक्रिया कि है उसमे हो सकता है आप के डर का निवारण भी हो जाए | आप का हृदय से आभार इस तरह से मेरी गलती को इंगित कराते रहिएगा इससे सुधार का मौका मिलेगा एक बार फिर से आप का शुक्रिया भाईसाहब

के द्वारा: div81 div81

आदरनीय राजकमल भाई, सादर प्रणाम मेरी इस रचना को पढ़ के आप के मन मे जो ये कुछेक बाते उठी उनको देखते हुए आ रही हूँ हर प्रतिक्रिया के साथ लाला अमर नाथ कि विशेष टिप्पणी .................... :) चलिए आप के मन मे जो कुछेक बात है उसका निवारण करने कि कोशिश करती हूँ ये मेरी कोई शरारत नहीं है हर वक्त मे शरारत नहीं करती ............... आप को ऐसा क्यूँ लगा कि ये मेरी कोई शरारत है मैंने उसकी डायरी के मोती नहीं चुराए है ये केवल मेरी मन कि कोरी भावनाये ही है बस प्रेरणास्रोत मेरी वो दोस्त है जो अपनी डायरी के पन्नों मे अपनी माँ से बात किया करती थी | उसने कभी उस डायरी को हमें पढ़ने नहीं दिया हाँ हमने जब पूछा कि क्या लिखती हो तो उसने बताया था | जब उस डायरी को मैं कभी पढ़ नहीं पायी तो उस मे गहराई से नहीं उतर पायी और सच मे उस भावना को नहीं छू पायी होंगी इस लिए वो भाव शब्दों के जरिये उकेर भी नहीं पायी जब उसने कभी इस बात कि इजाजत नहीं दी कि उस डायरी को हम पढ़े तो हमने भी कभी उसकी भावना को ढेस नहीं पहुंचाई मेरी पहुँच उस डायरी तक कभी नहीं हुई और उस सहेली का साथ भी दसवी तक ही रहा क्यूँ कि उसने दूसरे स्कूल मे दाखिला ले लिया था क्या आप ने ये सभी संस्मरण लाइव टेलीकास्ट करते हुए लिखे है ?? इस बात का अर्थ नहीं समझ पायी तो जवाब नहीं दे पाऊँगी फ्लैशबैक मे नहीं गयी हूँ वो प्रेरणास्रोत है राजकमल भाई आप ने ये कह के कि इस रचना को पढ़ के डर के शाहरुख खान कि याद आ गयी पूरी रचना की वाट लगा दी :) :) माँ का स्थान तो कोई नहीं ले सकता है उस स्थान कि भरपाई बहन या सहेली कर सकती है खुशी की बात ये है कि उसको माँ सासु माँ मिल गयी है और दोनों माँ बेटी कि तरह ही रहती है उससे मेरा मिलना नहीं हो पता जब भी कभी कोई उसके परिवार का मिलता है तो खैर खबर ले लेती हूँ कभी मौका मिला तो जरुर पढ़ने को कहूँगी राज भाई सच कहूँ अच्छा लगा आप का इतना ध्यान दे कर पढ़ना और मन मे उपजी शंकाओं को सीधे पूछना आप की पारखी नजर को सलाम.............................. आप का ह्रदय से आभार

के द्वारा: div81 div81

आदरणीय दिव्या बहिन ..... सादर अभिवादन आपकी इस रचना को पढ़ने के बाद मेरे मन में कुछेक बाते उठ रही है की कहीं यह आपकी किसी बचपन की शरारत से सम्बंधित तो नहीं है आपकी उस सहेली की समुन्द्र रूपी उस गुप्त डायरी में से आपने कुछेक मोती ही हमारे सामने पेश किये है पता नहीं क्यों मेरी तीसरी आँख मुझसे यह कह रही है की उस डायरी में आप पूरी गहराई में नहीं उतरी है ..... अभी भी उस समुन्द्र की तलहटी में अनेको बेशकीमती नगीने छुपे हुए है जिनको की आपने हमसे छुपा लिया है क्या आपकी उस डायरी तक पहुँच की जानकारी आपकी सहेली को है क्या आपकी पहुँच उस डायरी तक एक सीमित समय के लिए ही हुई थी ?..... क्या आपने यह सभी संस्मरण लाइव टेलीकास्ट करते हुए लिखे है ?..... या फिर इनको फ्लैशबैक में जाकर लिख डाला है हम सभी की सेवा में आपकी इस मार्मिक रचना को पढ़ते ही डर फिल्म के शाहरुख खान की याद हो आई शुकर है की आपकी सहेली डायरी में लिख कर बाते करती है मोबाइल से नहीं आपका यह राजकमल भाई तो जन्मजन्मान्तरो का भावो का भूखा है इन थोड़ी सी यादों से मेरी आत्मा तृप्त नहीं है होने वाली आपकी सजा यही है की आप इसका सिक्क्वेल यानी की पार्ट टू भी बहुत ही जल्दी से पेश करें वैसे माँ का स्थान किसी हद तक सहेली या फिर बड़ी बहिन ले सकती है आप अपनी उस सहेली को उसको इस लेख पर आये हुए कमेन्ट जरूर पढ़वाए

के द्वारा:

माँ आप अपने साथ हर जगह मुझे ले कर जाती थी याद है न चाहे नानी के घर हो या मंदिर या फिर बाजार ही क्यूँ न हो हर वक्त साये कि तरह आप अपने साथ रखती थी फिर क्यूँ इन खौफनाक सायो के बीच मुझे छोड़ के चली गयी हो क्यूँ नहीं अपने साथ ही मुझे भी लेकर गयी | थक गयी हूँ मैं सफर करते करते तेरे आंचल कि छाँव भी नसीब नहीं , भटक गयी हूँ मैं इन भूलभुलैया रास्तों का सफर करते करते मैं अब और सफर नहीं कर पाउंगी दिव्या जी बहुत सुन्दर माँ की ममता का जितना भी गुणगान किया जाए कम है ...दिल को छू गयी कहानी मार्मिक भाव .. लेकिन माँ ने जब हौसला बढ़ाया साथ साथ हर जगह ले गयी आदतें डाली आप की... दुनिया से लड़ने की तो ..फिर हताश क्यों होना ...आइये धनात्मक रुख रखे संघर्ष करते जीवन का आनंद लें जय श्री राधे भ्रमर ५

के द्वारा:

प्रिय मित्र प्रतीक जी बड़े ही दुःख और खेद के साथ ये आप को लिखना पड़ रहा है की ये रचना "प्यार मुझको भी हो जाये तो कुछ बात हो" जो की दिव्या जी द्वारा जागरण जंक्सन में १५-फरवरी -२०११ को डाली गयी थी ..पता चला की चोरी हो गयी है ..आप के ब्लॉग पर ये पोस्ट देख हैरानी हुयी कृपया स्पष्ट करें ..आप ने लिखा है मेरी कविताओं का संग्रह ..संग्रह तो किसी कवी लेखक की कविता का भी होता है पर उससे अनुमति ले कर कृपया अपना पक्ष स्पष्ट करें ..ये मान मर्यादा के विपरीत है और इसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता .. आशा है आप या तो दिव्या जी से इसकी अनुमति ले लें या तो फिर इस पोस्ट को हटा दें ....... http://div81.jagranjunction.com/2011/02/15/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%A4%E0%A5%8B-%E0%A4%95/#comment-१६३२, दिव्या जी के पोस्ट की लिंक जागरण जंक्शन में उपर्युक्त है .... भ्रमर ५

के द्वारा: