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खुद से, जिंदगी से और खुशियों से

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नारी न भाये नारी रूपा

Posted On: 28 Sep, 2010 Others में

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आप सभी ने ये कहावत या कहे वक्तव्य हमेशा ही सुना होगा की कि एक औरत ही औरत कि दुश्मन  होती है, एक औरत दूसरी को खुश, अपने से आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकती और न ही उसकी मदद कर सकती है ……………क्या ये बात सच है ? क्या सच में नारी, नारी  के स्वरूप को उसके ख़ुशी को बर्दाश नहीं कर सकती?

मुझे नहीं लगता है …………ये बात तो पुरूषों के साथ भी लागू होती है वो भी तो अपने आगे दुसरो को कुछ नहीं समझते या कहिये अपने से बढ़ कर उनके लिए दूसरा कोई है हीं नहीं

वैसे दुसरो से चिढना मदद न करना ये एक मानव स्वभाव है वो एक बच्चे में हो सकता है दो दोस्तों में हो सकता है दो सहकर्मी के बीच हो सकता है सहपाठी के साथ हो सकता है पड़ोसियों के बीच हो सकता है यहाँ तक की दो राष्ट्र के बीच भी होता है और ये स्वभाविक भी है क्यूँ की ये मानव स्वभाव है कहीं न कहीं हम सभी कभी न कभी किसी न किसी से चिढ़े है जलन के भाव आये है या दूसरो से अच्छा  बनना चाह है ऐसा स्वभाव होना बुरा भी नहीं प्रतिस्पर्धा की भावना तो बनी रहती है और आगे बढ़ने के लिए  स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होना भी जरुरी है कहने का मतलब है ये स्वभाव किसी भी के साथ हो सकता है इसमें नारी जाती को ही बदनाम किया जाये ये बात गले से नहीं उतरती |

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kumar rajeev के द्वारा
October 18, 2010

ye bat aapki kisi par bhi lagu nahi hoti na purush par lekin han ye dharna to banhi huki hai http://kumarrajeev.jagranjunction.com

aftabazmat के द्वारा
October 5, 2010

मेरा मानना है कि महिलाओं में पुुरन्षों की अपेक्षा ईर्ष्या का भाव ज्यादा होता है। वैसे आपने संतुलित लिखा है। बधाई॥।

    div81 के द्वारा
    October 7, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, एक सवाल का जवाब देंगे आप की ये किस तराजू में तोला जाये जिससे प्रतिशत का पता लगाया जाये की कोन ज्यादा ईष्या के भाव रखता है

div81 के द्वारा
October 2, 2010

अबोध जी आप की प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

abodhbaalak के द्वारा
September 29, 2010

शायद ये हम में असुरक्षा की भावना के कारण होता है की हम दुसरे से इश्य करने लगते हैं, हमारे साथ प्राब्लम ये है की हम दुसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं जब की हमें अपने साथ ही कम्पेतिशन करना चाहिए, क्योंकि आप किसी के साथ भी प्रितिस्पर्धा करें, उस से अधिक सफल कोई दूसरा अवश्य होगा. वैसे ये इश्य का भाव स्त्री और पुरुष दोने में सामान होती है, कोई इस से अछोत्ता नहीं है, अगर है तो वो महान आत्मा है, अछे लेख पर बधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com

syeds के द्वारा
September 29, 2010

Pericise but effective.I think it may vary person to person irrespective of women or men.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 28, 2010

जी सही कहा आपने ईष्या या जलन इंसान का मूल स्वाव है……… पर जैसा की आपने कहा है की कहीं न कहीं हम सभी कभी न कभी किसी न किसी से चिढ़े है जलन के भाव आये है या दूसरो से अच्छा बनना चाह है ऐसा स्वभाव होना बुरा भी नहीं प्रतिस्पर्धा की भावना तो बनी रहती है.. आगे बढ़ने की चाह गलत नहीं है………पर दुसरे को आगे बढ़ते देख कर उससे ईष्या वश ये प्रतिस्पर्धा गलत है……….. क्योकि तब इंसान सही गलत सब भूल कर केवल आगे निकलने के फेर मैं पड़ जाता है…… बाकि इस में महिला पुरुष का भेद नहीं किया जा सकता……………….. अच्छा लेख बधाई………

    div81 के द्वारा
    September 28, 2010

    पियूष जी आप की प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होना भी जरुरी है तभी मजा भी आता है

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 28, 2010

    इसमें मुझे भी कोई आपत्ति नहीं है……. पर प्रतिस्पर्धा में अपने भीतर की कमजोरियों को दूर करके दुसरे से बेहतर होने का प्रयास कर आगे निकलने का जज्बा होना चाहिए…….. जैसे शाहरुख और आमिर में है……… उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की तरह नहीं की कैसे भी दुसरे से आगे निकलना है………… फिर चाहे कितने गरीब पिटें………. शुक्रिया………


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