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खुद से, जिंदगी से और खुशियों से

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"मैंने जिंदगी को देखा है"

Posted On: 20 Oct, 2010 Others में

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Picture1मैंने जिंदगी को देखा है
भागती दौड़ती राहो में
उम्मीदों से तकती निगाहों में
आशुंओ की रफ्तार में
अपनों के बीच परायो में
भीड़ के बीच अजनबी सायो में
दो वक़्त के लिए परेशां होते इंसानों में
हालातो से जूझते मासूमो के सवालो में
दिन की इक छोटी सी ख़ुशी में
रातो को टूटती सिसकती उम्मीदों में ||
stock-photo-two-children-and-a-dog-catching-butterflies-9834475

मैंने जिन्दगी को देखा है

तितली के पीछे भागती ख़ुशी में

रंगों को छूने की कोशिश में

बरसती बूंदों के संगीत में

उमड़ते घुमड़ते बादलों की तस्वीरों में

निर्मल बहती नदियों के पानी में

शांत खड़े तरु की छाया में ||

csr cbe - 2

मैंने ज़िन्दगी को देखा है

अपनों के आने के इंतजार में

रूखे सूखे व्यवहारों में

दरवाजे से बहार तकती निगाहों में

निराशा में आशा की किरणों में

मैंने ज़िन्दगी को देखा है
मैंने जिन्दगी को देखा है

Mindblowing-Positivity2.web

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58 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Arvind Pareek के द्वारा
November 1, 2010

जिंदगी के विविध रूपों से परिचय करवानें के लिए आभार । बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति । साथ ही बोलते चित्र कविता को चार चांद लगा रहे हैं । अरविन्‍द पारीक http://bhaijikahin.jagranjunction.com

vinay sharma के द्वारा
October 31, 2010

APNE BAHUT ACHHA LIKHA HE BADIYA HE LIKHTE RAHIYE ………..

chadndra kailash के द्वारा
October 31, 2010

divya ji apne jo apne मन के भाव की अभिव्यक्ति की है उससे हमें कुछ सीख मिलती है ये कोमल man अपने दिल के भावों को कहने के लिए आतुर रहता है लेकिन कोई कोई ही इन्हें शब्दों के माध्यम से व्यक्त कर पता है !

Mohit sikarwar के द्वारा
October 25, 2010

div81 जी ! आपने जिन्दगी के हर पहलु को बहुत ही अछि तरह से प्रस्तुत किया है और इसमें मैंने वास्तविकता के दर्शन कीये हैं। बहुत ही सुन्दर वर्रण। शुक्रिया-कई -2 वार शुक्रिया।

    div81 के द्वारा
    October 27, 2010

    मोहित जी, कविता के माध्यम se जो मैं कहना चाहती थी वो बात आप तक पहुँच गयी | मेरी कोशिश वहीँ सार्थक हो गयी | आप का तहे दिल से शुक्रिया |

swatantranitin के द्वारा
October 25, 2010

div81 जी ! आपने जिन्दगी के हर पहलु को बहुत ही अछि तरह से प्रस्तुत किया है और इसमें मुझे वास्तविकता के दर्शन होते है | बहुत ही सुन्दर वर्रण शुक्रिया कबूल करें

    div81 के द्वारा
    October 25, 2010

    मुझे ख़ुशी है की आप को भी मैं उस वास्तविकता से रूबरू करा सकी | दिल से शुक्रिया

Coolbaby के द्वारा
October 24, 2010

Well expressed ………Nice Keep it up May God bless You.

    div81 के द्वारा
    October 24, 2010

    आप सभी के साथ और आशीर्वाद की जरुरत है धन्यवाद आप का

pawan tiwari के द्वारा
October 24, 2010

very nice lines…..this is the fact which happens in human life…..

    div81 के द्वारा
    October 24, 2010

    फिराक जी के एक शेर के साथ आप को धन्यवाद कहना चाहूंगी बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं तुझे ऐ ज़िंदगी, हम दूर से यह भान लेते हैं

Nikhil के द्वारा
October 23, 2010

आपके ब्लॉग पर देर से आने के लिए माफ़ी चाहूँगा. आपकी कलम का कायल हो गया मैं. ज़िन्दगी के गलियारों से, झांकते हुए ग़म देखे हैं, आंसुओं से सिंची हुई ज़मीन ज्यादा, खिलते हुए चमन कम देखे हैं, सड़क से गुजरते हुए आज भी उसी मंजर का दीदार होता है, भूख से तड़पते चेहरों को देख कर, दिल बार बार रोता है, तबाह होना जिनकी किस्मत है, ऐसे हजारों नयन देखे हैं, आज भी हमने गरीबों की लाश पर, चीथरों के कफ़न देखे हैं.

    div81 के द्वारा
    October 24, 2010

    निखिल जी, क्षमा मांग के शर्मिंदा मत कीजिये ये तो आप की हौसला अफजाई है | दिल को झकजोर के रख देने वाली सच्चाई बयां करी आप ने |

J L Singh के द्वारा
October 23, 2010

जब मैं इस शहर में नया था, अपनों से अंजन था, एक दिन एक टेलीग्राम आया, पिताजी की तबियत ख़राब है. शनिवार की शाम दूसरा दिन रविवार. सोमवार को खुलेंगें बैंक तबतक इंतज़ार नहीं कर सकता था. तब ए. टी.एम्. का जमाना नहीं था. ट्रेन भाड़े की जरूरत थे. कुछ अपनों के पास गया. एक सौ रुपये की मांग की. अपनों ने बड़ा अच्छा बहाना बनाया. मई वापस मुह लटका कर हॉस्टल आया. एक दोस्त ने देखा मुझे उदास. पुछा क्यों मित्र,क्यों हो निराश. मने अपनी परेशानी बताई. उसने दरियादिली दिखाई झट अपने संबंधी के पास गया. चालीस रुपये मांग लाया.,मन मेरा हर्षाया. ट्रेन भाड़े से थोडा अधिक था मन मेरा पुलकित था. मैंने अपनों को पहचाना, रुपये के महत्व को जाना. आज भी मुझे याद है दस दस के चार नोट बिलकुल नए मजधार के बोट. तभी मुझे याद आया – रहिमन वे नर मर चुके,जो कहीं मांगन जाही, उनके पहले वे मुए जिन मुख निकसत नहीं.

    div81 के द्वारा
    October 23, 2010

    सिंह जी, सुख में सुमिरन सब करे, दुःख में करे न कोए ,जो दुःख में सुमिरन सब करे तो दुःख काहे का होए

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
October 22, 2010

मैंने ज़िन्दगी को देखा है अपनों के आने के इंतजार में रूखे सूखे व्यवहारों में दरवाजे से बहार तकती निगाहों में निराशा में आशा की किरणों में मैंने ज़िन्दगी को देखा है खुबसूरत पंक्तियों से सजी कविता के लिए हार्दिक बधाई…………

    div81 के द्वारा
    October 23, 2010

    पियूष जी, नमस्कार इतने दी कहाँ गायब थे आप | आप को मेरी कविता पसंद आई धन्यवाद

Tufail A. Siddequi के द्वारा
October 21, 2010

अभिवादन, आपने सच में ज़िन्दगी को देखा है.

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    तुफैल जी , शुक्रिया आप की प्रतिक्रिया के लिए एवं मेरे जज्बे को समझने के लिए

Ritambhara tiwari के द्वारा
October 21, 2010

दिव जी एक बेहद नायब कृति के लिए हार्दिक बधाई!

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    ऋतंभरा तिवारी जी, आप का शुक्रिया उत्साहवर्धक टिप्पड़ी के लिए

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 21, 2010

Div जी बहुत खूबसूरत रचना सभी भावों से युक्त कृति पर आपको आकाश तिवारी की तरफ से ढेर सारी बधाई.. आकाश तिवारी

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    आकाश जी आप का बहुत बहुत शुक्रिया

rcmishr के द्वारा
October 21, 2010

मैंने ज़िन्दगी को देखा है अपनों के आने के इंतजार में रूखे सूखे व्यवहारों में दरवाजे से बहार तकती निगाहों में निराशा में आशा की किरणों में मैंने ज़िन्दगी को देखा है मैंने जिन्दगी को देखा है दिव्या बहन नमस्कार । बहुत ही खूबसूरत कविता है । इसे पढ़ कर मैं कह सकता हूं कि आपने जरूर जिंदगी को देखा और पहचाना है । आभार ।

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    मिश्र जी , बस इतना ही कहना चाहूंगी मेरे नजरिये से जिंदगी को देखने के लिए आप का आभार

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 21, 2010

नमस्कार दिव्या जी…………..तितली के पीछे भागती ख़ुशी में रंगों को छूने की कोशिश में बरसती बूंदों के संगीत में उमड़ते घुमड़ते बादलों की तस्वीरों में निर्मल बहती नदियों के पानी में शांत खड़े तरु की छाया में……………..आपकी ये रचना बिलकुल सच्चाई की दर्शन कराती है,जिन्दगी तो यही है ना,और जिन्दगी के सारे पल भी यहीं है बशर्ते उनको देखने और समझने की जरुरत है,अच्छी पोस्ट………….और हाँ पूरा नाम बताने के लिए धन्यवाद!

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    धर्मेश जी, जिंदगी के इतने रंग हमारे आस पास बिखरे है मगर हम अपनी उलझनों में अपनी जिंदगी को जीना ही भूल जाते है | ………………………शुक्रिया

kirtitiwari के द्वारा
October 21, 2010

दिव जी बहुत बधाई ,,,,हर पंगती मन मोह लेती है ..सुन्दर कविता

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    कीर्ति तिवारी जी , आप के मन तक मेरी बात पहुंची मेरे लिए ख़ुशी की बात है | शुक्रिया

ashvinikumar के द्वारा
October 21, 2010

क्या अजब दौर है दुनिया का आजकल लोगों , मिट्टी तो मंहगी है इन्सान मगर सस्ते हैं ,, किसी के जख्म को मरहम दिया है गर तूने, समझ ले तूने खुदा की ही बन्दगी की है ,,

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    अश्विनी जी, बहुत खूब कहा आप ने | घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर ले किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये …………………….शुक्रिया

chaatak के द्वारा
October 20, 2010

दिव्या जी, आपने ज़िन्दगी को वाकई बड़े करीब से देखा है| जीवन के प्रति आपका विश्लेषण कविता के शब्दों का पूरा साथ देती तस्वीरें बखूबी बयान कर रही हैं| आपकी इस दृष्टि के लिए सांकृत्यायन जी (यदि मुझे ठीक से याद है तो) पंक्ति दोहराता हूँ- ‘शौक-ए-दीदार अगर, है तो नज़र पैदा कर|’ अच्छी प्रस्तुति पर बधाई!

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    चातक जी आप की टिप्पणी हमेशा उत्साह बढती है | तस्वीरों के द्वारा दिल की बात रखने की कोशिश आप को पसंद आई इसका तहे दिल से शुक्रिया |

nikhil के द्वारा
October 20, 2010

जिंदगी का व्यवहारिक रूप आपने देख लिया है ..और उसे समझा भी है… ये तो इन तस्वीरो और पंक्तियों से पता चलता है ……….. प्रभावशाली और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति …

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    निखिल जी, कई बार शब्द मौन होजाते है और तस्वीरे बोल उठती है | शुक्रिया उन मर्म तक पहुँचने के लिए |

Alka r Gupta के द्वारा
October 20, 2010

दिव जी , जहाँ-जहाँ आपने देखा वहाँ सभी जगह जिंदगी को पाया  अच्छी दृष्टि वैसी ही सोच। सुंदर रचना के लिए बधाई।

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    अलका जी, जिंदगी को देखने का मेरा नजरिये और सोच आप को पसंद आया आप का आभार

atharvavedamanoj के द्वारा
October 20, 2010

दिव्या जी…आपकी इस रचना को समर्पित….. जीवन खट्टा है,मीठा है,फीका है,कड़वा,तीखा है। यह कई रंग,यह धूप-छाँव,यह मुखर भी है,शर्मीला है। यह हास्य-रुदन का आदि,अंत और मध्य बताता है नर को। जलवाष्प,सलिल,हिम को,अणु को और संसृति के इक-इक कण को। कुछ लोग जो आयेँ भेद खोल इसका रख देने दुनिया मेँ वो चले गये तो बात गई। फिर से दुनिया है नयी-नयी। अब भी दुनिया मेँ दुःख ही दुःख,अब भी दुनिया मेँ दुखियारे। जो कुरुक्षेत्र मेँ कही गयी। फिर गई,गई वह बात गई। फिर देश-जाति का बंधन है,माया का तांडव नर्तन है। कभी अयस-श्रृंखला, रेशम है,कभी अट्टहास है,गर्जन है। मुरलीधर की मुरली भूली,जब चक्रपाणि का चक्र चला। चल हाँथ देख तू अब मेरा,बतला क्योँ राहु वक्र चला? क्या मुक्त तभी हो पाऊँगा,तड़-तड़ जब धागे टूटेगेँ? जब सब पौरुष थक जायेगा। और यह जीवन ढल जायेगा। अब पिया मिलन का पथ बोलो खुसरो आखिर किससे पूछेँ अब कौन हमेँ समझायेगा? जीवन का पथ दिखलायेगा? वन्दे मातरम

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    मयंक जी, काव्यात्मक प्रतिक्रिया के साथ रचना को समर्पित करने के लिए आप का बहुत बहुत शुक्रिया! आपकी प्रतिक्रिया कुछ और बेहतर करने की प्रेरणा देती है ……………वन्दे मातरम

harish के द्वारा
October 20, 2010

मन को छू जाने वाली कविता के लिए बधाई.

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    हरीश जी, मेरे जिंदगी के रंग आप के मन को छु पाए मेरे लिए ख़ुशी की बात है | शुक्रिया

sanjayupadhyay के द्वारा
October 20, 2010

वाह क्या खूब लिखा आपने। मैने जिंदगी को देखा है… 

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    संजय जी, आप का बहुत बहुत धन्यवाद

rkpandey के द्वारा
October 20, 2010

div81 यानी दिव लिखती आप बहुत अच्छा है. “मैंने जिंदगी को देखा है” को पढ़कर लगा वाकई सृजनशीलता है आपमें. भावनाओं को उकेरने में आपने कमाल किया है. अच्छी प्रस्तुति के बधाई.

roshni के द्वारा
October 20, 2010

दिव जी बहुत बढ़िया लिखा अपने…. मैंने ज़िन्दगी को देखा है अपनों के आने के इंतजार में रूखे सूखे व्यवहारों में दरवाजे से बहार तकती निगाहों में निराशा में आशा की किरणों में मैंने ज़िन्दगी को देखा है……सुन्दर भाव अभीव्यक्ति

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    रौशनी जी, जो भाव मैं व्यक्त करना चाहती थी वो आप तक पहुँच गए मेरे लिए इतना ही बहुत है | शुक्रिया

abodhbaalak के द्वारा
October 20, 2010

दिव जी, जीवन के इस रूप के वेदना को समझ पाना आसान नहीं है, जहाँ कहीं दुःख के बादल हैं तो सुख की छाव, सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    अबोध जी, जिंदगी के जिस रूप को मैंने देखा है उन्ही को शब्दों के जरिये आप के सामने प्रस्तुत किया है | आप की प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया |

jalal के द्वारा
October 20, 2010

wow ! दिव जी ज़िन्दगी के रंगों को बड़े सलीके से दिखाया आपने.

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    जलाल जी , शुक्रिया की आप को ये रंग पसंद आये

    jalal के द्वारा
    October 21, 2010

    वोह तो ठीक है, लेकिन आपको दिव कहूं या दिव्या?

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    आप को जो उचित लगे कह सकते है

priyasingh के द्वारा
October 20, 2010

शब्दों और भावो का बहुत अच्छा प्रयोग……………….

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    प्रिया सिंह जी , आप का शुक्रिया

sd के द्वारा
October 20, 2010

\’\'भागती दौड़ती राहो में उम्मीदों से तकती निगाहों में आशुंओ की रफ्तार में अपनों के बीच परायो में भीड़ के बीच अजनबी सायो में दो वक़्त के लिए परेशां होते इंसानों में हालातो से जूझते मासूमो के सवालो में दिन की इक छोटी सी ख़ुशी में रातो को टूटती सिसकती उम्मीदों में ||\’\’   शायद ऐसे दृष्टि स्‍पर्श को ही कहा गया होगा – जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि।

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    s d जी, मेरे भावो को समझने और उनके लिए प्रतिक्रिया की लिए बहुत बहुत धन्यवाद |

syeds के द्वारा
October 20, 2010

दिव जी ,सुन्दर कविता, जिंदिगी का हकीकी रंग पेश किया आपने. अगली रचना का इंतज़ार रहेगा. http://syeds.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    October 21, 2010

    syeds जी जिंदगी का जो हकीकी रूप मैंने देखा उसे कविता रूप देने की कोशिश भर थी और आप को वो रंग पसंद आया इसका शुक्रिया | अगली रचना के साथ जल्दी ही उपस्थित होउंगी |


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