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कुछ सवाल

Posted On: 19 Nov, 2010 Others में

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मेरी अपनी सोच है  और जो आप ने कहा वो आप की बहुत ही अच्छा जवाब दिया आप ने मगर मन अभी भी अशांत है कुछ सवाल है जो परेशां कर रहे है क्या उन का जवाब मुझे मिलेगा
१.जब रामचन्द्र जी वनवास जा रहे थे तो उन्होंने सीता जी को साथ न ले जा कर उनी छाया ही अपने साथ वन में लेकर गए थे
और जब छाया  ही उनके साथ थी तो सवाल ही नहीं उठता सीता जी की पवित्रता और अपवित्रता
२.
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के काल की एक अन्य कथा के अनुसार अहिल्या को देवराज इंद्र व चंद्रमा ने छला। जब ऋषि गौतम, इंद्र और चंद्रमा का तो कुछ न बिगाड़ सके, तो बेचारी नारी पर ही अपना ऋषि ज्ञान-विज्ञान का प्रयोग कर डाला और क्रोध में अहिल्या को पाषाण मूर्ति बना दिया। आखिर स्वयं भगवान राम ने पाषाण मूर्ति बनी अहिल्या को अपने चरणों का स्पर्श दिया, तब वह पुनः पवित्र हो नारी रूप में परिवर्तित हुई। माता सीता तो कई वर्षों तक श्रीराम के साथ रही, तो सीता कैसे अपवित्र रह सकती थी।
३.
आप के अनुसार (इस का एक मात्र कारण यही था की उन्होने अपने ऊपर उंगली उठना स्वीकार किया किन्तु सीता पर कोई प्रश्न चिन्ह लगाए ये वो नहीं चाहते थे)अग्निपरीक्षा तब ली गयी थी जब किसी ने भी सीता मय्या पर अंगुली नहीं उठाई थी औरअपनी प्रजा  के एक व्यक्ति द्वारा ये कहने पर उनको फिर से छोड़ा गया था सवाल ये है की जब अग्नि परीक्षा में सीता जी की पवित्रता साबित हो गयी थी तो क्यूँ उनका त्याग किया गया , सीता जी को कितनी बार अपमान का घूंट पी कर अपनी पवित्रता को साबित करना था |
४.उन्होंने अपना पुत्र धर्म निभाया और वनवाश  काट के आये तो  उनका ये धर्म नहीं था की वो अपनी गर्भवती पत्नी का ख्याल रखे अपने होने वाले पुत्रो का ख्याल रखें ये धर्म भी तो उन्ही का था |
और अंत में क्यूँ स्त्री पर ही अंगुली उठाई जाती है क्यूँ उनकी पवित्रता पर शक किया जाता है रामचंद जी द्वारा नहीं प्रजा या किसी भी आम इन्सान के द्वारा क्यूँ उसको कटघरे में खड़ा किया जाता है |

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Harish Bhatt के द्वारा
November 30, 2010

दिव्या जी नमस्ते. आपने सवाल तो बहुत ही सही किये है. इनमे एक भी सवाल ऐसा नहीं जिससे किसी को ठेस लगे. हाँ यह अलग बात है कि सच बहुत कडवा होता है. और आपने आधी दुनिया का सच कह दिया. मैंने भी एक लेख लिखा था. ‘मुन्नी तो बदनाम होगी ही’. अच्छे सवालो के लिए हार्दिक बधाई.

Amit kr Gupta के द्वारा
November 30, 2010

दिव जी नमस्कार आपने जो सवाल उठाये हैं वह बिलकुल ही स्वाभाविक हैं .आप मेरे लेख पढ़ने के लिए is add पर जा sakte हैं. http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com

atharvavedamanoj के द्वारा
November 20, 2010

प्रिय दिव्या बहन सादर वन्देमातरम, एक स्त्री होने के कारण इस तरह की जिज्ञासाएं आपके मन में उठना स्वाभाविक है…जहाँ तक मैं मानता हूँ की किसी भी आस्था पर प्रश्न उठाने से पहले उस आस्था से सम्बंधित समस्त सामग्रियों का तथ्यपरक अध्ययन करने के पश्चात ही आस्था पर सवाल खड़े करने चाहिए..अब आप कहेंगी की मैंने भी तो यही किया है तो मेरी प्यारी बहना..इससे पहले की मैं कुछ लिखता मैंने तत्संबंधित ग्रन्थ को उसके सन्दर्भ सहित समग्र रूप में पढ़ा था और मैं आज भी अपने कहे पर कायम हूँ…अब सीता से सम्बंधित जिज्ञासाओं को लेते हैं ….पहले उनके पावक प्रवेश की कहानी सुनहु प्रिया व्रत रुचिर सुशीला|मैं कछु करबी ललित नरलीला| तुम्ह पावक मह करहु निवासा|जौ लगी करों निशाचर नाशा|| ………………………………………………………………………………………फिर कहा लछिमनहूँ यह मर्म न जाना|जो कछु चरित रचा भगवाना||….अरण्यकाण्ड ………………………………………………..अब पावक से बाहर आने की कहानी बताते हैं… सीता प्रथम अनल महू राखी|प्रकट किन्ही चह अंतर साखी| तेहि कारण करूणानिधि कहे कछुक दुर्बाद| सुनत जातुधानी सब लागीं करे विषाद|| प्रभु के वचन सीस धरी सीता|बोली मन क्रम बचन पुनीता| लछिमन होहुं धरम के नेगी|पावक प्रकट करहूँ तुम बेगी| फिर लिखा ….. लोचन सजल जोरी कर दोउ|प्रभु सन कछु कही सकत न ओऊ|(लक्ष्मण के लिए ) अब आपके सवाल पर आते हैं ….जब रामचन्द्र जी वनवास जा रहे थे तो उन्होंने सीता जी को साथ न ले जा कर उनी छाया ही अपने साथ वन में लेकर गए थे और जब छाया ही उनके साथ थी तो सवाल ही नहीं उठता सीता जी की पवित्रता और अपवित्रता….राम ने भी तो यही कहा उन्होंने कहाँ अपनी पत्नी को अपवित्र माना?….अब आपके मन यह सवाल आ रहा होगा की क्या राम सीता की छाया अयोध्या नहीं ले जा सकते थे….कदापि नहीं…सुमित्रा ने लक्ष्मण से एक वचन माँगा था की पुत्र जिस तरह से तुम राम को जानकी के साथ अयोध्या से लेकर जा रहे हो ठीक उसी तरह वापस भी लेकर आना नहीं तो मुझे अपना मुंह भी मत दिखाना…क्या छाया को ले जाने से यह वचन भंग नहीं होता?फिर राम सीता को अपूर्ण अयोध्या लेकर कैसे जाते?…..मात्र एक धोबी के कहने से सीता का त्याग राज धर्म की पराकाष्ठा है….आप एक मनुष्य की दृष्टि से विचार कीजिये जिस पत्नी के लिए उन्होंने इतना बड़ा युद्ध लड़ा उनको कितना मानसिक संत्रास हुआ होगा?सीता ने तो कम भोगा…राम को कितना भोगना पडा होगा?अनजाने में तो उन्हें अपने पुत्रों से भी युद्ध लड़ा…राम ने पुत्र धर्म का पालन करने के लिए राज्य त्याग दिया…भाई के धर्म का पालन करने के लिए भारत को सहर्ष सत्ता सौप दी…पति के धर्म का पालन करने के लिए युद्ध लड़ा…शिष्य के धर्म का पालन करने के लिए नंगे पाँव रात रात भर जाग कर यग्य की रक्षा की…राजधर्म के पत्नी को त्याग दिया…क्या आधुनिक मनुष्यों की तरह उनका अपना जीवन नहीं था…नारी हो या नर धर्म के लिए सबको बलि होना पडता है…राम ने यही किया…सीता ने भी यही किया ….इसीलिए ये दोनों ही पूज्य हैं….क्या सीता के बगैर राम की पूजा हो सकती है? कदापि नहीं ……………………………………………………………………………………………………………………………. अब दूसरी कहानी पर आते हैं ….अहिल्या ने संयम तोडा था…एक ऋषि पत्नी होने के नाते रीत की रक्षा का दायित्व उन पर भी उतना ही था जितना गौतम पर|…अहिल्या को सयम द्वारा आगत और अनागत सब कुछ देखने की सिद्धि प्राप्त थी…वह जानती थी की मेरे देह का उपभोग करने वाले गौतम नहीं इंद्र और चंद्रमा हैं …उसने कहा \’\'कृतार्थओस्मी\" अर्थात मैं कृतार्थ हुई….वैसे भी ब्रम्ह मुहूर्त में नारी का यह धर्म है की अपने पति का भी विरोध करे…क्योंकि इस तरह से उत्पन्न संतान राक्षस होती है ऐसी हमारी मान्यता है…गौतम ने किसी को भी नहीं बक्शा…चंद्रमा को क्षयी होने का श्राप दिया…इंद्र को सहस्त्र्व्रनी होने का श्राप दिया और अहिल्या को पाषाण होने का श्राप दिया …मुक्ति भी सबकी एक साथ नहीं हुई….चंद्रमा का कम दोष होने के कारण पहले…अहिल्या का उसके बाद और इंद्र का सबसे अंत में…ऐसे और भी प्रश्न है जो हमें शंकाग्रस्त करते है…बहन आपको यह जान कर आश्चर्य होगा की हमारे धर्मग्रन्थों के साथ जम कर व्यभिचार हुआ है …..अंत में इस स्थिति को न सह पाने के कारण एक विद्वान ने रुष्ट होकर यहाँ तक लिख दिया की सतयुग,द्वापर और त्रेता में जो असुर होंगे वे ही कलियुग में छद्म ब्राम्हणों के घर जन्म लेकर वेद और पुरानों में कल्पित श्लोक प्रक्षिप्त कर देंगे (गरुण पुराण, ब्रम्ह खंड)….आज भी तो वही हो रहा है न बहना…इसी मंच पर एक ऐसे व्यक्ति को जबरदस्ती ऋषि बना दिया गया है…जिसका ऋत से कुछ लेना देना ही नहीं है …और चरित्र इतना घ्रिरित की घृणा भी शर्मा जाये….

div81 के द्वारा
November 20, 2010

मेरा मकसद यहाँ या कहीं भी हंगामा करना नहीं है | कुछ जिज्ञासा थी पूछ ली इस बात को गलत तरीके से न ले | अपने धर्म के खिलाफ कुछ कहू ऐसे मेरे संस्कार नहीं जिस धर्म ने सच्चाई का नेकी के रस्ते पर मुझे चलना सिखाया निर्बलो के लिए दया भाव उचित अनुचित का रास्ता जिससे सीखी हूँ उसके लिए गलत बात सोच भी नहीं सकती ऐसा करना अपने आप को अपने अस्तित्व को गलत साबित करने जैसा होगा हमारी पहचान ही हमारे संस्कार है और ये संस्कार हमको सभी को अपने धर्म से मिलते है | कुछ बात है जो मेरे अपने नजरिये से सही नहीं लगे इन बातो से मुझे घर में डांट पड़ चुकी है | सोचा एक जिज्ञासा है जो शांत नहीं हो रही उन सवालो का जवाब पूछ लूँ | अपनी इस पोस्ट से मैं सभी की प्रतिक्रिया हटा रही हूँ | क्यूँ की मैं विवाद खड़ा करना नहीं चाहती जो हुआ उससे एक सबक तो मिला आग से खेलने से नुकसान अपना ही है | मेरी बातो से किसी को दुःख पहुंचा हो उसके लिए क्षमा चाहूंगी |

    chaatak के द्वारा
    November 20, 2010

    दिव्या जी, आपने कमेंट्स हटाकर बिलकुल ठीक किया, जिस तरह से आपने एक अनुकरणीय धर्म का मज़ाक करने की कोशिश करने वालों को जवाब दिया वह कोई सनातन ही कर सकता है| मुझे अंतर्मन में कहीं न कही ये विश्वास जरूर था आप अविश्वासी जरूर हो सकती हैं लेकिन ईश-निंदक नहीं, मेरे विश्वास को आपने सत्य सिद्ध कर दिया| आपका बहुत बहुत धन्यवाद! जय हो !


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