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खुद से, जिंदगी से और खुशियों से

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"कहीं दूर, बहुत दूर, बहुत दूर तक"

Posted On: 1 Dec, 2010 में

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तुम्हें देखते ही
धड़कने बढ़ने लगती है
और सुनाई देती है धडकनों कि आवाज
कहीं दूर बहुत दूर बहुत दूर तक
तुम्हें देखते ही
खुद-ब-खुद नजरें झुकाने लगती है
चली जाती है आँखों से नींद
कहीं दूर बहुत दूर बहुत दूत तक
तुम्हारे चेहरे का,
आकर्षण तुम्हारे चेहरे का
खींच ले जाता है मुझे
कहीं दूर, बहुत दूर, बहुत दूर तक
जानती हूँ मैं
मेरे नहीं हो सकते तुम
फिर भी जाना चाहती हूँ तुम्हारे साथ
कहीं दूर, बहुत दूर, बहुर दूर तक
तुम्हें हमसफर बनाने कि
तमन्ना है मेरी
क्या चलोगे मेरे साथ
कहीं दूर बहुत दूर, बहुत दूत तक

दीदी की डायरी से

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

anamika के द्वारा
December 1, 2010

शब्दों को बहुत सुन्दरता से सजाया है आपने ……………अति सुन्दर

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 1, 2010

div जी, बहुत ही सुन्दर और आकर्षक रचना…आपकी दीदी की डायरी को भी धन्यवाद जिसने इतनी अच्छी रचना को समेटे रख्खा…. http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

Rashid के द्वारा
December 1, 2010

सुन्दर रचना !! http://rashid.jagranjunction.com

abodhbaalak के द्वारा
December 1, 2010

सुन्दर रचना दिव जी काफी समय के पश्चात आपकी कोई रचना पढ़ रहा हूँ, और आपने सदा की भनी इसे वैसा ही लिखा, जैसा की आप लिखती हैं http://abodhbaalak.jagranjunction.com


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