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"कहाँ तुम चले गए"

Posted On: 4 Dec, 2010 Others में

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सात जन्म का साथ निभाने को
लिए थे सात फेरे
किस तरह से हम जियेंगे
तुम बिन हम है अधूरे
रोशन किया  था जहाँ को मेरे
फिर क्या ये हो गया
साथ दिया था जिन रहो पर
तनहा क्यूँ फिर छोड़ दिया
हमकदम बने थे हम तुम
मंजिल एक पाने को
लडखडा रहा हूँ उन राहों में,
तनहा क्यूँ फिर छोड़ दिया
जन्म -जन्म का था अपना वादा
साथ निभाने का
फिर इस जन्म  में तुमने
साथ क्यूँ ये छोड़ दिया
शिकवा तुम से नहीं
किस्मत से लड़ रहा हूँ
साथ हमारा था कम या
मुझे को जीवन ज्यादा दे दिया
छीन  लिया है चैन मुझसे
उम्र भर का गम मुझको दे दिया
हमसफर को छीन मुझसे
तनहा मुझको क्यूँ छोड़ दिया
दूर करदी है मंजिल मुझसे
बीच राह में लाके क्यूँ तोड़ दिया
साथ हमारा था कम या
मुझको जीवन ज्यादा दे दिया

loneliness

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
December 7, 2010

दिव्या जी, विछोह के दर्द को खूब बयान किया आपने! अग्रज अश्विनी कुमार जी की टिप्पड़ी से बड़ा सुबूत और क्या होगा कि आपकी इन पंक्तियों ने कहीं न कहीं दिल में उठ रही टीस से साम्य स्थापित किया है| अच्छी रचना ! बेहतरीन उदगार!

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    चातक जी, भगवन न करे किसी को विछोह का ये दर्द सहना पढ़े | दादा के विषय में जानकर बहुत दुःख हुआ |

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 6, 2010

div जी, बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुती.दिल को बहुत अच्छा लगा आपकी ये कविता पढ़कर.. आकाश तिवारी

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    आकाश जी, आप का बहुत बहुत शुक्रिया

K M Mishra के द्वारा
December 5, 2010

अश्विनी जी के अंतर्मन की पीड़ा को कविता का रूप देने के लिये आभारी हूं ।

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    मिश्रा जी, आप का शुक्रिया क्या कहूँ कुछ समझ नहीं आ रहा है |

nikhil के द्वारा
December 5, 2010

दिव्या जी बढ़िया रचना सुन्दर प्रस्तुतीकरण

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    निखिल जी आप का शुक्रिया

abodhbaalak के द्वारा
December 5, 2010

रौशनी जी सुन्दर कविता, किसी प्रेम में डूबे की पीड़ा को भली भांति दर्शाती हुई जिसका प्रेम उस से बिछड़ गया, आपकी रचनाओं का अपना ही एक रंग होता है, ऐसे ही लिखती रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    अबोध जी, आप का शुक्रिया

Harish Bhatt के द्वारा
December 5, 2010

दिव्या जी नमस्ते, बहुत ही अच्छा. हार्दिक बधाई.

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    हरीश जी आप का शुक्रिया |

आर.एन. शाही के द्वारा
December 5, 2010

बहन, आपने संसार की कठोर सच्चाइयां बयान की हैं । विधाता ही इन रहस्यों को जानता है कि वह इतना निष्ठुर क्यों हो जाता है । साधुवाद ।

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    सच कहा आप ने शाही जी कई बार विधाता निष्ठुर हो जाता है | आप का शुक्रिया

Dharmesh Tiwari के द्वारा
December 5, 2010

दिव्या जी नमस्ते,सुन्दर शब्दों को पिरोकर लाईनों में किसी के दर्द को बयां करती हुई प्रस्तुति ,धन्यवाद!

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    धर्मेश जी नमस्ते, आप का शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
December 5, 2010

दिव जी,सच में आपकी पंक्तियाँ द्रवित कर गयीं.

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    निशा जी आप का शुक्रिया |

ASHVINI KUMAR के द्वारा
December 5, 2010

धन्यवाद मेरी प्रिय बहन मेरे अंतर के भावों को शब्द देने के लिए …तुम्हारा दादा

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    दादा, शब्द नहीं है कुछ कहने के लिए बस भगवान से ये है प्रार्थना है वो आप की हौसला दे | आक की बहन

Rashid के द्वारा
December 5, 2010

शिकवा तुम से नहीं, किस्मत से लड़ रहा हूँ दिव्या जी ,, किस्मत या भाग्य तो हमारे जनम से पहले ही लिख दिया जाता है,, हम तो बस नाटक के उस पात्र की तरह है जो एक पहले से लिखा हुआ किरदार निभाता है उसका अपना योगदान सिर्फ इतना है की यह इस किरदार को कितनी अच्छी तरह से निभा पाता है !! दुःख सुख मिलना जुदा होना सब जीवन रूपी इस कहानी के रंग है और कुछ नहीं !! एक भावनात्मक प्रस्तुति के किया शुक्रिया !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    राशिद जी, सच कहा आप ने मगर जिस पर बीतती है दर्द वो ही जनता है किसी से जुदाई बर्दाश की जा सकती है की किसी मुद पर मुलाकत तो हो जाएगी मगर जहाँ साथ ही छुट जाये ?????????? उस दर्द को समझना मुश्किल है आप का शुक्रिया

Wahid के द्वारा
December 5, 2010

कृपया इस टिप्पणी पर नाराज़ न हों| शब्दों ने साथ शायद छोड़ दिया हो पर भावनाओं ने आपका साथ नहीं छोड़ा| सुन्दर भावार्थ के साथ ये गीत पसंद आया|

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    वाहिद जी, नाराजगी वाली कोई बात नहीं | आप का शुक्रिया

suryaprakash tiwadi के द्वारा
December 4, 2010

दर्दभरी इस रचना ने सीधे दिल तक दस्तक दी है.अच्छी रचना के लिए बधाई

    div81 के द्वारा
    December 8, 2010

    सूर्यप्रकाश जी, आप का शुक्रिया


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