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"मौत"

Posted On: 8 Dec, 2010 Others में

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मृत्यु का सार है क्या
इन्सान कि हार है क्या
जीता है ये सब से
बेबस क्यूँ है आगे इसके
किस बात का फिर दंभ भरता है
मौत के आगे झुक के
जीवन का अंत करता है
रोता बिलखता छोड़ ये सब को
अनंत कि और ये चलता है
रोक सका न कोई इसको
किसी के आगे न ये रुक  पाई है
फिर भी इन्सान को जीने कि कला कहाँ आ पाई है

क्रोध, लोभ, हिंसा, व्यभिचार, का

तांडव ये रच रहा
मौत के आगे फिर क्यूँ
बेबस ये दिख रहा

मौत के आगे फिर क्यूँ
बेबस ये दिख रहा

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Harish Bhatt के द्वारा
December 9, 2010

दिव्या जी, बहुत ही खूबसूरत कविता के लिए हार्दिक बधाई.

    div81 के द्वारा
    December 11, 2010

    हरीश जी, कविता को पसंद करने और प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
December 9, 2010

दिव्या जी,सही कहा आपने ,जीवनचक्र के सत्य को जानते हुए मनुष्य अनैतिकता की अँधेरी गलियों में भागता रहता है.अच्छी प्रस्तुति

    div81 के द्वारा
    December 11, 2010

    निशा जी, नमस्कार आप की टिप्पणी से अच्छा लिखने की प्रेरणा मिलती है | आप का शुक्रिया

Wahid के द्वारा
December 8, 2010

नैतिकता की कसौटी पर खरी उतरती हुई भावनाएँ जगाती सुन्दर पंक्तियाँ| बहुत धन्यवाद| वाहिद http://kashiwasi.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 11, 2010

    वाहिद जी, खुबसूरत प्रतिक्रिया का शुक्रिया

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 8, 2010

div जी, बहुत खूबसूरत प्रस्तुती………. मनुष्य की हकीकत बयां की है.. आकाश तिवारी

    div81 के द्वारा
    December 11, 2010

    आकाश जी, आप का शुक्रिया


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