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मुबारक हो एक और अपमान

Posted On: 10 Dec, 2010 Others में

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भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था कुछ तो अंग्रेजो ने उस चिड़िया के पंख नोचे बची खुची इज्जत को  तार तार इन नेताओ ने कर दिया अंग्रेज तो लूट के अपने घर ले गए थे, ये बेशर्म तो अपने घर को ही बेचने को तैयार है स्विस बैंक रूपी कुबेर का खजाना जो भरना है |

देश की बागडोर किन हाथो में है इस का अनुमान तो सभी को  है | भ्रष्ट होना तो इन लोगों की स्पेशलिटी है अरे हाथ में सत्ता हो और उसका गुरुर न हो | पागल ही होगा कोई जो जनता के विषय में सोचेगा, जनता से बढ़कर देश के  विषय में सोचेगा  | हद होती है बेशर्मी की कहते है न पीने वालो को पीने का बहाना चाहिए ऐसे ही इन नेताओ को अपने देश को अपमानित करने का मौका भर चाहिए | दे दीजिये इन को मौका देखिये ये क्या क्या नहीं करते भ्रष्ट ये होते है, घोटाले ये करते है, सारी धांधलियां  ये करते है और देश  को कलंकित भी ये ही करते है |

ऐसा ही मौका मिला माननीय पीसीसी के प्रभारी मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी सुभाष शर्माजी को मौका था देश की आदर्श बहू और कुशल राजनीतिज्ञ श्रीमती सोनिया गाँधी का जन्मदिन का इतने खास मौके रोज तो आते नहीं है और वैसे भी ये आतंकवादी  घटनाये तो आम बात है और आम घटनाओ से तो नेता जी का कुछ लेना देना है नहीं खास बात थी श्रीमती सोनिया गाँधी “जी ” (माफ़ी चाहूंगी जी लगाना भूल गयी थी ) के जन्मदिन को मनाया कैसे जाये खास शख्सियत है तो खास और नायब तरीका होना चाहिए न | चाहे देश को अपमानित ही क्यूँ न होना पड़े, चाहे देश के गौरव को ठेष ही क्यूँ न पहुंचे इस विषय में न पहले सोचा गया, न अब सोचा जायेगा तो मँगा लिया केक अब इससे फर्क क्या पढता  है  उसमे राष्ट्री गर्व का प्रतीक राष्ट्र ध्वज को केक के रूप में सजाया गया कटा गया और खाया गया |

Picture1

इसके केक में राष्ट्रीय ध्वज के तीन रंग थे। ऊपर केसरिया और नीचे हरा रंग था। बीच में सफेद रंग के साथ नीले रंग से अशोक चक्र बनाया गया था। इसके ऊपर सोनिया गांधी को 64वें जन्मदिन पर बधाई लिखा गया था। कांग्रेस भवन के इस उत्सव में पीसीसी के प्रभारी मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी सुभाष शर्मा ने केक काटा। शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल सहित प्रमुख नेता भी इसमें मौजूद थे। कार्यकर्ताओं ने सोनिया गांधी जिंदाबाद के नारे लगाए। उस वक्त नगर निगम के पार्षद जगदीश आहूजा, सतनाम सिंह पनाग भी वहां मौजूद थे।

सन्देश रूप में ये बात आ ही गयी की हम देश से कितना प्यार करते है देश से बढ़कर हमारे लिए क्या है और अपने देश के लिए हम किस हद तक जा सकते है

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20 प्रतिक्रिया

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K M Mishra के द्वारा
December 11, 2010

पेश है डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित एक विस्तृत लेख का हिन्दी अनुवाद, जिसमें इनमें से कई प्रश्नों के जवाब मिलते हैं (और आज तक न तो सोनिया गाँधी द्वारा अथवा कॉंग्रेस भक्तों द्वारा डॉ. स्वामी पर कोई “मानहानि” (!) का मुकदमा दायर किया गया है) – . “मेरा (मतलब डॉ.स्वामी का) सोनिया गाँधी का विरोध सिर्फ़ इसी बात को लेकर नहीं है कि उनका जन्म इटली में हुआ है, क्योंकि यह कोई मुद्दा नहीं है, बल्कि इटली सहित किसी और देश में विदेशी मूल की बात का फ़ैसला वहाँ के न्यायालयों ने किया हुआ है, कि सर्वोच्च और महत्वपूर्ण पदों पर विदेशी मूल का व्यक्ति नहीं पदासीन हो सकता, लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है। 17 मई 2004 को 12.45 पर राष्ट्रपति ने मुझे मिलने का समय दिया था, उसी समय मैंने उनसे कहा था कि यदि सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दूँगा, और “रजिस्ट्रेशन” द्वारा नागरिकता हासिल किये जाने के कारण उसे रद्द किया भी जा सकता है। . भारतीय नागरिकों को सोनिया की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी हासिल करना बेहद मुश्किल बात है, क्योंकि इटली के जन्म के कारण और वहाँ की भाषाई समस्याओं के कारण किसी पत्रकार के लिये भी यह मुश्किल ही है (भारत में पैदा हुए नेताओं की पृष्ठभूमि के बारे में हम कितना जानते हैं?) लेकिन नागरिकों को जानने का अधिकार तो है ही। सोनिया के बारे में तमाम जानकारी उन्हीं के द्वारा अथवा काँग्रेस के विभिन्न मुखपत्रों में जारी की हुई सामग्री पर आधारित है, जिसमें तीन झूठ साफ़ तौर पर पकड़ में आते हैं। . पहला झूठ – सोनिया गाँधी का असली नाम “सोनिया” नहीं बल्कि “ऎंटोनिया” है, यह बात इटली के राजदूत ने 27 अप्रैल 1983 को लिखे पत्र में स्वीकार की है, यह पत्र गृह मंत्रालय नें अपनी मर्जी से कभी सार्वजनिक नहीं किया। “एंटॊनिया” नाम सोनिया गाँधी के जन्म प्रमाणपत्र में अंकित है। सोनिया गाँधी को “सोनिया” नाम उनके पिता स्व.स्टेफ़ानो माईनो ने दिया था। स्टीफ़ानो माइनो द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त रूस में युद्ध बन्दी थे। स्टीफ़ानो ने एक कार्यकर्ता के तौर पर “नाजी” सेना में काम किया था, जैसा कि कई इटालियन फ़ासिस्टों ने किया था। “सोनिया” एक रूसी नाम है न कि इटालियन। रूस में बिताये जेल के लम्हों में सोनिया के पिता धीरे-धीरे रूस समर्थक बन गये थे, खासकर तब जबकि उन समेत इटली के सभी “फ़ासिस्टों” की सम्पत्ति अमेरिकी सेनाओं द्वारा नष्ट या जब्त कर ली गई थी। . दूसरा झूठ – उनका जन्म इटली के लूसियाना में हुआ, ना कि जैसा उन्होंने संसद में दिये अपने शपथ पत्र में उल्लेख किया है कि “उनका जन्म ओरबेस्सानो में हुआ”। शायद वे अपना जन्म स्थान “लूसियाना” छुपाना चाहती हैं, क्योंकि इससे उनके पिता के नाजियों और मुसोलिनी से सम्बन्ध उजागर होते हैं, जबकि उनका परिवार लगातार नाजियों और फ़ासिस्टों के सम्पर्क में रहा, युद्ध समाप्ति के पश्चात भी। लूसियाना नाजियों के नेटवर्क का मुख्य केन्द्र था और यह इटली-स्विस सीमा पर स्थित है। इस झूठ का कोई औचित्य नजर नहीं आता और ना ही आज तक उनकी तरफ़ से इसका कोई स्पष्टीकरण दिया गया है। . तीसरा झूठ – सोनिया गाँधी का आधिकारिक शिक्षण हाई स्कूल से अधिक नहीं हुआ है। लेकिन उन्होंने रायबरेली के 2004 लोकसभा चुनाव में एक शपथ पत्र में कहा है कि उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया हुआ है। यही झूठ बात उन्होंने सन 1999 में लोकसभा में अपने परिचय पत्र में कही थी, जो कि लोकसभा द्वारा “हू इज़ हू” के नाम से प्रकाशित की जाती है। बाद में जब मैंने लोकसभा के स्पीकर को लिखित शिकायत की, कि यह घोर अनैतिकता भरा कदम है, तब उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा “टाईपिंग” की गलती की वजह से हुआ (ऐसा “टायपिंग मिस्टेक” तो गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड़्स में शामिल होने लायक है)। सच्चाई तो यह है कि सोनिया ने कॉलेज का मुँह तक नहीं देखा है। वे जिआवेनो स्थित एक कैथोलिक स्कूल जिसका नाम “मारिया ऑसिलियाट्रिस” में पढने जाती थीं (यह स्कूल उनके तथाकथित जन्म स्थान ओरबेस्सानो से 15 किमी दूर स्थित है)। गरीबी के कारण बहुत सी इटालियन लड़कियाँ उन दिनों ऐसी मिशनरी में पढने जाया करती थीं, और उनमें से बहुतों को अमेरिका में सफ़ाई कर्मचारी, वेटर आदि के कामों की नौकरी मिल जाती थी। उन दिनों माइनो परिवार बहुत गरीब हो गया था। सोनिया के पिता एक मेसन और माँ एक खेतिहर मजदूर के रूप में काम करती थीं (अब इस परिवार की सम्पत्ति करोड़ों की हो गई है!)। फ़िर सोनिया इंग्लैंड स्थित केम्ब्रिज कस्बे के “लेन्नॉक्स स्कूल” में अंग्रेजी पढने गईं, ताकि उन्हें थोड़ा सम्मानजनक काम मिल जाये। यह है उनका कुल “शिक्षण”, लेकिन भारतीय समाज को बेवकूफ़ बनाने के लिये उन्होंने संसद में झूठा बयान दिया (जो कि नैतिकता का उल्लंघन भी है) और चुनाव में झूठा शपथ पत्र भी, जो कि भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराध भी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार प्रत्याशी को उसकी सम्पत्ति और शिक्षा के बारे में सही-सही जानकारी देना आवश्यक है। इन तीन झूठों से साबित होता है कि सोनिया गाँधी कुछ “छिपाना” चाहती हैं, या उनका कोई छुपा हुआ कार्यक्रम है जो किसी और मकसद से है, जाहिर है कि उनके बारे में और जानकारी जुटाना आवश्यक है। . कुमारी सोनिया गाँधी अच्छी अंग्रेजी से अवगत होने के लिये केम्ब्रिज कस्बे के वार्सिटी रेस्टोरेंट में काम करने लगीं, वहीं उनकी मुलाकात 1965 में राजीव गाँधी से पहली बार हुई। राजीव उस यूनिवर्सिटी में छात्र थे और पढ़ाई मे कुछ खास नहीं थे, इसलिये राजीव 1966 में लन्दन चले गये जहाँ उन्होंने इम्पीरियल इंजीनियरिंग कॉलेज में थोड़ी शिक्षा ग्रहण की। सोनिया भी लन्दन चली गईं जहाँ उन्हें एक पाकिस्तानी सलमान थसीर के यहाँ नौकरी मिल गई। सलमान थसीर साहब का अधिकतर बिजनेस दुबई से संचालित होता था, लेकिन वे अधिकतर समय लन्दन में ही डटे रहते थे। इस नौकरी में सोनिया गाँधी ने अच्छा पैसा कमाया, कम से कम इतना तो कमाया ही कि वे राजीव गाँधी की आर्थिक मदद कर सकें, जिनके “खर्चे” बढते ही जा रहे थे (इन्दिरा गाँधी भी उनके उन खर्चों से काफ़ी नाराज थीं और ऐसा उन्होंने खुद मुझे बताया था जब मेरी मुलाकात ब्रांडेस विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में उनसे हुई थी और उस वक्त मैं हार्वर्ड में वाणिज्य का प्रोफ़ेसर लगा ही था)। संजय गाँधी को लिखे राजीव गाँधी के पत्रों से यह स्पष्ट था कि राजीव, सोनिया के आर्थिक कर्जे में फ़ँसे हुए थे और राजीव ने संजय से मदद की गुहार की थी, क्योंकि संजय उनके कर्जों को निपटाने में सक्षम(?) थे। उस दौरान राजीव अकेले सोनिया गाँधी के मित्र नहीं थे, माधवराव सिंधिया और एक जर्मन स्टीगलर उनके अंतरंग मित्रों में से एक थे। माधवराव से उनकी दोस्ती राजीव से शादी के बाद भी जारी रही। . बहुत कम लोगों को यह पता है कि 1982 में एक रात को दो बजे माधवराव की कार का एक्सीडेंट आईआईटी दिल्ली के गेट के सामने हुआ था, और उस समय कार में दूसरी सवारी थीं सोनिया गाँधी। दोनों को बहुत चोटें आई थीं, आईआईटी के एक छात्र ने उनकी मदद की, कार से बाहर निकाला, एक ऑटो रिक्शा में सोनिया को इंदिरा गाँधी के यहाँ भेजा गया, क्योंकि अस्पताल ले जाने पर कई तरह से प्रश्न हो सकते थे, जबकि माधवराव सिन्धिया अपनी टूटी टाँग लिये बाद में अकेले अस्पताल गये। जब परिदृश्य से सोनिया पूरी तरह गायब हो गईं तब दिल्ली पुलिस ने अपनी भूमिका शुरु की। बाद के वर्षों में माधवराव सिंधिया सोनिया के आलोचक बन गये थे और मित्रों के बीच उनके बारे में “कई बातें” करने लगे थे। यह बड़े आश्चर्य और शर्म की बात है कि 2001 में माधवराव की मृत्यु और उनके विमान दुर्घटना की कोई गहन जाँच नहीं हुई, जबकि उसी विमान से मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी जाने वाले थे और उन्हें आखिरी समय पर सिंधिया के साथ न जाने की सलाह दी गई थी। . राजीव गाँधी और सोनिया का विवाह ओर्बेस्सानो में एक चर्च में हुआ था, हालांकि यह उनका व्यक्तिगत लेकिन विवादास्पद मामला है और जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन जनता का जिस बात से सरोकार है वह है इन्दिरा गाँधी द्वारा उनका वैदिक रीति से पुनः विवाह करवाना, ताकि भारत की भोली जनता को बहलाया जा सके, और यह सब हुआ था एक सोवियत प्रेमी अधिकारी टी.एन.कौल की सलाह पर, जिन्होंने यह कहकर इन्दिरा गाँधी को इस बात के लिये मनाया कि “सोवियत संघ के साथ रिश्तों को मजबूत करने के लिये यह जरूरी है”, अब प्रश्न उठता है कि कौल को ऐसा कहने के लिये किसने उकसाया? . जब भारतीय प्रधानमंत्री का बेटा लन्दन में एक लड़की से प्रेम करने में लगा हो, तो भला रूसी खुफ़िया एजेंसी “केजीबी” भला चुप कैसे रह सकती थी, जबकि भारत-सोवियत रिश्ते बहुत मधुर हों, और सोनिया उस स्टीफ़ानो की पुत्री हों जो कि सोवियत भक्त बन चुका हो। इसलिये सोनिया का राजीव से विवाह भारत-सोवियत सम्बन्धों और केजीबी के हित में ही था। राजीव से शादी के बाद माइनो परिवार के सोवियत संघ से सम्बन्ध और भी मजबूत हुए और कई सौदों में उन्हें दलाली की रकम अदा की गई । डॉ.येवेग्निया अल्बाट्स (पीएच.डी. हार्वर्ड) एक ख्यात रूसी लेखिका और पत्रकार हैं, वे बोरिस येल्तसिन द्वारा सन 1991 में गठित एक आयोग की सदस्या थीं, ने अपनी पुस्तक “द स्टेट विदिन अ स्टेट : द केजीबी इन सोवियत यूनियन” में कई दस्तावेजों का उल्लेख किया है, और इन दस्तावेजों को भारत सरकार जब चाहे एक आवेदन देकर देख सकती है। रूसी सरकार ने सन 1992 में डॉ. अल्बाट्स के इन रहस्योद्घाटनों को स्वीकार किया, जो कि “हिन्दू” में 1992 में प्रकाशित हो चुका है । उस प्रवक्ता ने यह भी कहा कि “सोवियत आदर्शों और सिद्धांतों को बढावा देने के लिये” इस प्रकार का पैसा माइनो और कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनावों के दौरान दिया जाता रहा है । 1991 में रूस के विघटन के पश्चात जब रूस आर्थिक भंवर में फ़ँस गया तब सोनिया गाँधी का पैसे का यह स्रोत सूख गया और सोनिया ने रूस से मुँह मोड़ना शुरु कर दिया। मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही रूस के वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन (जो कि घुटे हुए केजीबी जासूस रह चुके हैं) ने तत्काल दिल्ली में राजदूत के तौर पर अपना एक खास आदमी नियुक्त किया जो सोनिया के इतिहास और उनके परिवार के रूसी सम्बन्धों के बारे में सब कुछ जानता था। अब फ़िलहाल जो सरकार है वह सोनिया ही चला रही हैं यह बात जब भारत में ही सब जानते हैं तो विदेशी जासूस कोई मूर्ख तो नहीं हैं, इसलिये उस राजदूत के जरिये भारत-रूस सम्बन्ध अब एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। हम भारतवासी रूस से प्रगाढ़ मैत्री चाहते हैं, रूस ने जब-तब हमारी मदद भी की है, लेकिन क्या सिर्फ़ इसीलिये हमें उन लोगों को स्वीकार कर लेना चाहिये जो रूसी खुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे हों? अमेरिका में भी किसी अधिकारी को इसराइल के लिये जासूसी करते हुए बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भले ही अमेरिका के इसराइल से कितने ही मधुर सम्बन्ध हों। सम्बन्ध अपनी जगह हैं और राष्ट्रहित अलग बात है। दिसम्बर 2001 में मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करके सभी दस्तावेज प्रस्तुत कर, केजीबी और सोनिया के सम्बन्धों की सीबीआई द्वारा जाँच की माँग की थी, जिसे वाजपेयी सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया। इससे पहले तत्कालीन राज्य मंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया ने 3 मार्च 2001 को इस केस की सीबीआई जाँच के आदेश दे दिये थे, लेकिन कांग्रेसियों द्वारा इस मुद्दे पर संसद में हल्ला-गुल्ला करने और कार्रवाई ठप करने के कारण वाजपेयी ने वसुन्धरा का वह आदेश खारिज कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2002 में सीबीआई को रूसी सम्बन्धों के बारे में जाँच करने के आदेश दिये। सीबीआई ने दो वर्ष तक “जाँच” (?) करने के बाद “बिना एफ़आईआर दर्ज किये” कोर्ट को यह बताया कि सोनिया और रूसियों में कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन सीबीआई को FIR दर्ज करने से किसने रोका, वाजपेयी सरकार ने, क्यों? यह आज तक रहस्य ही है। इस केस की अगली सुनवाई होने वाली है, लेकिन अब सोनिया “निर्देशक” की भूमिका में आ चुकी हैं और सीबीआई से किसी स्वतन्त्र कार्य की उम्मीद करना बेकार है।

    div81 के द्वारा
    December 16, 2010

    कानून अँधा है और हम सब गाँधी जी के बन्दर जो आँख कान और मुह में हाथ रखकर बैठे है | बहुत जानकारी दी आपने आप का बहुत बहुत आभार |

allrounder के द्वारा
December 11, 2010

नमस्कार Div81 जी, प्रशंशा करनी होगी आपकी जागरूकता की जो आपकी नजर इस राष्ट्रीय अपमान पर पड़ी, मगर क्या कहें इन देश के कर्ण आधारों को जो खुली आँख से ये सब नहीं देख पाते ! इनके लिए तो यही कहना होगा कि ” हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम – ए – गुलिस्तां क्या होगा !

    div81 के द्वारा
    December 16, 2010

    वैसे तो उल्लुओ की हालत बड़ी ही चिंताजनक है इनकी sankhya kam hoti ja rahi है | मगर ये भ्रष्ट नेताओ की संख्या दिन प्रतिदिन बढ रही है साथ ही इनके कारनामे भी |

Rashid के द्वारा
December 11, 2010

div जी ,, आपके लेख बेहद दुःख और अफ़सोसनाक हालात का सुबूत है,, यह दर्शाता है की हम किस क़दर निष्ठुरं हो चुके है!! और इन जन प्रतिनिधियों की कितनी निष्ठां देश और राष्ट्र ध्वज के लिए बची है, रही कानून की बात तो उसका तो डर अब आम आदमी को नहीं रहा तो फिर नेताओ को क्या होगा !! बेशर्मी की भी कोई हद होती है अब इन लोगो से किसी अच्छाई की क्या उम्मीद की जा सकती है !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 16, 2010

    रसीद जी हालत अफसोसजनक नहीं चिंताजनक हो गए है | कानून लागू होने के लिए नहीं टूटने के लिए बनते है इसका प्रमाण हर कोई दे रहा है | कानून को तो ये अपनी पॉकेट में ले कर चलते है |

atharvavedamanoj के द्वारा
December 11, 2010

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं है पशु निरा और मृतक समान है|| दिव्या जी…यह तो उनके लिए है जो हमारे देश के नागरिक हैं….जब इटली की नौकरानी हमारे देश की राजरानी बनेगी तो यही होगा न| कम्बख्क्त हम भारतीय इतिहास से भी कुछ नहीं सीखना चाहते| प्रिंस चार्ल्स को बम्बई दहेज़ में दे दिया गया और सोनिया मैनो को तिरंगा मुंह दिखाई के रूप में दे दिया गया है…अभी कुछ कहूँगा तो लोग कहेंगे आपने भाषा को संयत नहीं रखा…बस गाली नहीं निकल रही है यही क्या कम है? हमरी अस्मिता तार तार की जा रही है और हम चुप रहें…दिव्या बहन आपने जिस मजबूती के साथ इस मुद्दे को उठाया है उसकी जितनी भी सराहना की जय कम है और सोनिया के गुर्गों ने हमारे राष्ट्र ध्वज का जो अपमान किया है उसकी जितनी भी भर्त्सना की जय कम है…शर्म करो सोनिया शर्म करो

    div81 के द्वारा
    December 16, 2010

    अपने ही देश के गौरव को अपमानित तो ये नेता लोग कर रहे है सोनिया जी तो इतरा रही है कितने लोगो को मैं मुर्ख बना सकती हूँ और वो मुझे खुश कर सकते है | मगर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएयी एक दिन अपने ही देश वापस जाएगी | इन लोगो की जितनी भी भर्त्सना की जाये कम है

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 10, 2010

div जी, आपने शायद सुना नहीं की जब सोनिया जी इलाहबाद आई थी तो बैनर और पोस्टर पर उनका नाम “माता भारत” के रूप में लिखा हुआ था….अब भाई जब उन्होंने भारत के सारे संकट को दूर किया होगा तभी तो उनका ऐसा नाम पड़ा जैसे की…इनके राज में घोटाले नहीं हुए,महंगाई पहले की सरकार की तुलना में आधी हो गयी,कश्मीर विवाद सुलझ गया और हाँ…स्विस बैंक में जमा भारतीय धन भी वापस आ गया….अब जब इन्होने देश के लिए इन कुछ किया है तो इनका ऐसा ही जन्मदिन भी मनाना चाहिए…..कांग्रेस पे थू…कांग्रेसी नेता पर भी थू….. आकाश तिवारी

    div81 के द्वारा
    December 11, 2010

    आकाश जी , जंगल में जब सायानी लोमड़ी राज करेगी तो आप समझ सकते है क्या हाल होगा | आप की प्रतिक्रिया की लिए धन्यवाद

chaatak के द्वारा
December 10, 2010

धिक्कार है इन राष्ट्र के दलालों पर राष्ट्र ध्वज पर छुरी चलाने वाली ये दर्जा पांच पास ये विदेशी अय्याश की नौकरानी अभी न जाने कितने खून के घूँट पीने पर मजबूर करेगी| आप सोच नहीं सकते कि इस समय दिल की कैफियत क्या है! काश…….. अंधों की आँखें खोलने के लिए इस पोस्ट को मंच पर रखने का बहुत बहुत धन्यवाद!

    div81 के द्वारा
    December 11, 2010

    चातक जी सही कहा आप ने पांचवी पास ये लोग देश का इतिहास नहीं जानते देश का गौरव नहीं जानते तलवा चाट चाट के अब देश को भी चाटना शुरू कर दिया है सच है की कितने खून के घूंट और पीना पढ़ेगा | अँधा कोई नहीं है सब ने आँखों में पट्टी बाँधी है सच न कोई सुनना चाहता है न देखना

    atharvavedamanoj के द्वारा
    December 11, 2010

    प्रिय मित्र चातक जी… इन लोगों ने जो छुरी हमारे राष्ट्र ध्वज पर चलाया है…वह आम हिन्दुस्तानी के कंठ पर चला है…भला तिरंगे की दलाली करने वाले लोग क्या जानेंगे की तिरंगे की तासीर क्या होती है…विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,वे कहते हैं चाँद सितारा….चाँद सितारा तार करो रे…चलो आज हुंकार करो रे| अब लोग इस चाँद सितारे की भी भ्रामक छवि न प्रस्तुत कर दे..इसलिए कहना पड़ रहा है की इस तरह का चिन्ह हमारे पडोसी के झंडे में शोभायमान है| वन्देमातरम

    chaatak के द्वारा
    December 12, 2010

    प्रिय भाई मनोज जी, जब दिव्या जैसी पैनी नज़र रखने वाली हिन्दुस्तानी कौम का उद्भव शुरू हो गया है तो ऐसे में आम हिन्दुस्तानी के की गर्दन पर छुरी चलने वाले इन दलालों को करार जवाब जरूर मिलेगा| ये बात अलग है की ये छुरी चलाएंगे और हम बटन दबायेंगे| बिहार में ये चरित्रहीन कांग्रेसी बटन की मार खा चुके हैं इस बार अन्य राज्यों में आम चुनावों में भी इन्हें इस बटन की मार भारी पड़ने वाली है| सोनिया तो राहुल मायनों को लेकर इटली भाग जाएँगी लेकिन इन देशी दलालों का क्या होगा (भाई गब्बर सिंह वाली इस्टाइल में मत पढना)? मंच पर कांग्रेस के चरित्र का पर्दाफाश करने के लिए दिव्या जी को एक बार फिर कोटिशः आभार!

    div81 के द्वारा
    December 16, 2010

    झण्डा ऊँचा रहे हमारा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झण्डा ऊँचा रहे हमारा शान न इसकी जाने पाये चाहे जान भले ही जाये विश्‍व विजयी कर के दिखलाएं तब होए प्रण पूर्ण हमारा झण्डा ऊँचा रहे हमारा …517507

Wahid के द्वारा
December 10, 2010

आपकी स्पष्टवादी सोच को नमन| राष्ट्रध्वज के रंगों को सिर्फ़ रंग समझ कर और अपनी पार्टी की जागीर समझ बैठे ये लोग सिर्फ़ धिक्कार के अधिकारी हैं| वाहिद http://kashiwasi.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 11, 2010

    वाहिद जी ये लोग dhikkar के नहीं फटकार के अधिकारी है और ये फटकार जनता द्वारा ही मिले तब ही इनकी अक्कल ठिकाने आएगी |

ashutoshda के द्वारा
December 10, 2010

बहुत खूब div जी आपको भी मुबारक हो वैसे कांग्रेस के नेता देश की सेवा कम सोनिया गाँधी जी की सेवा ज्यादा करते है अब इस सेवा में किसी का अपमान भी (चाहे वो रास्ट्रीय ध्वज का क्यों न हो ) हो जाये तो क्या फरक पड़ता है सोनिया गाँधी जी खुश तो सब खुश ! वैसे आपके इस ब्लॉग पर एक टिपण्णी सोनिया गाँधी जी की भी होनी चाहिए आशुतोष दा

    div81 के द्वारा
    December 11, 2010

    आशुतोष दा, कहते है न की थोड़े को बहुत समझना मगर यहाँ तो बहुत कुछ भी कहलो मगर कम ही है neta लोग विशेष फेक्टरी में तय्यार होते है जहाँ पर ye sabse pahle अपनी इज्जत बेचते है फिर देश की इज्जत को दाव पर lagate है | सोनिया गाँधी जी पर क्या टिपण्णी करनी वो तो इतिहास रच रही है त्याग, बलिदान की मूर्ति है उन्होंने कांग्रेस को नवजीवन प्रदान किया है और देश को नौसिखिया प्रधानमंत्री नहीं देना चाहती इस लिए बाबा की ट्रेनिंग चल रही है ट्रेनिंग का पहला भाग था गरीबो के बीच जा कर काम करके लोकप्रिय होने का और अभी अभी उन्होंने विवादित टिपण्णी देना सिखा है | देखे आगे की ट्रेनिंग क्या रंग लती है

    ashutoshda के द्वारा
    December 11, 2010

    वैसे हमारे युवराज अरे क्रिकेटर युवराज नहीं अरे अपने राहुल भैया बिहार राज्य की परीक्षा में तो फेल हो गए है अब उन्हें उत्तर प्रदेश में फिर से मौका मिलेगा देखते है इस बार पास होते है या नहीं वैसे उनके उतर प्रदेश के नक़्शे में केवल राय बरेली और अमेठी ही है बाकि सब उतर प्रदेश के बाहर है उन्हें एक बार उतर प्रदेश का नक्शा जरूर दिखा देना आशुतोष दा


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