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"इलाज सम्भव है"

Posted On: 16 Dec, 2010 Others में

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मुन्नी को छोड़ बेटा जब जगजीत  की ग़ज़ल गाने लगे
दोस्तों कि महफील में कम
घर की छत को तकते हुए पाया जाने लगे
सौ सौ  नखरे खाने पर जो निकलता था
शाम के खाने में क्या खायेगा बेटा कहने पर
कुछ भी चलेगा माँ कहने लगे
आईने के आगे खड़े हो कर
अपने को निहारने जब वो लगे
पूछने पर आप से लव यू मम्मा कह कर
गलबहियां डाल के मुस्कुराने लगे
संभल जाईये बेटा प्रेमरोग से ग्रसित  हो गया है
अभी से ही रोक लीजिये नहीं तो फंस वो गया है
इलाज संभव है पहले ही लक्ष्ण में
नहीं तो  रोग ये लाइलाज हो जायेगा

बेटा आप के हाथ से ही नहीं
घर छोड़ के भी चला जायेगा
आटे दाल का भाव मालूम  चलते ही
लोट  जरुर वो  आएगा
मगर तब तलक बेटा साथ अपने
बहु के साथ पोता भी ले आएगा
तब पछतावे के हाथ कुछ न आएगा
इलाज संभव है पहले ही लक्षण में
नहीं तो रोग ये लाइलाज बन जायेगा

बेटे को छिनने वाली को आप, एक आँख न देख पाओगी
घर को युद्ध का मैदान अपने ही वचनों से बनाओगी
आप भी भारतीय सास वाले रूप में आ जाओगी
बहु से तू तू मैं मैं कर अपनी ही शान घटाओगी
तब पछतावे के हाथ कुछ न आएगा
इलाज संभव है पहले ही लक्षण में
नहीं तो रोग ये लाइलाज बन जायेगा

बहु दिन भर कुडेगी, शाम को बेटे के कान वो भरेगी
एक की चार लगा कर, आप की शिकायत वो करेगी
बेटा भी गृह कलेश का शिकार हो जायेगा
बात बेबात आप की इज्जत को
तार तार वो कर जायेगा
तब पछतावे के हाथ कुछ न आएगा
इलाज सम्भव है पहले ही लक्षण में
नहीं तो रोग ये लाइलाज बन जायेगा

बुढ़ापा आप का अंधकारमय हो जायेगा
पाला पोसा था जिस दिन के लिए
वो दिन में तारे दिखायेगा
गठिया से ग्रसित काया को
वो गठरी बना के कहीं छोड़ आएगा
तब पछतावे के हाथ कुछ न आएगा
इलाज संभव है पहले ही लक्षण में
नहीं तो रोग ये लाइलाज बन जायेगा
नहीं तो रोग ये लाइलाज बन जायेगा

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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
December 18, 2010

बड़ी अजीब बात है की कुछ लोग इसे बीमारी कहते हैं ओर कुछ इसे ही ज़िंदगी कह रहे हैं………….. अच्छी प्रस्तुति बधाई………

    div81 के द्वारा
    December 19, 2010

    पियूष जी आप शुक्रिया ……..बहुत दिनों बाद आप की उपस्थिति प्रतिक्रिया के रूप में दर्ज हुई है | आप के ब्लॉग का इतजार रहेगा |

NIKHIL PANDEY के द्वारा
December 18, 2010

दिव्या जी बहुत शानदार रचना है…. और बेहतरीन शोध भी आपने रोग उसके लक्षण तो बता ही दिए सचेत भी कर दिया पर अपने रोकने के उपाय नहीं बताये… … बढ़िया रचना

    div81 के द्वारा
    December 19, 2010

    निखिल जी शुक्रिया आप का … इलाज के लिए तो रोगी को लेकर आना होगा तभी उपाय संभव है |

December 17, 2010

गुस्ताफी माफ़…….. इस कविता ने तो प्रेम विवाह का ख्वाब पाले कई होनहारों की उम्मीदों का बंटाधार कर दिया….. बधाई.

    div81 के द्वारा
    December 19, 2010

    गुस्ताखी माफ़ ……….. जहाँ जहाँ पांव पड़े संतन (होनहारो)के , वहां वहां हुआ बंटा धार…………….आप का शुक्रिया

rita singh 'sarjana' के द्वारा
December 17, 2010

दिब्या जी , आपकी यह व्यंग शैली में लिखी कविता बहुत अच्छी लगी l बधाई l

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    हास्य कविता को पसंद करने के लिए आप का शुक्रिया रीता जी |

आर.एन. शाही के द्वारा
December 17, 2010

दिव्या बहन, व्यंग्य की आड़ में बहुत परिपक्व समझ दिखा गई है आपकी कविता । कल्पनाशीलता भी खूब है । मां बाप सम्भल जाएं तो ही अच्छा, लेकिन आजकल उन्हें भी फ़ुर्सत कहां है ? साधुवाद ।

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    शाही सर आप का शुक्रिया | सच कहा आप ने माँ बाप को अब संभल जाना चाहिए मगर ???????? बच्चो को महंगे मोबाईल और बाइक दे कर इनकी इतिश्री हो जाती hai |

ritambhara tiwari के द्वारा
December 17, 2010

इलाज संभव है ………..मजेदार रचना! बहुत बढ़िया किया की लड़के की माँ को भी कुछ सिखाया नहीं तो जनरली उपदेशों की गठरी लड़की या उसकी माँ को ही मिला करती थी . KEEP IT UP!

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    ऋतंभरा जी आप का बहुत बहुत शुक्रिया

allrounder के द्वारा
December 17, 2010

बहुत ही हलकी सी गुदगुदी करती और प्यारा सन्देश देती है ये कविता ! div जी अभी तक ज्यादातर देखा गया है प्रेम के मामले मैं लड़की के माँ – बाप को चेताया जाता रहा है, किन्तु आपकी कविता मैं आपने लड़के की माँ को चेताया है ! बेहतरीन कविता !

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    आप को मेरी ये हास्य कविता पसंद आई आप का आभार | सही कहा आप ने चेताया लड़की के परिवार को जाता है मगर अब होश दुरस्त रखने का टाइम दोनों ही परिवार का है | शुक्रिया

वाहिद के द्वारा
December 17, 2010

सुन्दर प्रस्तुति Div जी| मगर पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं| खै़र आपकी रचनाधर्मिता की तआरीफ़ तो करनी ही होगी| वाहिद http://kashiwasi.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    जी बिलकुल सही कहा आप ने पांचो उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं | आप का शुक्रिया

ASHVINI KUMAR के द्वारा
December 17, 2010

प्रिय बहन समाज को अच्छा संदेश देती पंक्तियाँ ,परन्तु एक बात को ध्यान में रक्खो आज युवा ही नही परिपक्व भी विपथित हो रहे हैं,,मे प्रेम विवाह के विरोध में नही हूँ परन्तु उक्त विषय पर सोचने पर सफलता और असफलता का आंकडा मस्तिस्क में आ जाता है ,अरेंज मेरिज की भी लोग हजार बुराईयाँ गिनवा देंगे परन्तु सफलता के मानदंड पर वह ऊपर ही है ,एक बात और एकाग्रता एक ही विषय पर हो सकती है ,प्रेम अगर विशुद्ध प्रेम है तब तो ठीक है लेकिन आज के दौर में वाशनात्मक प्रेम ही देखने को मिलता है,तो इस वाशनात्मक प्रेम से न तो व्यक्ति का ही भला है और नही समाज का या देश का ,और जहां तक तय शुदा शादी की बात है तो लडका लडकी दोनों ही अनजाने व्यक्तित्व के लिए खुद को तैयार कर लेते हैं दोनों ही शुरू में समझौता करते हैं फिर वही समझौते आदत बन जाती है यही वह बिंदु है जहां पति पत्नी एक दुसरे के सम्पूरक बन जाते हैं फिर समझौता नही रहता विशुद्ध प्रेम ही शेष रहता है यह मह्शूश करने का विषय है तार्किक नही ..और इसी प्रेम से घर समाज देश सबका भला होता है यह प्रेम अगर प्रेम विवाह देता है तो मे पूरी तरह इसके पक्छ में हूँ और अगर नही तो पूरी तरह विरूद्ध ……तुम्हारा दादा

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    दादा जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाये

Amit Dehati के द्वारा
December 17, 2010

div जी , आपका पोस्ट अच्छा लगा . अगर वक्त रहते न शुधरे तो मुह की खानी पड़ेगी . लेकिन फिर भी आपके लिए ……… अपनी तो जैसे-तैसे कट जायेगी ……… आपका क्या होगा जनाबे आली -2 शायद नजरिया बदल दे आपका लडको के प्रति . शुक्रिया ! http://amitdehati.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    कविता को पसंद करने के लिए शुक्रिया …………..आप जैसे-तैसे काटिए हम तो अच्छे से जी रहे है और लडको के प्रति भी सम्माननीय सोच रखते है |

nishamittal के द्वारा
December 17, 2010

समाज में प्रचलित प्रव्रत्ति पर अच्छा लिखा है आपने.परन्तु दोष दोनों पीढ़ियों का है.हाँ एक बात अवश्य कहनी है केवल पोता नहीं कहिये पोती भी जोड़ दीजिये.उसको भी संसार में आना है.

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    जी बिलकुल दोनों ही सामान रूप से संसार में आने के अधिकारी है | आप का बहुत बहुत शुक्रिया

December 16, 2010

इलाज सम्भव है पहले ही लक्षण में नहीं तो रोग ये लाइलाज बन जायेगा दिव्या जी सुन्दर कृति है, पर जैसा की आशुतोष दा ने कहा हमारे नौजवान भी कम नहीं है आपको इसका जवाब जरूर देंगे.

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    राजेंदर जी आप का शुक्रिया मैंने तो कोई सवाल ही नहीं किया फिर भी जवाब का इंतजार रहेगा

rajeev dubey के द्वारा
December 16, 2010

बातें यह अब पुरानी हैं लड़कों ने लिखी नई कहानी है दिल की करने में कोई बुराई नहीं हमसफ़र अपनी कोई पराई नहीं . जिम्मेदारी भी वे निभायेंगे माँ बाप की सेवा और तीर्थ यात्रा करायेंगे लड़के पैसा रुपिया कमा कर लायेंगे यूं ही निकम्मे न प्यार बढ़ाएंगे ….!

    ashutoshda के द्वारा
    December 17, 2010

    बहुत अच्छा जवाब लिखा आपने दुबे जी आशुतोष दा

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    राजीव जी आप की तारीफ करनी पड़ेगी आप जैसी सोच सभी की हो जाये तो वहारे न्यारे हो जाये कम लोगो की सोच होती है ऐसी | वैसे ये पुरानी नहीं आज की ही कहानी है लडको में आई अजब ये जवानी है दिल की करते बड़ी ही चतुराई से हमसफ़र चुनते बड़ी ही होशियारी से जिमेदारी भी वो कम ही निभाते है डिस्को और पब की रोनके बढ़ाते है माँ बाप की सेवा में उनको हरिद्वर ही छोड़ आते है लडके पैसा रुपईया भी खूब kamate है निकम्मे तो यहाँ तन्हां ही रहा जाते है ये सभी के लिए नहीं है बहुत से नौजवान आज की दौर में मिसाल kayam कर रहे है

ashutoshda के द्वारा
December 16, 2010

बहुत ही सुंदर कविता की रचना की है आपने div जी आपने आज कल के लड़कों पर तीखा व्यग्यं है :) ) हमारे नौजवान भी कम नहीं है आपको इसका जवाब जरूर देंगे …… :) ) आशुतोष दा

    div81 के द्वारा
    December 17, 2010

    आशुतोष दा, ये तो हास्य कविता है | कभी हम निशाने पर होते है कभी इनको निशाना बनाया जाता है | आप शुक्रिया


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