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"देश के लिए हर कोई सोचता है"

Posted On: 23 Dec, 2010 Others में

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देश के लिए हर कोई सोचता है

मगर अपने किये से अंजान वो होता है

देता है दुहाई वो महँगाई की

मगर रोज रात को विदेशी वो पीता है

रहता है परेशान वो भ्रष्टाचार से

मगर अपनी ही मेज के नीचे से फाइल वो लेता है

करता है वो चिंता देश की

मगर देश का रुपया विदेशी ब्रांड में  खर्च वो करता है

हो रहा हैरान देख के आज का नौजवान

मगर अपने ही बेटे को महंगे मोबाईल/ बाइक वो देता है

करता है चर्चा वो भंग संसद के सत्र की

मगर अपनी ही टेबल से अनुपस्थिति वो रहता है

भ्रष्ट  नेताओं का नाम उसे मुख ज़बानी याद है

मगर कितनी फाइलों  को किया अब तक बेडा पार

उसका नहीं उसे ज्ञान है

नौकरी लगी थी क्लर्क की

उस गद्दी में आज  भी विराजमान है

मगर घर था तब उसका अब बँगला आलीशान है

बेटा नहीं है घर पे, बेटी पर भी कहाँ ध्यान है

पड़ोसी की बेटी हो गयी है जवान इसका इन्हें बहुत भान है

बड़ी ही हॉट  सेक्सी  वीडियो  डाउनलोड की  है आज

मगर बेटे के मोबाईल में उससे भी हॉट वीडियो विराजमान है

देश के लिए हर कोई सोचता है

मगर अपने किये से अंजान वो  होता है

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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aditya के द्वारा
December 27, 2010

दिव्या जी, बहुत ही सुन्दर रचना………..वास्तविकता के नज़दीक………….. कोई देश के बारे में पहले नहीं सोचता. आदित्य http://www.aditya.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 30, 2010

    आदित्य जी, दुःख इस बात का तो है देश के लिए सोचते तो सब है मगर अपने किये हुए से अनजाने बने रहते है | आप का शुक्रिया कविता को पसंद करने के लिए और अपनी प्रतिक्रिया के लिए

वाहिद के द्वारा
December 25, 2010

कटाक्ष करती ख़ूबसूरत रचना| एक कम चर्चित विषय पर आपने बहुत सटीकता से प्रकाश डाला है| आपको धन्यवाद| वाहिद http://kashiwasi.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 25, 2010

    वाहिद जी रचना को पसंद करने और हौसला बढाती प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया

ASHVINI KUMAR के द्वारा
December 25, 2010

प्रिय बहन (नक्कारखाने में तूती की आवाज)तेरा प्रयाश बहुत अच्छा है,लेकिन गैंडे की खाल पहनने वालों के ऊपर इसका क्या असर होगा पता नही ,एक आशा है बूंद बूंद से घडा भरता है ,विचारों से विचार मिलें तो एक तूफान खड़ा हो जाता है ,विश्व की सभी क्रांतियाँ इसी तरह प्रारम्भ हुईं थीं ,ईशा के ईशा मशीह बनने का वाकया याद कर यूनियन लीडर वह इसी तरह बने थे ,जिस दिन इस देश के सारे नवजवान जाग्रत हो जायेंगे एक ऐसा तूफान खड़ा होगा की इस तरह के लोगों न दो गज जमीन मिलेगी न ही कफन, भागने का ठिकाना तो बहुत दूर की बात है (एक कहावत है -राजा जब रियाया के ऊपर थूकता है तो वह रियाया तक पंहुचते पंहुचते सूख जाता है ,लेकिन जब रियाया जब थूकती है तो राजा उसमे डूब जाता है) ………..जय भारत

    div81 के द्वारा
    December 25, 2010

    दादा प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया और जल्द ही तूफान खड़ा होने वाला है

kmmishra के द्वारा
December 25, 2010

दिव्या जी नमस्कार । आज तो आपने आईना ही सामने रख दिया । आभार ।

    div81 के द्वारा
    December 25, 2010

    आदरणीय मिश्रा जी, आप की प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया बस ये ही कहना चाहूंगी उन लोगो के लिए जिनके लिए ये आइना है चेहरा अपना सुधारा न गया, आईने से खफा वो हो गए

Amit Dehati के द्वारा
December 24, 2010

अच्छी रचना , !!!!!!!!!!!! हार्दिक बधाई ! http://amitdehati.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 25, 2010

    अमित जी आप का शुक्रिया

SyedS के द्वारा
December 24, 2010

दिव जी हमेशा कि तरह ही सुन्दर रचना…सभी लोग अगर पहले आइना देख लें …और खुद को सही कर लें…तो देश की हालत भी अपने आप सुधर जायेगी… http://syeds.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    December 24, 2010

    अपने हिस्से की ईमानदारी निभानी होगी देश के हालात तो अपने आप सुधर जायेगा ………………….सभी लोग दुसरो पर तो उंगली उठा देते है मगर अपने आप को कभी नहीं देखते वो है क्या ……………..आप का शुक्रिया

drsinwer के द्वारा
December 24, 2010

bahut hi badiya likha hai apnai

    div81 के द्वारा
    December 24, 2010

    drsinwer ji, आप का शुक्रीय

nishamittal के द्वारा
December 24, 2010

सत्य को प्रकट करती रचना आपकी दिव्या जी,

    div81 के द्वारा
    December 24, 2010

    आप का शुक्रिया निशा जी, आप से एक अनुरोध है आप मुझे दिव्या कहा कीजिये सिर्फ दिव्या मुझे अच्छा लगेगा |

अजय कुमार झा के द्वारा
December 24, 2010

आपका प्रयास अच्छा है शैली में एक स्वाभाविक प्रवाह है ..। शुभकामनाएं ..लिखती रहिए

    div81 के द्वारा
    December 24, 2010

    अजय जी आप सभी की प्रतिक्रिया से और अच्छा लिखने की प्रेरणा मिलती है | हौसला बढ़ने के लिए शुक्रिया

Arunesh Mishra के द्वारा
December 24, 2010

नौकरी लगी थी क्लर्क की उस गद्दी में आज भी विराजमान है मगर घर था तब उसका अब बँगला आलीशान है.. अच्छी पंक्तिया…

    div81 के द्वारा
    December 24, 2010

    अरुणेश जी आप का शुक्रिया

jagobharat के द्वारा
December 23, 2010

दीवाजी किसी को नहीं छोड़ा आपने….. अच्छी और सफल अभिव्यकि बधाई…..

    div81 के द्वारा
    December 24, 2010

    पंकज जी, अभी तो बहुत से बाकी है , इस हौसला अफजाई के लिए आप का शुक्रिया

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
December 23, 2010

देश के लिए हर कोई सोचता है मगर अपने किये से अंजान वो होता है…… इसका एक उदहारण यह है की अक्सर चाय की दुकानों पर बैठ कर बाल श्रम प्रतिबंधित किए जाने पर चर्चा होती हैं…… ओर वही चर्चा करने वाले जब देर तक चाय नहीं आती दुकान मे काम करने वाले छोटे से लड़के को आवाज़ लगते हैं…………. साले छोटू कहाँ मर गया……. चाय क्या कल लाएगा………. ये किसी एक जगह का नहीं कहानी हर शहर की है………….

    div81 के द्वारा
    December 24, 2010

    पियूष जी, देश के लिए बोलते सब है पर अपने गिरेबान में कोई नहीं झांकता |

aftabazmat के द्वारा
December 23, 2010

अति सुन्दर..आपने एक अच्चा और सच्चा पहलु को बहुत बढ़िया तरीके से शब्दों में पिरोया है..बधाई..

    Deepak Jain के द्वारा
    December 24, 2010

    बेहतरीन

    div81 के द्वारा
    December 24, 2010

    आफताब जी आप का शुक्रिया


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