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मेरी प्यारी बेटी

Posted On: 5 Jan, 2011 Others में

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मेरे आँचल में ही छुप के

मेरी डांट से बच जाती थी

मेरी चुनरी ओढ़ वो

अपना रूप सजाती थी

मेरे ही कदमो में पाँव रख

चलने को ललचाती थी

उंगली पकड़ के जब वो चलती थी

मेरे ही गुण वो गाती थी

आदर्श हूँ  मैं उसकी

ये सोच के मैं इतराती थी

mother-daughter

वक़्त बदला उम्र बदली,

सोच ने नया आकर लिया

मेरी बेटी मुझको अब

ओल्ड फैशन कहती है

साथ चलाना तो दूर वो मुझसे

बात भी नहीं अब करती है

डिस्को पब की रौनक बन वो

घर की मर्यादा भंग करती है

समझाने पर उसको

आँखे फाड़े तकती है

जाने किस चिड़ियाघर में फँस गयी हूँ

अपने को २१ वी सदी का कहती है

sd

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48 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashutoshda के द्वारा
January 15, 2011

दिव्या जी नमस्कार आज कल आप कलम के साथ चित्रों से भी कमाल कर रही है बहुत ही सुंदर रचना जिसमें चित्रों ने रचना में जान डाल दी ! आशुतोष दा

J.L. Singh के द्वारा
January 10, 2011

एक थी सुभद्रा कुमारी चौहान जिन्होंने अपनी छोटी बच्ची को देखकर लिखा था – बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी! एक आप हैं जो नये युग की देन पर लिख चुकी है यही फर्क है दो पीढीयों के अंतर का. सुन्दर और मार्मिक कविता के लिए धन्यवाद. हमारी युवा पीढी को इससे सीख लेने की जरूरत है.

    div81 के द्वारा
    January 13, 2011

    पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया। उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥ मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ। मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥ जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया। भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥ …………………………………..हर माँ अपने बचपन को अपने बच्चो में जीती है मगर उन्मुक्तता में आज का युवा सारी हदे पार कर रहा है |

balsajag के द्वारा
January 7, 2011

दिव्या जी.. भावनाओं की सुन्दर अभिवयक्ति ….. शायद ये हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली और परिवेश का दोष है जो शायद सही अर्थों में व्यक्तिगत आजादी और उन्मुक्तता में फर्क करना नहीं समझा पा रहा है….

    div81 के द्वारा
    January 13, 2011

    बालसजग जी,…………………………बिलकुल सही कहा आप ने ये हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली और परिवेश का दोष है जो शायद सही अर्थों में व्यक्तिगत आजादी और उन्मुक्तता में फर्क करना नहीं समझा पा रहा है…………………इसी का नतीजा एकल परिवार, बढती तलाकदर, और रिश्तो में बिखराव आया है आप की प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया

allrounder के द्वारा
January 7, 2011

दिव्या जी, बहुत ही अच्छी बात कही है आपने कविता के माध्यम से सचमुच जिस भी माँ पर ऐसी बीतती होगी उसका मर्म कोई नहीं समझ सकता ! एक बेहतरीन कविता पर बधाई !

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    सचिन जी, सच कहा उस माँ पर जो बिताती है उसके दर्द को समझना मुश्किल है | कविता को पसंद करने के लिए आप का शुक्रिया

rkpandey के द्वारा
January 7, 2011

बहुत ही ज्यादा मार्मिक और मर्मस्पर्शी कविता. मां की ममता का तिरस्कार करती पीढ़ी के लिए एक सीख की तरह है आपकी रचना.

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    पाण्डेय जी, कविता को पसंद करने के लिए आप का शुक्रिया

alkargupta1 के द्वारा
January 7, 2011

दिव्या जी ,आज की सच्चाई व दोनों पीढ़ियों के को बताती हुई श्रेष्ठ रचना है| मेरी ओर से आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !

    div81 के द्वारा
    January 13, 2011

    alka ji, net ki prob ho rahi hai har baar aap ki pratikriya me aa kar ruk jaa raha hai der se pratikriya ke liye maphi chahungi ………………aap ko bhi navvrsh ki mangalkamnaye

Amit Dehati के द्वारा
January 6, 2011

वाह दिव्या जी क्या मैटर उठाया आपने ./…………….. वैसे देखने से तो नहीं लगती की आप ओल्ड फैशन है , और चलो हमने मान लिया की बिटिया ने ऐसा कहा होगा ,,,,,,,,,लिकिन अब उसको समझा दीजिये की ओल्ड इस गोल्ड…………… हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा . बहुत ही सुन्दर रचना . अच्छा टोपिक ……………., अच्छी रचना के लिए हार्दिक बधाई ! नववर्ष मंगलमय हो !

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    अमित जी,, भारतीयता की एक अलग पहचान होती है जो की एक सच्चा भारतीय ही समझ सकता है ,,स्व० लाल बहादुर शास्त्री धोती पहनते थे ,स्वामी विवेकानन्द जी की भी पोशाक आप जानते ही होंगे इन लोगों ने देश का सम्मान बढ़ाया या अपमानित किया ये आप के विवेक उपर निर्भर है ,,व्यक्ति की पहचान उसके विचारों से होती है न की पहनावे से या खुबसूरत दिखने से ,, (ओसामा बिन लादेन HE IS / WAS GOOD LOOKING PARSON) शायद नेट पर आपने उसकी आवाज भी सुनी होगी,अच्छी है ) लेकिन हमे तो ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह जी जैसी आवाज ही पसंद है ,उनकी आवाज में रुखापन था लेकिन हमे तो उसमे पितृत्व जैसी भावना की झलकती थी ( देश का रक्षक मेरे लिए पित्र तुल्य ही होता है,(लेकिन कुछ लोगों के लिए पगार पाने वाला केवल एक सैनिक)….आपकी प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 6, 2011

खूबसूरत रचना…………. वास्तव मे खुद को पथभ्रष्ट करके अब युवा पीढ़ी संस्कारों की बात करने वालों को दोनों के बीच जनरेशन गैप होने का तर्क देते हैं…………….

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    दो पीढ़ी में गैप होना लाजमी सी बात है मगर आदर और सम्मान भूल जाना कहाँ का तर्क है ……..प्रतिक्रिया के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया….

Aakash Tiwaari के द्वारा
January 6, 2011

div जी, बहुत ही संजीदा और वर्तमान की स्थिति को दर्शाती आपकी एक गम्भीर रचना पर आपको बहुत शुभकामनाये.. http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    आकाश जी ,.प्रतिक्रिया के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया….

Deepak Sahu के द्वारा
January 6, 2011

दिव्या जी एक बेहतरीन रचना बधाई! दीपक

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    दीपक जी,………………..प्रतिक्रिया के लिए आप का आप का शुक्रिया

kmmishra के द्वारा
January 6, 2011

दिव्या बहन नये साल और दशक की शुभकामनाएं । आज की पीढ़ी का यह रूप भी दिलचस्प है । लगता है कि वे कभी बूढ़े ही नहीं होंगे । आईना दिखाती कविता के लिये आभार ।

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    आदरणीय मिश्रा जी, आप को भी नववर्ष की शुभकामनाये | दिलचस्प नहीं खतरनाक है आज की पीढ़ी का यह रूप | शायद अमृत पान कर लिया है | प्रतिक्रिया के लिए आप का आप का शुक्रिया ……

वाहिद के द्वारा
January 6, 2011

दिव्या जी| यह मार्मिक वृतांत पढ़ कर आँखें नम हो गयीं| आप भी एक माँ की बच्ची हैं और मैं भी एक माँ का बेटा| ऐसा क्यूँ होता है के हम अपने सृजनहारों को ही भूल जाते हैं? आपकी कविता ने एक परंपरागत दर्शन को नयी दिशा दी है| बच्चों को यह समझना चाहिए कि उनके माँ-बाप जो उनके जन्मदाता हैं उनकी भी उनसे कुछ अपेक्षाएं हैं, यदि हम उन्हें पूरा नहीं कर सकते तो कम से कम उनकी अवहेलना न करें तो यह समाज कितना सुद्रष्ट हो जाये| आपकी बहुत तारीफ़ भी कम होगी| आपको नमन,

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    वाहिद जी, एक माँ अपना पूरा आराम नींद खो कर अपने बच्चे के विकास का सोचती है | अपना पूरा जीवन बच्चो के नाम कर देती है और इस लायक बनाती है की वो समाज में अपनी पहचान बना सके |बच्चो से उम्मीद के नाम par सिर्फ इतना चाहती है की उनसे प्यार और सम्मान मिले मगर बच्चे उनका सम्मान करना ही भूल जाते है | जो माँ बिन कहे बच्चे के दिल की बात समझ जाती है वो युवा होने पर कहते है तुम नहीं समझोगी | ये आज की सच्चाई है |

naturecure के द्वारा
January 5, 2011

मर्मस्पर्शी रचना , आधुनिकता की दौड़ में अपने नैतिक मूल्यों को भूलना विकासशीलता नही है | काश आज की युवा पीढ़ी इसे समझ ले , तो भारत बहुत बड़े अनर्थ से बच जाये | डॉ. कैलाश द्विवेदी

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    डॉ. कैलाश द्विवेदी जी, सही कहा आप ने जो आधुनिकता के नाम पर अपनी संस्कृति और सभ्यता को भूलना विकासशीलता नही है |

January 5, 2011

दिव्या जी, आधुनिकता के नाम पर गर्त में जाती नई पीढ़ी का सुन्दर चित्रण किया है आपने. आपकी रचना में कहीं-२ सरोजिनी प्रीतम जी की झलक मिलती है…..धन्यवाद.

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    राजेंद्र जी, ये तो आप की हौसलाफजाई है | जो अच्छा करने की प्रेरणा देती है |

nishamittal के द्वारा
January 5, 2011

बहुत अच्छी कविता दिव्या बच्चों से कितनी अपेक्षा सब रखते हैं परन्तु नयी रौशनी में उनको सब ओल्ड फेशंड नज़र आता है ये बात दूसरी की चकाचोंध जरा मद्धिम होती है,लेकिन तब तक स्तिथि वो होती है अब पछताए क्या होत है जब चिड़िया चुग गयी खेतअच्छे भाव अच्छी सचित्र प्रस्तुति..

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    जी बिलकुल बाद में पछताने से कुछ हासिल नहीं होता मगर जिनकी नींद ही देर से खुलती है उनको अक्ल भी देर से आएगी |……………….प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया

rita singh 'sarjana' के द्वारा
January 5, 2011

दिव्या जी , आपकी कविता पढ़कर स्वत मुंह से निकला वाह…………………………,बधाई l

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    रीता जी, प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया

abodhbaalak के द्वारा
January 5, 2011

दिव्या जी पुराणी और नयी पीढ़ी के अंतर को दर्शाती, सुन्दर कविता. जो आज अपने आपको २१वी सदी की कह कर पुराणी पीढ़ी का मजाक उदा रहीं हैं, उनको भी कल ऐसा ही कुछ देखना होगा,….. समय बदलेगा तो ….. आपने चित्रों का भी काफी सुन्दर प्रयोग किया है इन्ही कारणों से सदा आपकी अगली रचना की प्रतीक्षा, रहती है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    अबोध जी, आप सभी की प्रतिक्रिया से कुछ अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है | ये तो आप की हौसलाफजाई है नहीं तो अपनी बिसात कहाँ :) |

R K KHURANA के द्वारा
January 5, 2011

प्रिय दिव्या जी, बहुत ही भावपूरण कविता ! सच को उकेरती कविता ! आज का सच यही है ! हम लोग पुराने हो गे है अब नयी हवा चल पड़ी है ! लेकिन उनको यह नहीं मालूम नया नौ दिन पुराना सौ दिन खुराना

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    आदरणीय खुराना जी, बहुत सही बात कही है नया नौ दिन पुराना सौ दिन …………. :) आप की प्रतिक्रिया देख कर बहुत ख़ुशी हुई उम्मीद है इसे आप बरकरार रखेंगे :)

rddixit के द्वारा
January 5, 2011

पिय दिव्‍या जी, नए वर्ष पर एक भावपूर्ण कविता, बधाई। 2011 की बधाई और शुभ कामनाएं अलग से। ओ के।

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    दीक्षित सर, आप को भी नववर्ष की शुभकामनाये प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया

aditya के द्वारा
January 5, 2011

दिव जी, जनरेशन गैप पर बहुत ही बढ़िया और मार्मिक कविता है………………….इसी प्रकार लिखते रहिये………….. आदित्य http://www.aditya.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    आदित्य जी, प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया…………………….छोटी सी कोशिश है आप यूँ ही हौसला बढ़ाते रहिये कुछ अच्छा लिख पाऊं ऐसी कोशिश जारी रहेगी

Harish Bhatt के द्वारा
January 5, 2011

दिव्या जी नमस्ते, दिल को छू जाने वाली कविता के लिए हार्दिक बधाई.

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    हरीश जी, …………… प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया :)

Syeds के द्वारा
January 5, 2011

दिव्या जी, दो पीढ़ियों के अंतर को बड़ी खूबसूरती के साथ पेश किया है…वास्तव में पश्चिम की सभ्यता हावी हो रही….युवा अपने संस्कार भूल रहे हैं…. अच्छी कविता http://syeds.jagranjunction.com 5/5

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    syeds जी, सही कहा पश्चिमी सभ्यता का ही नतीजा है की आज का युवा अपने संस्कार भूल रहा है मगर जो पौधे अपनी जमीं को नहीं पकड़ पाते वो जल्दी ही मुरझा जाते है | :) rating के लिए शुक्रिया

HIMANSHU BHATT के द्वारा
January 5, 2011

दिव्या जी….. सुंदर सामयिक रचना…. मै तो इतना कहना चाहूँगा की बच्चों के इस व्यवहार के लिए कहीं न कहीं माता पिता ही जिम्मेदार हैं….. कहीं न कहीं हमसे ही चूक हो जाती है….. जिसका यह दुष्परिणाम आता है…….

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    हिमांशु जी, ये तो आधुनिकता का अन्धानुकरण का नतीजा है | जहाँ चूक हो जाती है | उसका दुष्परिणाम सब के सामने आ जाता है | प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया

ashvinikumar के द्वारा
January 5, 2011

ये आधुनिकता नही विकृत सोच है जिससे भारत अत्याधिक प्रभावित है ,अभी कुछ दिनों पहले कुछ लडके लडकियों का देहली में किया हुआ एक्सीडेंट इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है ……जय भारत

    div81 के द्वारा
    January 7, 2011

    सही कहा आप ने जो आधुनिकता के नाम पर अपनी संस्कृति और सभ्यता को भूल जाये वो विकृत मानसिकता वाले ही होते है

    deepa pandey के द्वारा
    January 12, 2011

    divya mam…..bhut khub…. m apni maa s dur rhti hu jb maa k pass thi tb maa mujse yhi khti thi y jo apne likha y bilkul shi likha…


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