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"ख्वाहिशे रौंद दी जाती है"

Posted On: 6 Mar, 2011 Others में

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14
मासूमियत खिलने से पहले, ही
मुरझा सी जाती है
बेटियों कि ख्वाहिशे अक्सर
रौंद दी जाती है

hy
परवाज भरने से पहले
पर क़तर दिए जाते है
बेटियों के पंख अक्सर
नोच दिए जाते है

rtg
घर कि दहलीज लांघने से पहले ही
लक्ष्मण रेखा खींच दी जाती है
बेटियों के पैर में अक्सर
बेड़ियाँ डाल दी जाती है
ddd

प्यार का एहसास होने से पहले ही
हवस समझा दी जाती है
बेटियों के एहसास अक्सर
कुचल दिए जाते है

gt
दुल्हन बनने से पहले ही
अस्वीकार कर दी जाती है
बेटियां अक्सर
पैसो से परखी जाती है
dd

बेटियों कि ख्वाहिशे
रौंद दी जाती है
इसलिए लड़कियाँ
पैदा होने से पहले ही
मार दी जाती है
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कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब चाहिए.हम महिला दिवस तो मना रहे है मगर क्या सच में ये वक़्त सेलिब्रेशन का है ? यह हमें क्या हो गया है? लड़कियों के प्रति हमारे दृष्टिकोण में यह आत्मघाती परिवर्तन क्यों आ गया है? हम कहां जाकर रूकेंगे? लड़की होना गुनाह क्यों है? हमारी सामाजिक परिस्थियां इसके लिए कहां तक जिम्मेदार हैं कि हम संतान के रूप में लड़की नहीं चाहते? फिर ये झूठा सम्मान किस के लिए है ???????????

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41 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

syeds के द्वारा
March 26, 2011

दिव्या जी, आपकी यह कविता समाज पर बहुत सारे प्रश्न चिन्हा लगाती है… लड़कियों(महिलाओं) की हालत और बाल श्रम दोनों ही पर काम करने की ज़रुरत है… और हम सब को अपने स्तर से जागरूक होना पड़ेगा… http://syeds.jagranjunction.com

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 9, 2011

दिव्या जी, बहुत ही सचित्र एवं सजीव प्रस्तुति है . हम तो बस अपना प्रयास कर सकते हैं आचरण में उतारने को. और उम्मीद करते है की अगले महिला दिवस में मंज़र कुछ बदला हो.

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    दीपक ji, हमको भी यही उम्मीद है जल्द ही ये मंजर बदलेगा सभी लोग ये आचरण अपने में उतारे और महिला दिवस jaisi chij manani na पड़े | आप का शुक्रिया

kmmishra के द्वारा
March 8, 2011

दिव्या जी नमस्कार । इस महिला दिवस पर आपकी यह कविता लोगों की महिलाओं के प्रति कुछ सोच तो जरूर बदल सकती है। समाज को ऐसी ही कविताओं की जरूरत है । आभार ।

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    आदरणीय मिश्रा जी, नमस्कार हम तो ये ही चाहते है की लोगो की सोच बदले | और कोशिशे जारी है मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है | प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया

allrounder के द्वारा
March 7, 2011

दिव्या जी, नमस्कार सचमुच आपकी ये कविता कुछ ऐसे गूढ़ प्रश्न लिए हुए है, जिनसे भारतीय समाज मैं लड़कियों की दशा उजागर होती नजर आती है, और मन मैं एक वेदना सी उत्पन्न होती है किन्तु ……….

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    सचिन जी इसी किन्तु का तो जवाब चाहिए tha और हम सको देना होगा की क्यूँ ये किन्तु परन्तु आ जाता है वहीँ पर प्रश्नचिंह लग जाता है लड़कियों के लिए | आप का शुक्रिया प्रतिक्रिया के लिए

Prashant के द्वारा
March 7, 2011

आपकी कविता ने दिमाग को सोचने पर मजबूर कर दिया….. जरूरत है एक नई पहल की…..बेहतरीन रचना के लिए धन्यवाद ..

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    प्रशांत जी, उसी नयी पहल की और कदम बढ़ चुके है बस देखना है मंजिल कब तक मिल पाती है और कब तक स्थिति सुधर पाती है | आप का शुक्रिया

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 7, 2011

दिव्या बहन ! वैसे तों यह मेरे असूलो के खिलाफ है की मैं किसी को अपने लेख को पढ़ने के लिए प्रार्थना करूं ….. लेकिन आपसे इसलिए कर रहा हूँ की क्योंकि मेरे उसलेख “इसे खुशी मानू की गम” में आपका भी जिक्र है ….. ************************************************************************************************************** नीचे वाली टिप्पणी में यह भी जोड़ना चाहता था की जिन पुरुषों ने अपनी पत्नी को ‘कत्ल’ के लिए मजबूर किया था है या करेंगे वोह भी आपकी इस पोस्ट के हक में बात करेंगे ….. धन्यवाद

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    राजकमल भाई ……….. जब एक ऊँगली मार डाकू की सोच बदल सकती है | तो एक आम इन्सान की सोच बदलना मुश्किल नहीं है बस उसी वक़्त का इंतजार है जब ऐसी सोच वाले लोग अपने आप को बदल ले | और उम्मीद में दुनिया कायम है | आप का शुक्रिया

Harish Bhatt के द्वारा
March 7, 2011

दिव्या जी नमस्ते. बहुत ही बेहतरीन दिल को छू जाने वाली कविता के लिए हार्दिक बधाई.

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    आदरणीय हरीश जी, हमेशा की तरह उत्त्साह बढ़ने के लिए आप का शुक्रिया

Dharmesh Tiwari के द्वारा
March 7, 2011

दिव्या जी नमस्ते,महिला दिवस के मौके पर बहुत ढेरों सवालों को समेटे पोस्ट प्रस्तुत किया है आपने,धन्यवाद!

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    धर्मेश जी, ……………..प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 7, 2011

div जी, आपकी लेखनी को सलाम ..न जाने कब लोगों के दिल में लड़कियों के लिए इज्जत आएगी और उनको भी पूरा हक़ दिया जायेगा अपनी जिंदगी जीने का…. आकाश तिवारी

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    आकाश जी, हम भी उसी कोशिश में लगे है की कब वो सम्मान और हक लड़कियों और महिलाओं को मिले जिनकी वो हकदार है | आप का शुक्रिया

nikhil के द्वारा
March 7, 2011

गर खुदा है ऊपर तो फिर क्यूँ लुट रही ये मासूम सांसें हैं गर खुदा है नीचे तो फिर क्यूँ जल रही ये खामोश आँखें हैं. बहुत खूब दिव जी. दिल को झंकझोर कर रख दिया आपके शब्दों ने.

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    निखिल जी, आप की चाँद लाइन ने कविता को पूर्णता प्रदान कर दी है आप का आभार

vinita shukla के द्वारा
March 7, 2011

सुन्दर और प्रभावशाली प्रस्तुति. सार्थक पोस्ट के लिए बधाई.

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    विनीता जी नमस्कार …..आप का तहे दिल से शुक्रिया

NIKHIL PANDEY के द्वारा
March 7, 2011

दिव्या जी ये बहुत ही प्रभावी पोस्ट है तस्वीरों के साथ जो गंभीर और अर्थपूर्ण पंक्तिया है वो मन को छू लेने वाली है ..और ये रचना की सार्थकता है की वह मन तक पहुचे और सोचने पर मजबूर कर दे , सारे सवाल उचित है और उनके जवाब ढूँढना आज की जिम्मेदारी है… क्योकि सिर्फ ऐसा होता रहा है कह कर इन सवालो को दबाया नहीं जा सकता.. …..

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    निखिल ji, पोस्ट तो तस्वीरों के जरिये प्रभावी बन गयी है मगर क्या हमारी सोच प्रभावी नहीं हो सकती कितने केस होते है और हम सभी आँखे मूंदे बैठे रहते है उन बातो का प्रभाव ही नहीं लेते | बिलकुल अब वक़्त है जब कि इन सब सवालो का जवाब देना होगा इन से बचा नहीं जा सकता | जल्दी ही स्थिति बदलेगी इस उम्मीद के साथ ………………………..आप का शुक्रिया …

aftab azmat के द्वारा
March 7, 2011

दिव्या जी, नमस्ते…आपने इतनी बड़ी समस्या को जिस तरह से कविता का रूप दिया है, वो बहुत सुन्दर है…बहुत बधाई…. http://www.aftabazmat.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    aftab जी, नमस्कार.आप ka तहेदिल से शुक्रिया………

rachna varma के द्वारा
March 7, 2011

div , बेहद तर्कपूर्ण प्रश्न के साथ आपकी कविता पूरे समाज को कठघरे में खड़ा करती है और महिला दिवस की सार्थकता पर ही प्रश्न चिन्ह लगाती है एक सार्थक कविता !

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    रचना जी, हम महिलाये khud में इतनी सशक्त है हमे किसी के सहारे की जरुरत नहीं है मगर गाहे baghe हमारे haath में बेसखियाँ पकड़ा दी जाती है | कमजोर वो सोच है जो हम को कमजोर बनाने पर तुली है |प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया …

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 7, 2011

दिव्या जी, बिलकुल निशाने पर है आपका तीर| यदि सम्मान और स्नेह है ही तो फिर ये पक्षपात क्यूँ.. क्यूँ एक माँ ही अपनी ही बच्ची को संसार में नहीं लाना चाहती… ये या तो इस पुरुषवादी समाज का दोष है अथवा उसके द्वारा स्थापित की गयी स्त्री विरोधी मानसिकता का दोष जो इस समय पूरे समाज में बहुत ही गहराई से अपनी जड़ें जमा चुकी है…। यदि मैं कभी विवाहित हुआ तो सबसे पहले संतान के रूप में एक बालिका ही चाहूंगा…भले ही समाज मुझे कुछ भी कहे….आज के समय में यदि मेरा सबसे गहरा सम्बन्ध है तो  मेरी माँ से…।आभार आपका,

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    March 7, 2011

    क्षमा चाहूँगा कि यही प्रतिक्रिया मेरी पोस्ट पर भी छप गयी है| त्रुटि दूर कर दी है वही पर।

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    वाहिद जी, बहुत कोशीश करने पर भी वो प्रतिक्रिया पोस्ट नहीं हो पा रही है जिसकी कोशिश कर रही हूँ | बस आप का शुक्रिया ही दे रही हूँ phir से कोशिश करुँगी आगर हो पाई तो | क्षमा मांग के शर्मिंदा मत किया कीजिये वाहिद जी :) ऐसा हो जाता है |

Alka Gupta के द्वारा
March 6, 2011

दिव्या जी , आज के समाज के लिए बहुत ही सही प्रश्न उठाये हैं बहुत ही गंभीरता से सोचने समझने और अपने इस दृष्टिकोण को बदलने की अति आवश्यकता है हृदयस्पर्शी चित्रमय प्रस्तुति !

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    आदरणीय अलका जी, bas कोशिश जरी है एक न एक दिन sab का दृष्टिकोण जरुर badalega आप का तहे दिल से शुक्रिया

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    राजकमल भाई काश उनका ह्रदय परिवर्तन हो पाए किसी एक तक भी ये बात पहुँच पाती है मेरा लिखा व्यर्थ नहीं जायेगा मुझे ऐसी उम्मीद है ऐसा जरुर होगा aap का shukriya

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 6, 2011

दिव्या बहन आपकी इस पोस्ट का समर्थन वोह औरते भी करेंगी जिन्होंने कभी खून से अपने हाथ रंगे हो या फिर भविष्य में रंगने की तैयारी है ….. धन्यवाद

rajeev dubey के द्वारा
March 6, 2011

दिव्या जी, प्रश्न उठाते रहिये , सच सुनना जरूरी है…परिवर्तन लाना ही होगा…इससे पहिले कि समाज स्वयं की बस इस एक दिन पीठ थपथपा कर सो जाए…

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    rajeev ji, isi कोशिश में लगे है और जल्द hi वो दिन भी आएगा ऐसी उम्मीद भी है aap का शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
March 6, 2011

बहुत ज्वलंत प्रश्न दिव्या ,बहुत दिन बाद मंच पर आना हुआ .इन प्रश्नों का उत्तर दिए बिना कोई औचित्य नहीं.बहुत सुंदर रचना व चित्रमय प्रभावशाली प्रस्तुति.

    aksaditya के द्वारा
    March 6, 2011

    एक विचारोत्तेजक कविता के लिए धन्यवाद |

    aksaditya के द्वारा
    March 6, 2011

    एक विचारोत्तेजक कविता के लिए धन्यवाद

    div81 के द्वारा
    March 7, 2011

    aksaditya जी शुक्रिया आप का

    div81 के द्वारा
    March 7, 2011

    आदरणीय निशा जी, इन दिनों कुछ ज्यादा ही व्यस्त रही हूँ तो वक़्त ही नहीं मिल पाया | कुछ ज्वलंत प्रश्न तो है मगर जवाब ??????????????.


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