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यात्रा,,चरण दासी से चरण दासी तक का सफर

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365 में केवल एक दिन ,,सम्पूर्ण विश्व की लगभग आधी आबादी के लिए केवल एक दिन ,,और इस एक दिन की भी आवश्यकता  हमे क्यों पड़ी? ,,क्या केवल इसलिए की हमारे मन से अपराध बोध दूर हो सके ?,,की हमने महिलाओं के लिए कुछ नही किया (364 दिन शोषण किया और एक दिन प्रायश्चित ,,नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज करने ,,या गांधी जी के तीन बंदर ,,सब कुछ जानते बुझते हुए भी चुप रहो ) अगर ऐसा है और शायद ऐसा ही है तो इसे चिकित्सकीय दिन कहना अधिक उचित होगा मनोरोगियों की चिकित्सा का एक दिन ,,भारत ही नही अगर हम सम्पूर्ण विश्व को भी देखें तो महिलाओं की स्थिति लगभग हर जगह एक जैसी ही मिलती है कहीं कहीं तो और भी बदतर ,,न जी सकती हैं और न ही चैन से मर सकती हैं ,,और महिला हक़ की पैरोकार महिला समाज सेवी समितियां /संस्थाएं (कुछ एक जो उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं को छोड़कर ) सभी महिलाओं का ही शोषण करने में आकंठ डूबी हुई हैं,यह संस्थाएं बाहुबलियों ,राजनेताओं या किसी भी तरह से धनाढ़य एवं सबल लोगों की चरण दासियाँ बन कर रह गई हैं(हमे आये दिन समाचार पत्रों में ऐसी तमाम घटनाएं पढ़ने को मिल ही जाती हैं ) क्या इन संस्थाओं के बूते पर नारियों की स्थिति सुधरेगी जो खुद ही नारियों का सर्वस्व लूटने को भूखे भेड़ियों की तरह आतुर हैं ? या फिर सरकार (जो तसलीमा या इन जैसी ज्वलंत लेखिकाओं के सर पर ईनाम रखने वालों की हिमायती रहे हो और आज भी अन्यान्य देशों में यही स्थिति है कहीं पर हम समाचार पत्रों/या सूचना के विभिन्न माध्यमों से हम थोड़ा बहुत जान पाते हैं और कहीं से निकलकर कुछ भी नही आता) के भरोसे बैठे रहकर स्थितियों की सुधरने की कामना करते रहें ,,(कुछ एक लोग कहेंगे की महिलाओं की स्थिति पहले की अपेछा सुधरी है सत्य है परन्तु आंशिक ,,शोषण के तौर तरीके बदल गये हैं परन्तु स्थिति और भी दयनीय हो गई है नारिओं के शोषण के लिए नित नवीन हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं ,कहीं प्रोत्साहन या प्रलोभन देकर तो कहीं खुलेआम (नया जमाना है भाई क्म्प्रोमाईज तो करना है पड़ता है यह शब्द नारियों के मुख से ही सुनने को मिलता है उन नारियों के मुख से जो पता नही क्या क्या सह चुकी हैं और समाज के द्वारा इतनी प्रताड़ित हो चुकी हैं की उनके मन से खुद को अत्याचार से मुक्त करने  का भाव ही खत्म हो गया है और यही पराजित मन दुसरी नारियों को भी शोषण की तरफ उन्मुख करता है ) पर शोषण हर जगह हो रहा है ,,लोग समान अधिकारों की बात करते हैं ,,(वही लोग जो खुद की पुत्रियों को समाज से दूर रहने की शिक्छा देते हैं ) गोया समाज न हुआ जंगल हो गया ,,क्या यह सभी लोग समाज के अंग नही हैं ,फिर उन्होंने ही तो इस समाज को जंगल बनाया या बनाने में सहयोग किया और ऐसी नारियां जो उन महानुभावों की छाया चित्र हैं खुद ही धन लिप्सा के वसीभूत होकर अपनी बेटी समान लडकियों का शोषण करने में तल्लीन हैं ,,वाह रे धन लिप्सा ….सारे रिश्तों को ताक पर रखकर यहाँ तक की मानवीय गुणों को भी भूलकर (शायद ईश्वर ने भूल से उन्हें मानव बना दिया ,परतु पशु भी तो  इतने निष्ठुर नही होते ?) शोषण करने में अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया जाता है ,, हर साल कि तरह इस साल भी ८ मार्च आ गया | ८ मार्च यानी कि महिला दिवस यह महिलाओ के सम्मान के लिए बना एक दिवस मात्र एक दिवस  ,,फिर से इस दिन उन महिलाओ को याद किया जायेगा जिन्होंने इतिहास रचा उनको सम्मानित किया जायेगा जो बुलंद हौसलों के साथ विपरीति परिस्थिति में भी आगे बढ़ी और एक मुकाम हासिल किया | और फिर ढलते हुए सूर्य की तरह ये दिन गुजर जायेगा और फिर से अनगिनत सवाल खड़े कर जायेगा उन तमाम महिलाओं के लिए जो घर में दिन रात एक करके देश के लिए रक्त धमनियों का कार्य करती हैं ,क्या उन्हें भी कभी याद किया जाता है ? क्या एक दिन महिलाओ को पुरस्कृत कर देने  से या सम्मानित कर देने  से महिलाओ  को सम्मान मिल जायेगा उनको उनका उचित स्थान प्राप्त हो पायेगा ? उन के प्रति  विकृत मानसिकता वाले लोगो का नजरिया बदल जायेगा ? ये सम्मानित की जाने वाली महिलाएं भारत  की करोणों महिलाओं में से कुछ एक हैं जो उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं  मगर क्या अब भी वह महिलाये जो पहचान की मोहताज है उनको सम्मान मिल पायेगा या वे जो सम्मान कि हक़दार थी मगर अब एक अभिशप्त जिंदगी जी रही है सिर्फ इस लिए कि वो महिला हैं  और शायद ये ही उनका सबसे बड़ा जुर्म हैं |                                          महिला-सशक्तीकरण एक आन्दोलन है,एक कार्य-योजना है,एक प्रक्रिया है,जिसे मुख्यत: सरकार और गैरसरकारी संगठन आयोजित करते हैं। कुछ महिलाओ को बुला लिया जायेगा मंच पर और  उनके बहाने उन महिलाओ को भी याद किया जायेगा जो इतिहास बन गयी है और कुछ गिनी चुनी महिलाओ को पुरुस्कृत कर के इस दिवस को इति श्री कह दिया  जायेगा |                                                                                               क्या यही सब कर देने भर से महिलाओ कि स्थिति में बदलाव आ जायेगा ?

जो महिला अपने अधिकारों और हक को लेकर पहले से ही सचेत हैं क्या यह महिला दिवस केवल उन्ही के लिए आयोजित किया जाता है |                                                                                   वह महिलाएं जो आज समाज में हासिये पर धकेल दी गयी है या समाज में अपने अधिकारों से वंचित है उनके लिए क्यों नहीं संघर्ष दिवस बनाम महिला दिवस आयोजित किया जाता ताकि उन्हें भी  न्याय मिल सके वह भी खुद को इन्सान कह सकें  |

महिला आयोग में निम्नलिखित मुद्दों पर अपनी शिकायतें की जा सकती है।

घरेलू हिंसा, उत्पीडऩ, दहेज के लिए प्रताडि़त किए जाने पर, ससुराल पक्ष या पति द्वारा प्रताडि़त किए जाने पर, पति द्वारा छोड़े जाने पर, यदि पति द्विविवाह किया हो, बलात्कार, पुलिस द्वारा प्राथमिकी इनकार करने पर, ऑफिस में सहयोगी या बॉस द्वारा लिंग भेद, यौन उत्पीडऩ या क्रूरता दिखाने पर।इसके अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग आप्रवासी भारतीय नागरिकों (एनआरआई)से शादियों की बढ़ती धोखाधड़ी के मामले भी देखती है।

Comptroller & Auditor General (CAG) की मार्च २०१० की रिपोर्ट साबित करती है की राष्ट्रीय महिला आयोग संपूर्ण और गंभीर रूप से

भ्रष्ट है! २००८-०९ में आई १२,८९५ शिकयतों में से सिर्फ़ ७,५०९ पर गौर किया गया और उन में से केवल १०७७ पर कार्यवाई के गयी!

जेल में औरतों की दशा का जायज़ा पिछले ४ सालों में एक बार भी नही लिया गया! मथुरा और पाशिम बंगाल में रहने वाली विधवाओं की

दशा भारत में सबसे दुखद है पर भारतीय महिला आयोग को इस बारे मे पता भी नही था जब तक सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को जाँच के

आदेश नही दिए थे! इन विधवाओं के लिए अब तक क्या किया गया? ऐसी अनगिनत विधवाओं और ग़रीब महिलाओं के लिए राष्ट्रीय

महिला आयोग ने क्या किया?

क्या सच में हमारी देश कि  महिलाये अपने हक के लिए आवाज बुलंद कर पाती  है  क्या उनको इन अधिकारों का पता है या आवाज उठाने पर कुछ हो पता है |

कुछ दिन पहले कि न्यूज़ है up के किसी गाँव कि दलिद महिला के साथ वहीँ के गाँव के किसी व्यक्ति ने उत्पीडन किया  उसने उसकी रिओर्ट पुलिस में करा दी उसके बाद उस महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और मार दिया गया | उसके बाद क्या हुआ कुछ नहीं पता ये है हमारे समाज का असली चेहरा जहाँ अब  भी महिलाये अपने आवाज को उठा नहीं पाती | ऐसी अनगिनत खबरे आती है और चली जाती है और महिलाये खबर बन कर रह जाती है |

मुझे तो महिला दिवस एक मजाक लगता है | जहाँ पर बढे बढे दावे पेश कर दिए जाते है | महिलाओं ने ये किया था महिलाये वो कर रही है | मगर जिन को सच में अधिकार और सम्मान कि जरुरत है वो अब भी कहीं गुमनामियो में जी रही है  अपने हक के लिए झूठे वादों पर ठगी जा रही है |

अधिकारों अपने हक से वंचित है उनको ले कर एक मंच बनाया जाये उनके लिए कुछ किया जाये तब सही मायने में महिला दिवस का कुछ औचित्य होगा

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Syeds के द्वारा
March 19, 2011

देश में जिस तरह से महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं…वह चिंता का विषय है….महिला दिवस के साथ साथ महिलाओं के सशक्तिकरण,अधिकारों और सुरक्षा के लिए हमें बाक़ी दिनों में भी सक्रिय रहना होगा… बेहतरीन लेख पर बधाईयाँ….. http://syeds.jagranjunction.com

    Syeds के द्वारा
    March 19, 2011

    ५/५…:)

    Syeds के द्वारा
    March 19, 2011

    आपको होली की ढेर सारी शुभकामनायें… :)

    div81 के द्वारा
    March 22, 2011

    syeds जी, नमस्कार ……………….बिलकुल सही कहा आप ने ek din चिल्लाने या नारी सश्कातिकरण का नारा देने से काम नहीं चलेगा | हौसला बढ़ने और समर्थन के लिए आप का शुक्रिया :) आप को भी होली की शुभकामनाये

    atharvavedamanoj के द्वारा
    March 22, 2011

    देश में ही नहीं हो रहें हैं मान्यवर यह एक वैश्विकं बीमारी है|हाँ, भारत में भी हो रहा है यह जरुर एक चिंता का विषय है….जय भारत, जय भारती

    syeds के द्वारा
    March 26, 2011

    मनोज भाई, जी मई आपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ…लेकिन शुरुआत हमें अपने घर(भारत) से करनी होगी… http://syeds.jagranjunction.com

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 19, 2011

दिव्या बहन …..नमस्कार ! आपको भी सपरिवार होली के इस पावन त्यौहार की पिचकारी भर -२ के ढेरो शुभकामनाये

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 10, 2011

दिव्या बहन नमस्कार ! ऐसा लगता है की आप का यह लेख उन लाखो करोड़ो नारियों को समर्पित है ,जोकि चुपचाप अपने फ़र्ज़ को हर हाल में अंजाम देकर अपना अमूल्य योगदान दे रही है …… जिनको की हम अन संग हीरोज(हिरोइन) भी कह सकते है ….. धन्यवाद

    div81 के द्वारा
    March 11, 2011

    बिलकुल ऐसा ही है राजकमल भाई इसमे किसी तरह के शक शुबहे की गुन्जाईस नही है किसी भी तरह का भ्रम न पालें यह उन्ही गुमनाम महिलाओं को समर्पित है     

ashvinikumar के द्वारा
March 9, 2011

आश्चर्य दुनिया की आधी जनसंख्या वह जनसंख्या जो हर देश के लिए अति महत्वपूर्ण है ,उसके अधिकार सम्मान के लिए दिवस का आयोजन करना पड़े,, उस पर हम यह कहें की हम आधुनिकता की तरफ अग्रसर हैं ,,मानवीयता का दुर्भाग्य ,,और जहां तक सम्मान की बात है ,, तो दोहरे चरित्र वाले एवं राजनीतिक जीवन जीने वाले लोग क्या सम्मान देंगे ,,सफेद पोशाकों के पीछे कितनी कालिमा है यह वही जाने ,,नारी ने हमेशा संघर्ष किया है अनथक संघर्ष और आज भी कर रही है ,लेकिन भेडियों के झुण्ड के सामने कुछ एक ही बच पाते हैं ,,उन्ही भाग्यशालियों का सम्मान दिया जाता है ,,आज भी नारी अनवरत संघर्ष में तल्लीन है ,,और जहां तक दासता की बात है ,,पाशविक प्रकृति के लोग जो समाज को निरंतर दूषित करने में तल्लीन हैं जिनके कारण पूरा पुरुष समाज आरोपित होता है ,,यथा बाल मजदूरी ,,क्या सभी इसमे संलिप्त हैं नही न लेकिन आरोप …..इसके वास्तविक जिम्मेदार लोगों की चर्चा तक नही होती ,,नारी ने (इतिहास शाक्छी है ) सदैव पुरुषों का सहयोग किया ,और पुरुष भी सम्मान करते रहे हैं ,,लेकिन यह समाज ,,आज भी एक कहावत है (जोरू का गुलाम ) ऐसे पुरुषों को पुरुष ही नही नारियां भी यही पुकारती हैं ,,आश्चर्य तब न तो पुरुष को और न ही नारी को यह प्रतीत होता है की वह शब्द रूप में विष बो रही हैं ,,यही कटाक्छ न जाने कितने पुरुषों की सोचने समझने की शक्ति हर लेता है एक सार्थक और निरंतर चलने वाली प्रशंशनीय बहस …………..जय भारत

Ramesh bajpai के द्वारा
March 9, 2011

दिव्या जी प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है , समस्याए और भी है | पर सबसे ज्यादा हर्ष का विषय यह है की महिला सशक्तिकरण पर चर्चा की शुरुवात हो गयी है | आपने बहुत अच्छी तरह विचारो को पिरोया है | बहुत बहुत बधाई |

    div81 के द्वारा
    March 10, 2011

    आदरणीय वाजपेयी जी आपका हार्दिक धन्यवाद ,,आपने अपना समर्थन देकर मेरे प्रयाश को सम्बल प्रदान किया ….आभार

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 9, 2011

दिव्या जी, एक विचारणीय लेख लिखा है आपने. आज मेरी एक सहकर्मी ने विवाद छेड़ा की अगर महिला के लिए महिला दिवस हो सकता है तो पुरुषो के लिए पुरुष दिवस क्यों नहीं . तो मैंने मजाक में कहा की बाकि ३६४ दिन. पर इसमें एक गहरा अर्थ है. दिवस की जरुरत उसके लिए पड़ती है जिसके लिए समय न हो पर इस दिवस के बहाने सम्मान दें. क्या हम हर दिन को स्वयम का दिवस नहीं मना सकते . आप खुद को दोयम समझते हो इस लिए पुरुषो ने आपपर दया कर एक दिन दे दिया. बाकि बहुत सी बातें हैं पर सब आपके विचारो से मेल खाती हैं. अच्छी पोस्ट से लिए बधाई.

    div81 के द्वारा
    March 10, 2011

    दीपक जी आपका कथन शायद द्वन्द्मय है ,,या मे ही स्पष्ट समझ नही पा रही हूँ ,, नारी ने कभी खुद को द्वितीय पायदान पर नही समझा,, लेकिन कुछ एक पुरुष जो स्वयं को प्रथम दर्जे का समझते हैं यह उनकी रुग्न मानसिकता है ,,जिनको यथा सम्भव इलाज की अत्याधिक आवश्यकता है ,, हमारा भारतीय इतिहास नारियों की गौरव गाथाओं से भरा पड़ा है ,,सैनिक यदि देश के लिए सीमा पर अपनी जान न्योछावर करता है तो इसका कदापि यह अर्थ नही है की वह दोयम दर्जे का नागरिक या मानव है ,,यही स्थिति महिला की भी है अगर वह अपने घर के लिए अपना सर्वस्व भूल खुद को घर के लिए समर्पित कर देती है तो वह दोयम दर्जे की इन्सान है(उस देश /घर को कृतग्य होना चाहिए कि ऐसे समर्पित वीरों से वह परिपूर्ण हैं जो उनके लिए सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं …आपका आभार

आर.एन. शाही के द्वारा
March 9, 2011

महिला मनोभाव, अपेक्षाओं एवं समस्याओं का बेबाक़ चित्रण किया है दिव्या जी । बधाई ।

    div81 के द्वारा
    March 10, 2011

    आदरणीय शाही जी ,धन्यवाद मेरे तुच्छ प्रयाश को आपने सराहा ,आभार

rajeev dubey के द्वारा
March 9, 2011

दिव्या जी, सर्वप्रथम तो आपको इस दिवस पर शुभकामनाएं. नारी उत्थान न हुआ तो समाज भी नष्ट हो जाएगा…आइये हम सब मिलकर प्रयत्न करते हैं…

    div81 के द्वारा
    March 10, 2011

    राजीव जी ,,मे आपसे पूर्णतया सहमत हूँ ,प्रयत्न एक संकल्पित प्रत्न की हम सब को तथा देश को भी आवश्यकता है ,,…

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 8, 2011

दिव्या बहन ……नमस्कार ! “संघर्ष दिवस बनाम महिला दिवस” की जो आपने नई अवधारणा दी है बहुत ही बढ़िया और उत्तम विचार है आपके ….. सच में ही करोड़ो (krodo ) लोगों की बजाय कुछेक पहले से ही जागरूक महिलायों का ही तो सन्मान किया जाता है इस दिन ….. लेकिन मैं इसका एक दूसरा सकारात्मक पहलु भी देखता हूँ ….. जो महिलाए इस दिशा में प्रयास कर रही है अगर उनको उचित मान सम्मान दिया जाता है तो उनका उत्साह बढ़ेगा तथा दूसरी महिलायों के भी उनके दिखाए हुए रास्ते पर चलने की कुछेक हद तक प्रेरणा मिलेगी , किसी इनाम या सन्मान के लिए नही ,बल्कि अपने सार्थक प्रयासों को मान्यता मिलने और खुद को कुछ साबित करने के लिए ….. बहुत ही अनसुलझे हुए सवालों को उठाता हुआ यह आपका लेख ….. मैं उम्मीद करता हूँ की अगले साल के आते -२ किसी हद तक हालात सुधरेंगे ….. धन्यवाद

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    राजकमल भाई ….नमस्कार सिक्के ka जो दूसरा पहलू मैं उससे इंकार नहीं करती | मगर हमारे देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री से ले कर अब तक जाने कितनी महिलाये हुई है जो की एक मिसाल बन गयी है सिर्फ महिलाओ के लिए ही नहीं पुरुषो के लिए भी मगर क्या उससे महिलाओ की स्थिति में कुछ अंतर आया मुझे तो हालत उस वक़्त से ज्यादा विकट लग रहे है | ऐसा नहीं की महिलाओं ने अपना मुकाम नहीं बनाया मगर जिस तबके के लोगो तक ये बात पहुंचनी चाहिए उनको तो पता भी नहीं होगा उनके अधिकार क्या है या कल महिला दिवस भी था | कल भी महिलाये बहुत सी परेशानियों से दो चार हुई होंगी | जिनको सशक्त करना है उन तक बात नहीं पुहँच पाती है | मैं भी उम्मीद करती हु की महिलाये ही खुद आगे बढ़ कर अपनी एक नयी पहचान बनायेंगी और वो वक़्त दूर नहीं है | कुछ तो बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी ……………..pratikriya के लिए आप कदिल से शुक्रिया

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 8, 2011

दिव्या जी, आपका यह लेख यथार्थ के क़रीब है| सिर्फ़ ढिंढोरा पीटने से कुछ नहीं मिलेगा जब तक कि धरातलीय कार्य न किये जाएँ| वैसे महिलाऐं आवाज़ तो उठाती हैं मगर जब कुछ करने की बारी आती है तो रुक जाती हैं| अभी कल वाराणसी में आसपास के जिलों को मिलाकर एक महिला सम्मलेन हुआ और उसमें महिलाओं की भागीदारी १५० लोगों में सिर्फ़ ९ महिलाएं जिनमें ४ तो आयोजन समिति की थीं जबकि आमंत्रण कुल ८० महिलाओं के लिए था| आप ही बताइए  जहाँ महिलाएं खुद ही अपने हक़ के लिए अगला क़दम उठाने में हिचकिचा रही हैं वहां परिणाम क्या होगा समझ आता है| नारी को अपने सम्मान और अधिकारों के प्राप्ति के लिए सिर्फ़ बोलना नहीं कुछ करना भी होगा|  आभार सहित,

    div81 के द्वारा
    March 9, 2011

    वाहिद जी मेरे पिछले ब्लॉग आप ने पढ़े होंगे उनमे और हमेशा से ही मेरी ये सोच रही है की महिलाएं खुद सक्षम बने न की महिलाओं को किसी के सहारे की जरुरत पड़े | अगर महिला दिवस में कुछ संगठन सक्षम महिलाओं को एकत्रित करके सशक्तिकरण का नारा दे तो ये सब मजाक ही होगा उन लोगो के साथ जिनके लिए ये बात कही जा रही है | असक्षम लोगो को मंच तक कैसे लाया जाये उनके लिए मंच नहीं चाहिए उन तक पहुंचना है तो उनके बीच खुद पहुंचना होगा | मंच में बोलना और किसी को सक्षम बनाना दोनों अलग विषय है |

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    March 10, 2011

    दिव्या जी, आपने इसे अन्यथा ले लिया… बल्कि यूँ कहूँ कि मैंने सही ढंग से स्वयं को व्यक्त नहीं किया| मैं   पूर्णतः आपसे सहमत हूँ कि इस अलख की जोत अंधेरों कोनों तक पहुंचा कर यथासंभव इस सार्थक उद्देश्य की पूर्ती होगी| विषयों के अलगाव पर फिर कभी चर्चा….

    div81 के द्वारा
    March 10, 2011

    वाहिद जी मैने बिलकुल भी इसे अन्यथा नही लिया केवल अपने लेख को और अधिक स्पष्ट किया है तथा अपने विचारों को भी ,,


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