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माँ आप क्यूँ कुछ नहीं कहती हो ??

Posted On: 7 May, 2011 Others में

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माँ आप क्यूँ कुछ नहीं कहती हो चुप हो कर सब  सहती हो
दादी के शब्द बान सहे पापा कि अनदेखी में भी मौन रही हो
त्याग कि प्रति मूर्ति बनी मूर्त होकर भी मौन रही हो
कभी सही होते हुए भी गलत ठहरा दी गयी
कभी बच्चों कि ख़ुशी में खुद कि खुशियाँ को भुल जाती हो
परिवार कि शांति  के लिए त्यागा हर सुख चैन तुम ने
परिवार को बांधे रही आँचल से अपने
अन्नपूर्णा का रूम बन कैसे कम में भी सबको तृप्त तुम कर जाती हो
दिन भर कि थकी हारी फिर भी मधु मुस्कान सजा के
हम पर हर वक़्त बलिहारी हो जाती हो !!
थकना और रुकना तुम जान ही न पाई
निराशा में भी आशा के दीप जलाती हो आई
मुझको  तुम कई रंगों में दिखती
भोर का पहला तारा कभी हो जाती
कभी रात का चमकीला सितारा बन
मेरे सिरहाने रात भर झिलमिलाती हो
तपती दुपहरी में ठंडी छावं, अपने आँचल में तुम कहाँ से लाती हो
कभी दिए कि बाती बन हमारे दिलो को जगमगाती हो
प्यार कि ये रौशनी तुम खुदा से हो पाती
या कभी खुदा का नूर तुम हो जाती हो
कभी होली कि रंगोली बन खुशियों का घर आंगन सजाती हो
माँ कैसे तुम हमरी उदंडता में शांत चित रह पाती हो
बिना कोई कटु शब्द कहे उंच नीच का ज्ञान दे जाती हो
माँ कैसे तुम बिन कहे मेरी पीड़ा को समझ जाती हो
अपने आशीष के हाथ से मेरे सारे दर्द दूर कर जाती हो
माँ फिर भी अनगिनत सवाल आज मचल रहे है
तुम अपनी पीड़ा किससे कहती हो ???
हमारे आंसू तुम पीती हो तो
अपने आँखों के नीर को कहाँ अर्पित कर देती हो ??
घर कि खुशियों में मग्न  हो, अपनी खुशियों का भान
किसी को भी तो नहीं देती हो
मेरी बीमारी में जागी सारी रात हो
ये तो कहो तुम बीमार कब होती हो ???
मेरी हर खाहिशें पूरी कि हर दम तुमने
अपनी इक्छओं को किससे कहती हो ?
परिवार कि हर बात सुनी है
अपनी बात पर क्यूँ होंट सिये रहती हो ????
माँ आप क्यूँ कुछ नहीं कहती हो ?
चुप हो कर सब  सहती हो

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
May 19, 2011

वह दिव्या बहुत सुन्दर भावयुक्त रचना.माँ के सभी रूपों को तुमने अपनी कविता में स्थान दिया है यद्यपि माँ के रूप में न जाने नारी में कहाँ से से इतनी शक्ति आती है.ये एक अबूझ पहेली है.अपनी पीड़ा को अन्दर ही अन्दर पीने वाली माँ ,बच्चों के लिए अपनी सभी खुशियाँ न्योछावर करने वाली माँ.बहुत अच्छी रचना.बधाई.हाँ अभी भी हम कल्पना भी नहीं कर पायेंगें शायद माँ की भूमिकाओं की.वास्तव में बच्चों की ढाल होती हियो माँ .देर से प्रतिक्रिया दे पा रही हूँ कुछ कारणों वश.परन्तु लिंक नहीं मिलता तो इतनी सुन्दर रचना से वंन्छित रह जाती मैं

    div81 के द्वारा
    May 19, 2011

    आप की प्रतिक्रिया का कब से इंतजार था | आपसे सदा ही आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त होता है | जी बिलकुल माँ प्यार का अथाह सागर कहाँ से लती है और कितनी पीड़ा सहती है बच्चो की ख़ुशी के लिए उसका वर्णन करना सम्भव नहीं | आप का तहे दिल से शुक्रिया

syeds के द्वारा
May 15, 2011

दिव्याजी, बेहद खूबसूरत रचना,यह कविता हमने अपनी माता जी को सुनाने के लिये प्रिन्ट कर ली है… :) ,राजकमल भाई के आदेश को बेहतरीन अन्दाज़ मे पूरा किया :) 6/5..

    div81 के द्वारा
    May 15, 2011

    syeds जी, नमस्कार…………….माता जी को हमारा प्रणाम कहियेगा | उनके आशीर्वाद के साथ हमें ये भी बता दिजियेगा की माता जी को कैसी लगी हमारी ये रचना :) | शुक्रिया :)

    syeds के द्वारा
    May 19, 2011

    दिया जी, आपकी यह रचना हमने माता जी को सुनाई… उन्हें यह रचना बहुत पसंद आई…उन्होंने कहा बेहद अच्छी रचना और आपको धीर सारी दुआएं दी… http://syeds.jagranjunction.com

    div81 के द्वारा
    May 19, 2011

    ज़िन्दगी के कठिन दौर में ये दुआ ही है जो काम आती है और मैं खुशनसीब हूँ जो मुझे ये यूँ सौगात में मिल गई | इस के लिए आप का शुक्रिया कहना चाहूंगी |

Aakash Tiwaari के द्वारा
May 12, 2011

DIV जी, इस धरती पर माँ से बड़ी कोई शक्ति नहीं है….मै तो सिर्फ अपनी माँ के लिए ही आज तक ज़िंदा हूँ/…. आपकी रचना बहुत ही अच्छी है…. आकाश तिवारी

    div81 के द्वारा
    May 15, 2011

    आकाश जी, सच ही है माँ से बड़ी कोई दूसरी शक्ति नहीं …………. अच्छा लगा आप के कमेन्ट को देख कर स्वस्थ्य कैसा है अब आप का…………….मेरी शुभकामनाये है

rita singh \\\\\\\'sarjana\\\\\\\' के द्वारा
May 8, 2011

दिव्या जी , सुन्दर भावनायुक्त रचना के लिए बधाई

    div81 के द्वारा
    May 10, 2011

    रीता जी, इस सराहना के लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया

R K KHURANA के द्वारा
May 8, 2011

प्रिय दिव्या जी, माँ के मासूम रिश्तो को दर्शाती एक सुन्दे कविता ! माँ आप क्यूँ कुछ नहीं कहती हो ? चुप हो कर सब सहती हो बहुत सुंदर राम कृष्ण खुराना

    div81 के द्वारा
    May 8, 2011

    खुराना सर, नमस्कार इस सराहना के लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 7, 2011

दिव्या बहन ….. नमस्कार ! आप की यह कविता हर पढ़ने वाले के मन में अपनी माँ की यादों और खूबियों का पिटारा खोल कर रख देती है …. आपकी इस कविता को पढते हुए हम लोग सीरियल की एक बात याद आ गई , जहाँ पर बच्चों की माँ अपने पीटीआई से यह कहती है की औरत की आधे से ज्यादा जिन्दगी तो चूल्हे चोंके में ही बिट जाती है और ज्यादातर वक्त यही पूछने में बीत जाता है की “तुम आज क्या खायोगे” ….. जब भी मुझको यह बात याद आती थी तो मैं अपनी माँ द्वारा यह सवाल पूछने पर यही कहता की जो आपका दिल करता है वो ही बना ले , लेकिन आज तक मैं अपनी माँ की पसंद नहीं जान पाया , हमेशा हमारी पसंद का ही बनता रहा घर में ….. इस सुन्दर और बेहतरीन + भावुक +ममतामयी माँ के प्रति प्रेम के भावो को जगाती हुई रचना के लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया

    div81 के द्वारा
    May 8, 2011

    राजकमल भाई, जी बिलकुल माँ होती ही ऐसी है सब की पसंद उनको पता रहती है | अपनों के लिए वो जीती है | कब किसको क्या जरुरत होगी माँ बिन कहे समझ जाती है |

वाहिद काशीवासी के द्वारा
May 7, 2011

दिव्या जी, एक नारी को समाज में अनेक रूपों और कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है| इसमें से सबसे कठिन एक माँ की ही भूमिका होती है| आज आपकी कविता में कुछ ऐसी भावनाएँ सामने आई हैं जिनसे हम सभी का कभी न कभी वास्ता पड़ा ही होगा| आज पहली बार एक आलोचक के दृष्टिकोण से आपकी कविता में कोई त्रुटि नहीं निकाल पा रहा| शब्द विन्यास के साथ ही भावोत्पादकता भी अत्यंत सराहनीय है| इसी तरह से सदैव लिखने का प्रयास किया करें| आपका भविष्य उज्जवल हो ये कामना नहीं कर सकता क्यूँ कि इस कविता के बाद ये स्वतः ही दिखाई दे रहा है| इस सुन्दर भावनात्मक कविता के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ,

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    May 7, 2011

    आपको अंक देना तो भूल ही गया वैसे यह शुभ कार्य पहली बार कर रहा हूँ| 4.99/5

    div81 के द्वारा
    May 8, 2011

    वाहिद जी, आप ने इतनी तारीफ कर दी है की कुछ समझ ही नहीं आ रहा क्या कहूँ ? आप से सदा ये उम्मीद रहेगी की आप एक समालोचक के रूप में मेरा मार्ग दर्शन करते रहेंगे | प्रयास तो मैं कर रही हूँ बाकी आप सभी प्रबुद्ध लोगो से स्नेह और मार्ग दर्शन की उम्मीद करती हूँ | इस हौसला अफजाई के लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया

    div81 के द्वारा
    May 8, 2011

    :) शुक्रिया फिर से…………………….

abodhbaalak के द्वारा
May 7, 2011

दिवा जी माँ एक ऐसा शब्द है की कुछ भी कहा जाए पर वो कम ही होता है, त्याग और प्रेम का मिला जुला संगम है माँ, और इसी लिए इसे भगवन का रूप भी कहा जाता है, वैसे आपने राज जी की बात को ……………… :) सदा की भांति आपके द्वारा लिखी एक सुन्दर रचना ……… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    May 7, 2011

    दिव्या बहन ….. नमस्कार ! प्रिय अबोध जी ….सस्नेह नमस्कार ! मेरी बहन आपकी तरह नहीं है जो की उचित गुजारिश को पूरा करने में आपकी तरह इतना समय ले …. मैं आप दोनों का तहेदिल से आभारी हूँ की आपने मेरी इल्तजा मान कर मेरा मान बढ़ाया ….अपने कीमती समय में से कुछेक अनमोल और यादगारी पल इस मंच और ब्लागरो को दिए है .. हार्दिक आभारी हूँ आप दोनों का :) (मैं एक धमाका करने वाला हूँ -कानो पर हाथ रख लेना)

    abodhbaalak के द्वारा
    May 8, 2011

    राज जी भय्या मेरे क्षमताओं को भी तो देखिये, कहाँ दिवा जी जैसी एक्सपर्ट लेखिका और कहाँ मै? इस लिए कृपा कर के ऐसा कम्पैरीज़न …………… इसी लिए तो आपसे कम से कम २ सप्ताह का अन्तराल ……. अबोध

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    May 8, 2011

    प्रिय अबोध भ्राता जी …. सस्नेह नमस्कार ! में आपकी इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ की दिव्या बहन बहुत ही काबिल और सक्षम है ….उनकी यह कविता पढ़ते हुए ही पाठक अपने सुनहरे अतीत में पहुँच जाता है और अपनी माँ की खुबियो और गुणों का एहसास करता है …. आप चाहे जितना भी समय ले ले , लेकिन इसके साथ -२ यह भी जोड़ना चाहूँगा की हम आपको अंडर एस्टीमेट नहीं कर सकते , यह अबोध भी छुपा हुआ रुस्तम है …. अग्रिम शुभकामनाये

    div81 के द्वारा
    May 8, 2011

    अबोध जी, बिलकुल माँ त्याग और प्यार का ऐसा सागर है जो अपना सब कुछ न्यौछावर कर भी दे मगर फिर भी उनके प्यार का सागर कभी कम नहीं होता | उसको नहीं देखा हमने कभी पर उसकी जरुरत क्या होगी ऐ माँ तेरी सुतार से अलग भगवन की सूरत क्या होगी !!!! आप का शुकिया

    div81 के द्वारा
    May 8, 2011

    अबोध जी, राज भाई कुछ कहें और उसको हम टाले ऐसी गुस्ताखी हम नहीं कर सकते |

    div81 के द्वारा
    May 8, 2011

    राजकमल भाई सादर नमस्कार ! राजकमल भाई हमारे यहाँ आज भी छोटो को हुकुम दिया जाता है गुजारिश नहीं कि जाती | बहन कहा है तो आप आदेश भी दे सकते हो और हक से बात मनवा भी सकते हो |(गुजारिश, आभारी, इल्तजा) इतने भारी भरकम शब्द को समझना मेरी समझ के बहार है |

    div81 के द्वारा
    May 8, 2011

    अबोध जी, आप कि अबोध और मसूमित के तो क्या कहने………………………..कुछ न कहते हुए भी बड़ी बड़ी बात कह जाते हो | ये आप कि जर्रानवाजी है (आप के ही अंदाज में) नहीं तो मैं अब भी खुद को ……………….. बाकी तो आप समझदार है समझ गए होंगे | :)

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    May 8, 2011

    दिव्या बहन …नमस्कार ! आपके द्वारा अबोध भ्राता जी को उन्ही की भाषा में जवाब देना मन को आनंदित कर गया …. मैंने भी कई बार कोशिश की ह उनके जैसी ही तोतली जुबान में अधूरी बाते करूं लेकिन हर बार असफल ही रहा हूँ ….. :) धन्यवाद

    div81 के द्वारा
    May 10, 2011

    राजकमल भाई ….नमस्कार आपका जो अंदाज है बात कहने का सीधा और खरा वो ही अंदाज सब को पसंद है उसी अंदाज में आप कहते हुए अच्छे लगते हो | और अबोध जी ने जो नयी भाषा का चलन शुरू कर दिया है उसको थोडा बहुत समझ कर उन्ही के अंदाज में जवाब देने कि कोशिश थी आप को ये पसंद आया मेरी कोशिश सफल हो गयी :)


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