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दूर वो बुढा चाँद

Posted On: 7 Sep, 2011 Others में

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पलकों कि चादर ओढ़े जब साँझ होती है
बूढ़े चाँद से कई बाते फिर तमाम होती है
कुछ तजुर्बे उनके और
कुछ कहानियां मेरी होती है
पूरी चांदनी जब छिटक जाती है
कच्चे रास्तो से होकर मेरे अंगना उतर आती है
तब बूढ़ा चाँद पीपल कि टहनियों से होते हुए
खिड़की में मेरी उतरता है
चांदनी कि छटा में बाते फिर तमाम होती है
गली कूचो से निकल के हम
खेत खलियानों कि कच्ची डगर पकड़ते है
दूर एक छोटे से टीले में पहुँचते है

रुककर वहीँ कुछ देर यूँ ही, बाते फिर तमाम होती है
वादा होता है फिर कल मिलने का
नए किस्से नयी कहानी गढ़ने का
अलसाई सी सुबह में फिर चुपके से
बूढ़ा चाँद मस्त बादलों  संग उड़ता जाता है
इंतजार मुझे को भी रहता है
रात की अंगड़ाई लेती तन्हाई का
बूढ़ा चाँद भी मुन्तजिर रहता है
सुरमई साँझ और मुझसे मिलने का
मिलते है हम फिर चुपके से
छत चौबारो में कुछ देर वहां यूँ ही बाते फिर तमाम होती है
कुछ दुनियादारी के किस्से
कुछ मेरे सुख दुःख के हिस्से
साझा उससे मैं करती हूँ
धीरे से हंस देता है कभी वो
कभी काली घटा की ओट में
आंसू भी बहाता है
सुनकर मेरी परेशानियां
वो हैरानियाँ जतलाता है
कभी मेरी नादानियों में
लोट पोट हो जाता है
इस दुनिया से दूर वो बुढा चाँद मुझे भाता है
मेरी बाते सुनने को रोज रात वो चला आता है

Goodnight Moon.1

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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

syeds के द्वारा
September 27, 2011

दिव्या जी, काफी समय बाद आपकी रचना देखकर ख़ुशी हुयी… खूबसूरत रचना…. http://syeds.jagranjunction.com

    syeds के द्वारा
    October 6, 2011

    ५/५ आपकी अगली रचना का इंतज़ार है… http://syeds.jagranjunction.com

rajkamal के द्वारा
September 10, 2011

दिव्या बहन ….. नमस्कार ! आपने जिस प्रकार की प्रतिकिर्या की बात कही है वोह दूसरों के लिए होती है ….. लेकिन दो बातों से कहने का हौंसला मिला है एक आप की इजाजत और दूसरा सुधार के लिए कुछ सुझाव ….. ***************************************************************************************** तो लीजिए मेरी असल प्रतिकिर्या :- बुड्ढा होगा बिग बी ….. जहाँ तक चाँद की बात है अगर चाँद बुड्ढा हो गया तो फिर आपके इस “तेरे ब्रदर की दुल्हन” को अगर लोग बुड्ढी कहेंगे तो भला क्या आपको अच्छा लगेगा (वैसे वाहिद जी ने असली मतलब समझा दिया है) *********************************************************************************** एक छोटे से टीले में पहुँचते है हम रात (की) अंगड़ाई लेती तन्हाई का कभी काली घटा (की) ओट में आंसू भी (बहाता ) है *************************************************************************** आप तो जानती ही है की मुझ नाचीज की समझदानी कितनी छोटी है फिर भी इस रचना को खुद की समझने वाले भाव से देखा तो उपर्लिखित बाते नजर आई ….. ****************************************************************************************** अगर कोई गलती हो गई हो तो अपने भाई को कशम करना शुभकामनाओं सहित आपका आभारी

नंदिनी के द्वारा
September 9, 2011

दिव्या जी, आपने चाँद और चांदनी से दिल के रिश्ते को एक नई पहचान दी है बिलकुल अपने ब्लॉग के नाम की तरह।

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    नंदिनी जी,आप ने अपने नाम कि तरह ही सुंदर प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया :)

Lahar के द्वारा
September 9, 2011

सुन्दर चाँद पर चांदनी जैसी कविता | इस चमकते चाँद की सुन्दर रचना पर आपको बहुत बहुत बधाई |

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    लहर जी, इस प्यारी सी प्रतिक्रिया के लिए आप का शुक्रिया

UMASHANKAR RAHI के द्वारा
September 8, 2011

मन को छू जाने बाली कविता के लिए साधुवाद!

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    आदरणीय उमाशंकर जी मेरी छोटी सी कोशिश कि सराहना के लिए आप का शुक्रिया

Vinita Shukla के द्वारा
September 8, 2011

बहुत दिनों बाद आपकी रचना पढने को मिली. अच्छा लगा. सुदर अभिव्यक्ति पर बधाई.

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    नमस्कार विनीता जी, आप का शुक्रिया सुन्दर सी प्रतिक्रिया के लिए :)

manoranjanthakur के द्वारा
September 8, 2011

एक पंक्ति याद आ गई देश में निकला होगा चाँद

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    आदरणीय मनोरंजन ठाकुर जी,नमस्कार हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद अपनी रात की छत पे कितना तनहा होगा चाँद। ……………..बहुत ही खूबसूरत गज़ल है इतनी खूबसूरत गजल याद दिलाने के लिए आप का शुक्रिया

Harish Bhatt के द्वारा
September 8, 2011

दिव्या जी नमस्ते. बहुत अच्छी कविता के लिए बहुत बहुत बधाई.

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    आदरणीय हरीश जी, नमस्कार कविता को पसंद करने के लिए आप का बहुत बहुत शुक्रिया

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 8, 2011

दिब्या जी नमस्कार,,,,,,,,,,,,,,,,, प्रकृति के सुन्दरता का प्रदर्शन करती सुन्दर कविता,,,,,,,,इस दुनिया से दूर वो बुढा चाँद मुझे भाता है मेरी बाते सुनने को रोज रात वो चला आता है,,,,,,धन्यवाद!

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    धर्मेश जी नमस्कार ………………………………. शुक्रिया आप का इतनी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए

Santosh Kumar के द्वारा
September 8, 2011

दिव्या जी ,..नमस्कार सुंदर रचना ,..प्रकृति से जुड़ाव आनंद देता है ,..साधुवाद

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    बिलकुल सही कहा आप ने प्रकृति का जुडाव आनंद देता जो सुकून प्रकृति के सानिध्य में मिलता है कहीं नहीं …शुक्रिया आप का

Rajkamal Sharma के द्वारा
September 7, 2011

दिव्या बहन …..नमस्कार ! मैं आपसे कहते -२ रुक गया था कुछ पोस्ट करने के लिए …… लेकिन आपने खुद ही मेरे मन की बात जान कर आज यह नायाब रचना जिसके सभी भाव अदभुत और विलक्षण है इस मंच पर हम सभी के सामने रखी है इसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम ही होगी ….. :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o अगर अध्यात्म की नजर से देखे तो कोई पहुंचा हुआ व्यक्ति भी इसको पहली नजर में ही पसंद कर लेगा ….. इस बेहतरीन रचना पर ढेरों मुबारकबाद

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    September 8, 2011

    प्रिय राजकमल भाई नमस्कार…. ********************************** दिव्या जी, लंबे वक़्त के बाद की गयी आपकी वापसी अत्यधिक सुखद है। मेरे और राजकमल भाई के साथ-साथ सभी को आपकी रचनाओं की प्रतीक्षा रहती है। ये बूढ़ा चाँद दिल को छू कर निकल गया मगर उसकी चांदनी में भावनाएँ अभी तक नहाई हुई हैं।क़ुदरत और उसकी सभी कृतियों से लगाव होना एक संवेदनशील मन की पहचान है। और कवि या कवियत्री का संवेदनशील होना उसका प्रथम गुण होता है। एक दो हिज्जों को छोड़ दिया जाए तो रचना में व्यक्त भाव अत्यंत ही गहन हैं जो रचनाकार की मनोस्थिति का सुन्दर वर्णन करते हैं। सुन्दर कविता के लिए बधाई देता हूँ।

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    आदरणीय राजकमल भाई …………सादर नमस्कार जी बिलकुल आप की दिल की बात समझ गयी थी तभी यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आ गयी :) ये सिर्फ भाई की प्रतिक्रिया बोल रही है ………..कहीं आप पर पक्षपात का आरोप न लग जाए :) ….इतने खुले दिल से तारीफ़ करने के लिए शुक्रिया शब्द बेमानी सा है मगर आप का तहे दिल से शुक्रिया इतनी अच्छी प्रतिक्रिया के लिए ………………… मगर एक बात कहना चाहूंगी तारीफ ही नहीं कुछ कमियां भी इंगित कर दिया कीजिये तो बहुत अच्छा लगेगा जिससे मेरी लेखनी में सुधार हो पायेगा | खुले दिल से कि गयी इस प्रतिक्रिया के लिए आप का फिर से बहुत बहुत शुक्रिया

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    वाहिद जी, मेरे लिए भी बहुत सुखद आश्चर्य है | आप सभी का स्नेह और अपनत्व यहाँ का मोह नहीं जाने देता |प्रकृति से जुड़ाव ही है जो कुछ लिखने के लिए प्रेरित करता रहता है | बिलकुल सही कहा आपने कुदरत और उसकी कृतियों से लगाव होना एक संवेदनशील मन कि पहचान होती है मगर आज कल ये संवेदनाये कहीं खो सी जा रही है | आप का तहे दिल से शुक्रिया वाहिद जी आपने जिन हिज्जो को छोड़ दिया जाये कहा है उनको अगर बता देते तो सुधार करने का मौका मिल जाता | एक बार फिर से आप का शुक्रिया | समालोचना से अच्छा करने कि प्रेरणा मिलती है अपनी कीमती राय देते रहियेगा :)

nishamittal के द्वारा
September 7, 2011

प्रकृति के सभी रूपोंब से कवी ह्रदय की मैत्री होती है.कवी की पहुच तो वहां भी है जहाँ सूर्य की भी नहीं.बहुत सुन्दर रचना दिव्या

    nishamittal के द्वारा
    September 7, 2011

    कृपया कवि पढ़ें.

    abodhbaalak के द्वारा
    September 7, 2011

    diva ji sabse pahle to welcome back. manch par aapko kafi miss kia ja raha tha. waise mujhe pata nahi tha ki chaand bhi boodha ya jawab hota hai, uske khoobsoorti ke charche to sune they par umr.. :) sundar gazal… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    September 8, 2011

    अबोध जी, जब शाम को चाँद उदित होता है तो वो नवजात होता है मगर जैसे जैसे रात बीतती जाती है उसकी उम्र भी बढ़ती जाती है। खुद ही अंदाज़ा लगाइए कि ये बूढ़ा चाँद किस वक़्त का होगा? ;)

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    आदरणीया निशा जी सादर नमस्कार, इस प्यारी सी प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    अबोध जी, सबसे पहले तो आप का शुक्रिया, मैं कुछ कहती उससे पहले ही वाहिद जी ने जवाब दे दिया है | वैसे ये कवि मन है कभी उसमें मामा देखा गया (चंदामामा दूर के ) कभी प्रिय या प्रियसी देख जाती है | और कभी चाँद का मुह टेढा :) | खूबसूरत सी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया आप का

chaatak के द्वारा
September 7, 2011

प्रकृति के साथ कवि की भावनाओं का साम्य पढ़कर अच्छा लगा, एक और अच्छी कविता पर आपको हार्दिक बधाई !

    div81 के द्वारा
    September 10, 2011

    चातक जी, इस प्यारी सी प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार


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