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मेरा प्रथम प्रेम-पत्र

Posted On: 14 Feb, 2012 Others में

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वैलेंटाइन डे आते है सबके चेहरे में मुस्कराहट सी खिल जाती सिर्फ कुछ संगठन को छोड़ के | ऐसी ही मुस्कराहट मेरे चेहरे में भी रहती है | अरे गलत अनुमान न लगाइए ये हँसी मेरी शरारत के कारण है | बात स्कूल के दिनों कि है | 9th क्लास में हमारा एक ग्रुप था | जिसको कि हम सूर्या ग्रुप कहते थे | अब वो ग्रुप कहाँ है पता नहीं अंतिम सांसे 10th में ही ले रहा था 11th तक आते आते उसका अंतिम संस्कार भी हो गया क्यूँ कि सभी ने स्कूल चेंज कर लिया था | सिर्फ मैं और मेरी बेस्ट फ्रेंड ही बचे थे उस स्कूल कि कैद में मगर मैं अपनी शरारत बता रही थी |
हमारे ग्रुप में एक लड़की थी जिसको न मैं पसंद करती थी न वो मुझको | पढने में वो अच्छी थी | मगर वो मुझे घमंडी लगती थी या शायद मैं उससे चिढती थी इस लिए ऐसा मुझे लगता था | फी डे वाले दिन हमारा ग्रुप किसी न किसी के घर लंच में जाता था | अब ऐसे ही एक फी डे को उसके के घर कि बारी थी | मैंने प्लान बना लिया था कि नहीं जाउंगी | मगर दोस्तों कि कसमे और गिले के आगे एक न चली और मैं उस के घर सभी के साथ पहुँच गयी | जितना वो शो करती थी | उतना ही उसका परिवार अच्छा था | उसकी मम्मी बहुत प्यार से मिली |
उसके घर जाते हुए कुछ ऐसा घटा जिसने मेरे को शरारत करने के लिए उकसा दिया | हुआ यूँ कि हम सब बातें करते हुए जा रहे थे | उसका घर आर्मी एरिये में था तो वहां बहुत कम लोग ही दिख रहे थे | उसका घर आने वाला ही होगा जब कुछ क्वाटर्स से पहले एक क्वाटर के बहार एक लड़का कुछ पढ़ रहा था | उसको देखते ही हमारी अभिन्न मित्र का चेहरा हया से लाल हो गया | और मुस्कराहट खिल गयी | कहते है न इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते | यहाँ भी वो ही हाल था | ये बात मैंने ही नहीं ग्रुप कि सभी लड़कियों ने महसूस कि थी | हमने एक साथ उसको छेड़ना शुरू कर दिया |
अब वो बेचारी न न करते करते अपनी पसंदगी का इजहार कर गयी | शब्द कुछ यूँ थे | जैसे वो नहीं लड़का उन पर मारता है | जब कि हमने जो बात नोट कि थी वो ये कि लड़का तो हमारे वहां से गुजरने भर से अंजान सा बैठा हुआ था | अपने में मगन | और वो बोल रही थी कि आते जाते आँखों ही आँखों में बहुत कुछ बाते हुई है | जब भी यहाँ से जाती हूँ ये ऊँची आवाज में गाता है | कई बार मुझसे बात करने कि कोशिश कि है | अब आप कहेंगे इतनी भीड़ को देख कर बेचारा अंजान बनने कि कोशिश कर रहा होगा …………….तो मैंने जो बात और नोट कि वो ये कि लड़के ने हम सब कि तरफ देखा और फिर अपने काम में लग गया न आँखों में चमक न होटो पर मुस्कराहट न कुछ बैचेनी उस में ऐसे किसी लक्ष्ण कि नुमाइश नहीं कि थी | जो हमारी खासम खास दोस्त कर गयी थी | मामला एक तरफ़ा था और हमे मजा बहुत आ रहा था मेरे शैतानी दिमाग ने कुछ प्लान बना डाले |
उसके घर गए बहुत कुछ खाया, बहुत मस्ती कि और वहां एक बात और पता चली मेरी खास मित्र कि बहन उसकी चुगली लगाती है और इस लिए उनके बीच अकसर तकरार रहती है | बस मोहरा भी वहां मुझे मिल गया था |
हम सब वहां से वापस जब आ रहे थे | तो वो बेचारा अपने में ही ग़ुम ऊँची आवाज में गाना गा रहा था तो ये बात तो साफ थी ये उन महाशय का शौक मात्र था | न कि हमरी दोस्त के लिए | ग्रुप में बात करते हुए हमने तीर छोड़ दिया कि क्यूँ न इसका मजा लिया जाये | तीर निशाने में था सब ही तय्यार थे | बस हम सब को मौके का इंतजार रहने लगा |
हमने अपनी जिंदगी का पहला और आखरी लव लेटर लिखा जिसका मजमून कुछ यूँ था |

हेल्लो (यहाँ उस खास सहेली का नाम नहीं दूंगी क्यूँ कि आप सभी जानते है क्यूँ )बहुत दिनों से आप से कुछ कहना चाह रहा हूँ मगर मौका ही नहीं मिलता | कभी आप अपनी बहन के साथ होती है कभी अपनी दोस्तों के साथ और कभी अकेली तो उस दिन मैं ही कुछ कह नहीं पता |आप बहुत अच्छी लगती है मुझको | और शायद आप को भी मैं पसंद हूँ | क्यूँ कि आप कि आँखे बहुत कुछ बोलती है मुझसे | उस दिन आप अपनी सहेलियों के साथ थी आप बहुत प्यारी लग रही थी | आप बहुत अच्छी है आप कि हाँ में ही मेरी जिंदगी है | आप कि हाँ के इंतजार में आप का

ये प्रेम पत्र लिख तो दिया था बस अंदर ही अंदर डर भी था | कि कहीं फँस न जाये | मगर डर के आगे जीत है | आखिर वो दिन आ ही गया उसने बताया कि कल वो नहीं आएगी किसी के यहाँ जाना है | हमने चुपके से उसकी एक बुक निकाल ली और दिल ही दिल में बहुत खुश हुए और दुसरे दिन प्लान के मुताबिक वो प्यार में डूबा ख़त हमने उसकी बुक में रख दिया और उसकी प्यारी लाडली बहन को वो बुक दे दी
आप लोग क्या सोच रहे है कि हमने बहुत बुरा किया | नहीं बिलकुल नहीं आप सोच रहे क्या हुआ होगा …………….जी बिलकुल हम भी यही सोच रहे थे अब क्या होगा क्यूँ कि उसके अगले दिन रविवार था | और हम सब दोस्तों का सोच सोच के बुरा हाल था | सोमवार का दिन हम सब उसके आने का इंतजार कर रहे थे ये इंतजार भी कभी कभी बहुत मुश्किल होता है | प्रेयर कि लाइन में भी वो नहीं दिखी हमारी बेचेनी और बढ़ रही थी | तभी उसकी बहन को देखा पूछा वो क्यूँ नहीं आई तो पता चला उसकी तबियत खराब है | खैर एक दिन और बिता दुसरे दिन वो मुह सुजाये खडी थी सभी ने एक साथ पूछा क्या हुआ तेरे चेहरे में ये सुजन कैसी और हाथ पर नील का निशान पता तो था इस बेचारी का क्या हाल हुआ है मगर उसके मुह से उसकी दास्ताँ सुननी जरुर थी |
तो हुआ यूँ कि बहन के हाथ वो लेटर लगा वहां से वो मम्मी के हाथ लगा माँ ने पहले तो उसकी अच्छी खासी धुलाई हुई फिर वो लेटर ले कर माँ जी उस लड़के के घर उसकी धुलाई के लिए गयी उसने जब उसको कुछ लिखा ही नहीं था तो होना क्या था |
हां एक बात ये हुई उसने हमारी सखी से राखी जरुर बंधवा ली | मेरा छोटा मजाक ये रूप लेगा सोचा न था | खैर उसको मार के साथ एक भाई मिल गया था | और हमारे दिल में एक प्राश्चित रह गया था | फिर ऐसी शरारत न करने कि कसम खा ली थी | मगर कसमे तो खाई ही तोड़ने के लिए जाती है |



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47 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Malik Parveen के द्वारा
March 13, 2013

दोहरी मार पड़ गयी उस बेचारी पर तो न तो प्रेमी मिला और बिना बात के ही तस्सली से पिटाई और हो गयी … बहुत बुरा हुआ बेचारी के साथ …… आगे तो कभी हिम्मत नहीं कर पाई होगी और तुम इतनी शैतान हे भगवान् .. जरा भी नहीं सोचा अपनी सहेली का ???? :D

    div81 के द्वारा
    March 13, 2013

    उस बेचारी ने हमें बहुत परेशां किया …. उसकी हिम्मत के किस्से तो हम आज भी सुनते है तो आश्चर्यचकित हो जाते है उसको मार का कोई असर नहीं हुआ कभी   :P 8) दोस्त, सहेली ही तो होते है शैतानी निशाने में … आप बचके रहिएगा

aman kumar के द्वारा
March 13, 2013

सही बात है कभी कभी छोटी से सरारत भी बड़ी घटना का रूप दे देती है ! आपकी रचना मजेदार है ! फिर ऐसी शरारत न करने कि कसम खा ली थी | मगर कसमे तो खाई ही तोड़ने के लिए जाती है |

ashishgonda के द्वारा
October 15, 2012

आदरणीया! सादर, बहुत ही रोचक प्रस्तुति, आपने अपने बचपन की यादो को हमारे साथ बांटा आपको धन्यवाद. आपका प्रेम-पत्र मैंने पढ़ लिया अब जरा आप मेरी रचना “एक अधूरी प्रेम-कथा” पढ़ लें, तो मुझे बहुत खुशी होगी- http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/10/08/%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE/

pawansrivastava के द्वारा
April 14, 2012

बहुत चुलबुला सा संस्मरण ठीक इसी तरह की खट्टी मीठी तासीर रखती मेरी एक रचना’हाय वो अंदाज पुराना मुहब्बत वाला ‘ मेरे नीचे दिए गए ब्लॉग पे पढ़िए ….I am sure you would love it http://pawansrivastava.jagranjunction.com/2012/03/31/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a5%9b-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b9%e0%a4%ac/

    div81 के द्वारा
    April 17, 2012

    आप का बहुत शुक्रिया पवन जी …………..चलिए आप की कविता का भी आनंद उठाते है

February 22, 2012

दिव्या जी आपकी इस शरारती वाकिए ने मज़ा ला दिया। इस मजेदार और रोचक संस्मरण ने बचपन की याद ताज़ा कर दी । मंच पर इस कहानी को शेयर करने के लिए हार्दिक धन्यवाद !

    div81 के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीय सूरज जी, इस वाकिए को याद कर के अब भी हम दोस्त खूब हँसते है | सोचा इस मंच में आप सभी ब्लोगर्स मित्रो के बीच भी साझा किया जाये | जान कर ख़ुशी हुई की इतने गंभीर लेख, ग़ज़ल और कविताये लिखने वाले सभी लोग शरारती रह चुके है :) आप का तहे दिल से शुक्रिया

dineshaastik के द्वारा
February 20, 2012

बचपन होता ही है शरारतों के लिये……चलों अच्छा हुआ आपकी सहेली की मम्मी ज्यादा समझदार थीं। जो शरारती प्रेम पत्र की तह तक नहीं गयीं…..रोचक प्रसंग….कालेज लाइफ की शरारतों की याद दिला गई। काश वो दिन दोबारा वापस आ जायँ। उन दिनों की यादें ही गुदगुदा जाती हैं। नया दिन होता था नई शरारतें होतीं थी…..सॉरी प्रतिक्रिया देने आया था। अपनी कहानी लिखने लगा। क्या करूँ आपका आलेख  ही ऐसा था कि याद दिला गया अनकही शरारतें…….

    div81 के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीय दिनश जी, बिलकुल बचपन होता ही शरारतों के लिए …………….मुझे खुशी है की कुछ पल के लिए आप उन पलो को फिर से महसूस कर पाए सच हर दिन नहीं शरारतो के साथ जाता था | सॉरी कह के शर्मिंदा न कीजिये अच्छा लगा जान के …………………… आप का तहे दिल से शुक्रीय अपनी दिल की बात साझा करने के लिए साथ मे इतनी प्यारी प्रतिक्रिया के लिए

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 18, 2012

आदरणीया दिव्या जी, सादर. आपकी इस पोस्ट पर प्रथम प्रतिक्रिया, सबसे नीचे. क्या पसंद नहीं आई. पुनः बधाई.

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी, प्रथम प्रतिक्रिया के लिए आप का हृदय से आभार | सर ऐसी बात नहीं सवर्प्रथम मैं आप कि ही प्रतिक्रिया का आभार व्यक्त कर रही थी मगर बार बार कोड एर्रोर आ रहा था वाहिद जी कि प्रतिक्रिया मे भी जब ये ही हुआ तो मैंने ऊपर से प्रतिक्रयाओं का आभार व्यक्त करना प्रारम्भ कर दिया | तकनिकी खराबी के करना ये सब हुआ अगर आप को बुरा लगा हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ इस तकनिकी भूल के लिए उम्मीद है माफ कर देंगे | एक बार फिर से आप का बहुत बहुत आभार

yogi sarswat के द्वारा
February 16, 2012

दिव्या जी नमस्कार ! अपनी बात को इतना हंस हंस के कहना , नटखट पन! सब कुछ तो कह दिया आपने ! बढ़िया !आपने ने इस बात को मन है कि कसमे तो खाई ही तोड़ने के लिए जाती है. तो ये कसम फिर कब टूटी हम लोग जरुर जानना चाहेंगे……..वैसे आपका यह प्रथम प्रेम-पत्र बहुत पसंद आया और साथ ही अभिव्यक्ति का अंदाज भी……बहुत खूब. http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/02/14

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    योगी जी नमस्कार, मेरा ये शरारती किस्सा आप को पसंद आया इसके लिए आप का हार्दिक आभार मगर उस शरारत के बाद कई दिन बड़े ही बैचेन गुजरे मन मे यही डर था कहीं इस सब घटनाक्रम की पीछे किसका हाथ है अगर मेरी सहेली को पता चल जाता तो हमारी क्या गत बनती ये हम ही जानते है | आप का तहे दिल से शुक्रिया !

akraktale के द्वारा
February 15, 2012

दिव्या जी नमस्कार, शुक्र है उसको मालुम नहीं पडा की ये शरारत किसकी है वरना मार खाने का अगला नंबर उसका था. सुन्दर यादों का चिट्ठा प्रस्तुत किया अपने. बधाई.

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय अशोक जी, सादर नमस्कार ! सच शुक्र है ये उसको मालूम नहीं पड़ा वरना ये शरारत हम पर भारी पड़ जाती और मार खाने का अगला नम्बर हमारा ही था सोच के ही रूह काँप गयी मेरी :) आप का तहे दिल से शुक्रिया

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
February 15, 2012

दिव्या जी , अच्छी पोस्ट

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    रीता जी, आप का बहुत बहुत शुक्रिया

अलीन के द्वारा
February 15, 2012

div81 सादर नमस्कार! आपने ने इस बात को मन है कि कसमे तो खाई ही तोड़ने के लिए जाती है. तो ये कसम फिर कब टूटी हम लोग जरुर जानना चाहेंगे……..वैसे आपका यह प्रथम प्रेम-पत्र बहुत पसंद आया और साथ ही अभिव्यक्ति का अंदाज भी……बहुत खूब. मेरी प्रेम कहानी जरुर पढियेगा….मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    अलीन जी, सादर नमस्कार ! बहुत जल्दी ही टूट गयी थी वो कसम तो बचपन तो शरारतो के बिना अधूरा है | आप का तहे दिल से शुक्रिया

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 15, 2012

देव्या जी,नमस्कार प्रथम बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ क्यूंकि अभी नया हूँ यहाँ किन्तु आते ही आपकी शरारती अंदाजों को पढ़ कर मजा भी आया और थोड़ा दया भी आया आपके प्रिय सहेली पर वैसे कसम के मामलें में मेरी सोच आपसे जुदा नहीं है “कसमों का क्या है, खाया, पीया और पचाया” हा हा हा

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आनंद प्रवीन जी, सादर नमस्कार ! आप का ब्लॉग मे स्वागत है | कसम खाने और तोड़ने का साथ बचपन तक ही रहा अब मेरी सोच आप की सोच से जुदा है कसम खाने वालो का मैं यकीं नहीं करती हा हा हा :P आप का तहे दिल से शुक्रिया

drmalayjha के द्वारा
February 15, 2012

दिव्या जी, बचपन की शरारतों का हाथ थामे जब हम पहुँचते हैं जवानी की दहलीज पर तो बीते हुए लम्हों की खट्टी-मीठी यादें अक्सर दिल के दरवाजों पर दस्तक दे जाती हैं. सही समय पर आपको वो दिन याद आया. हमें उन यादों के पलों से परिचित कराने के लिए शुक्रिया.

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय मलय जी, बिलकुल सही कहा आप ने बचपन की खट्टी मीठी यादें खूबसूरत लम्हों मे पहुंचा देती है | मेरे उन शरारती पलो को पसंद करने के लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया

Santosh Kumar के द्वारा
February 15, 2012

दिव्या बहन ,.नमस्कार मजा आ गया आपका नटखट संस्मरण पढ़कर ….पहले चिट्ठिया पकडे जाने से बड़े रिश्ते टूटे और राखी बंधी है ,..आपकी कहानी तो उससे भी आगे है ,.बिना पोस्टिंग के तबादला हो गया ,…अब यस ऍम यस का ज़माना ठीक है ,..एक बार लिखकर सब जगह भेज देते हैं …हा हा

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय संतोष जी, सादर नमस्कार इस नटखट संस्मरण को पढ़ के आप को मजा आया जानकार मुझे भी अच्छा लगा सच कहूँ तो उतना मजा हमें भी आया था ये सब होने पर मगर उसके बाद बड़ा डर सता रहा था की कहीं पता चला गया तो अपनी खैर नहीं :) आप का तहे दिल से शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
February 15, 2012

आपका संस्मरण पढ़कर मज़ा तो आया प[र बेचारी आपकी नटखट गतिविधि का शिकार बनी आपकी पढ़ाकू सहेली का हाल पढ़कर उससे सहानुभूति भी.चलिए जो हुआ सो हुआ

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    ये गलत बात है निशा जी आप उससे सहानुभूति कर रही हो उस अकेली ने पूरी क्लास को बहुत सताया है खैर उस पल तो हमको भी उससे सहानुभूति हुई थी मगर कुछ ही देर मे कुछ ऐसा घटा कि वो हट भी गयी | आप का तहे दिल से शुक्रिया

abodhbaalak के द्वारा
February 15, 2012

:) तो आप बचपन में ऐसी थी….. और अब तो और भी ………….. बच कर रहना पड़ेगा मंच वालो को :) मज़ा आया आपके इस संस्मरण को पढ़ कर http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    :p बिलकुल भी नहीं, नहीं तो ;-) अरे कहा न नहीं और अब तो बिलकुल भी नहीं ………………. हा हा हा कब तक बचियेगा अबोध जी :) अच्छा लगा जानकर कि आप को मजा आया आप का तहे दिल से शुक्रिया

newrajkamal के द्वारा
February 14, 2012

दिव्या बहिन ….. सादर अभिवादन ! अगर वोह गड़बड़ नहीं हुई होती तो आपकी सहेली उस अनजान राही की बहिन नहीं होती होगा उसमे भी छुपा हुआ कोई भेद क्योंकि कुदरत अपने काम यूँ ही नहीं करती इस हंसाते + गुदगुदाते हुए मजेदार और रोचक संस्मरण को बता कर माहौल को खुशगवार बनाने के लिए हार्दिक आभार

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय राजकमल भाई, सादर नमस्कार ! हाँ शायद वो अनजान ही रहते या फिर अच्छे दोस्त होते या शायद ??????????? वैसे इस गडबड के बाद उन दोनों कि नोकझोंक उसके बाद अच्छी दोस्ती भी हो सकती थी मगर कुदरत को जो मंजूर था हुआ वही | आप का बहुत बहुत शुक्रिया राजकमल भाई

pushkar के द्वारा
February 14, 2012

कसम अगर तोरी न जाई तो खाया ही क्यों जायेगा:). सच कहा है करे कोई भरे कोई!शरारत आपकी और पिट गये बेचारे दो आसिक!इतना ही नही velantion day के बदले रक्षा बंधन!! सुन्दर संस्मरण !हार्दिक बधाई

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    पुष्कर जी, आप का तहे दिल से शुक्रिया

shashibhushan1959 के द्वारा
February 14, 2012

आदरणीय दिव्या जी, सादर ! बचपन की यादें साझा करने के लिए धन्यवाद !

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय शाशिभूषण जी, सादर नमस्कार ! आप का तहे दिल से शुक्रिया !

sadhana thakur के द्वारा
February 14, 2012

दिव्या जी ,रोचक संस्मरण ,,बचपन की यादें यूँ ही कभी -कभी गुदगुदा जाती है ,आभार ……

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय साधना जी, आप का तहे दिल से शुक्रिया

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 14, 2012

दिव्या जी, आपकी साहित्य के प्रति रूचि से तो हम सभी वाकिफ़ थे मगर ऐसी शैतानी सोच का कोई अंदाज़ा ही नहीं था। खैर लड़कपन तो शैतानियों के ही नाम होता ही है हम सब ने भी कभी न कभी कुछ न कुछ शैतानी हरकतें अपने अपने बचपन में। रोचक किस्सा प्रस्तुत किया आपने। पढ़ कर मज़ा आया। हा..हा..हा…

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    वाहिद जी, बिलकुल बिना शरारतो के तो बचपन अधूरा है | अच्छा लगा जानकार कि आप को ये शरारती किस्सा पढ़ कर मजा आया आप का तहे दिल से शुक्रिया

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 14, 2012

दिव ८१ जी नमस्ते. छोड़ दिया सस्ते आशिक जीता बना गामा पिता तो बना मामा धारा प्रवाह लेख हेतु बधाई गलती की दोबारा करूंगा खिंचाई बात समझ मैं आई ..?

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    February 14, 2012

    पिता नहीं पिटा पढने का कष्ट करें

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी, प्रणाम बिलकुल सर गलती में खिंचाई KYA पिटाई भी कर सकते आप इस अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    February 18, 2012

    लगता है अब आपकी सारी पोस्ट पढनी पड़ेंगी. हर हफ्ते मेरे चश्मे का नंबर बदल रहा है उसका क्या होगा. खुश रहो, ऐसी शैतानी बार बार करो.

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी, बिलकुल सर पूरा ब्लॉग पढ़ के अपनी बेशकीमती राय भी दीजियेगा | और रहा चश्मे का नम्बर तो आप गाजर खाइए, हरी- हरी घास मे चलिए और सुबह सुबह बाबा जी के साथ योग को कीजिये नम्बर बढ़ेगा नहीं हो सकता है चश्मा भी हट जाए :) आप का आशीर्वाद यूँ ही बना रहे

    shashibhushan1959 के द्वारा
    February 18, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी, आदरणीय दिव्या जी की गाजर खाने और घास पर चलने वाली चिकित्सा लौकिक चिकित्सा है, मेरी राय मानें तो अलौकिक चिकत्सा करें—– लाल-लाल गाज़र पर चलें हरी-हरी घास खाएं. अवश्य लाभ होगा ! (दिव्या जी से क्षमायाचना सहित)

    div81 के द्वारा
    February 18, 2012

    हा हा हा आदरणीय शशिभूषण जी अगर ये व्यक्तिगत अनुभव है और इससे वाकई में फायदा होता है तो अजमाने में हर्ज नहीं :P आदरणीय प्रदीप जी आप अलौकिक चिकित्सा पद्धति को अमल मे ले आइये और लाभ होने पर बढ़िया सा ब्लॉग हम सब के साथ साझा भी कीजियेगा | हा हा हा आदरणीय शशिभूषण जी क्षमा मांग के शर्मिंदा मत कीजिये आप बड़े है और वैसे भी जागरण मंच एक परिवार कि तरह है |


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