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खुद से, जिंदगी से और खुशियों से

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दंश

Posted On: 29 Jun, 2012 Others में

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मैं जब गुजरती हूँ
इन परिचित राहों से
मिलते है कई चेहरे
पहचाने, अनजाने से
जिस्म को चीरती नजर
अश्लील फब्तियां, गंदे इशारे से
हो जाती हूँ मैं असहज
ढूंढ़ती हूँ मैं राह
इन सब से बच जाने कि
कभी मन होता है
हिम्मत करूँ आगे बढूँ
सामना करूँ इन ना मर्दों का
फिर चुप हो जाती हूँ
ये सोच कर कल ही तो
इक लड़की खबर बन गयी थी
सभी चैनल और अख़बार में
छप वो गयी थी
किया था हौसला उसने
लिया था फैसला उसने
ऐसे ना मर्दों को सबक सिखाएगी
चुप न बैठेगी वो ललकारेगी
बीच बाजार हुआ तमाशा खूब था
जड़ दिया तमाचा एक जोर का
बात बड़ी, भीड़ बड़ी
तमाशबीन उस भीड़ मे
असली चेहरों कि भी
पहचान खूब हुई
लड़की का हौसला
उन लड़कों को ना हजम हुआ
अगले ही दिन उस लड़की कि
अस्मिता को तार- तार कर गए
बदले की आग मे, तेजाब से
उसका चेहरा भी बेकार कर गए
परछाईं भी छुए तो सहम वो जाती थी
अपना चेहरा देख कर डर वो जाती थी
इसी डर और ख़ौफ़ में
वो फैसला कुछ कर गयी
अपने परिवार को
रोता बिलखता वो छोड़ गयी
जिस दामन से अपना रूप सजाती थी
अपने गले में उसी से
फाँसी का फंदा लगा गयी
इस लिए चुप मैं कर जाती हूँ
रोज नया जहर का घूंट मैं पी जाती हूँ

____________________________________________________________________________________________________

बदकिस्मत हैं हमारा  समाज जहां बलात्कार होता है



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54 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 11, 2012

आदरणीय दिव्या बहिन …. सादर अभिवादन ! ऐसे मौको पर ही कानूनों में ढील और उनको लागू करने में ढीलापन और निकम्मापन तथा अपराधियों को सख्त सजा देने और दिलवाने में नाकाम पुलिस बल और हमारा तंत्र इन सभी पर बेहद गुस्सा आता है मैं समझता हूँ की किसी नारी को जीते जी तिल -२ मरने देने पर मजबूर करने वाले गुनाहगारो को भी तालिबानी तरीके से ही सजा देनी चाहिए लेकिन हमारी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल पर भी गुस्सा है जिन्होंने जाते जाते कई फांसी की सज़ा प्राप्त बहुत से अपराधियों की सजा को उम्र कैद में बादल दिया है ….. हमारी धर्म निरपेक्ष नर्मी बहुत सी गलत जगह पर भी इस्तेमाल की जाती है तथा उसका अनुचित फायदा भी उठाया जाता है ….. इन मामलों में लंबा केस चलाने की बजाय जल्द से जल्द फैसला लेकर अपराधियों को सख्त सजा देनी चाहिए …. इस विषय पर पहली बार आपकी कलम से पढ़ने को मिला है ….. भगवान से यही प्रार्थना है की इस दंश को किसी भी नारी को ना झेलना पड़े …..

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    आदरणीय राजकमल भाई, सादर प्रणाम बिलकुल सही कहा आपने पहले से ही हमारी कानून व्यवस्था में हजारों पेंच है ऊपर से अपराधियों के लिए यूँ दरियादिली दिखाना कहीं से भी उचित नहीं है | ये कविता मैंने बारहवी के वक्त लिखी थी | भगवान करे ऐसा ही हो आप का तहे दिल से शुक्रिया देरी से जवाब देने के लिए क्षमा चाहूंगी :)

nishamittal के द्वारा
July 10, 2012

वाह दिव्या नारी की विडंबना को इतनी सुंदरता से तुमने वर्णित किया है समाज का सबसे घृणित सच

yogi sarswat के द्वारा
July 9, 2012

दिव्या जी , बहुत ही मार्मिक सी कहानी को आपने काव्य का रूप देकर बहुत ही पठनीय बना दिया है !बहुत सुन्दर लिखा है आपने

    div81 के द्वारा
    July 10, 2012

    आदरनीय योगी जी, सादर प्रणाम आप का बहुत बहुत शुक्रिया

ajaykr के द्वारा
July 8, 2012

बहुत घृणित सच्चाई हैं ………………

    div81 के द्वारा
    July 10, 2012

    अजय जी, नमस्कार जाने कब इस घृणित सच्चाई से समाज मुक्ति मिले…….. आप का शुक्रिया

    ajaykr के द्वारा
    July 14, 2012

    आपको मेरे ब्लॉग पर आमंत्रण हैं|

sudhajaiswal के द्वारा
July 7, 2012

दिव्या जी, आपकी कविता समाज के बदसूरत चेहरे से नकाब हटाने का कार्य करेगी | हमारे समाज की सजीव तस्वीर अपनी रचना के द्वारा सामने रखी है | इसके लिए आपको बधाई |

    div81 के द्वारा
    July 10, 2012

    सुधा जी, नासकार समाज का बदसूरत चेहरा हर कोई जनता है मगर हमारी आदत पड चुकी है कुछ न बोलने की………….. मंच में और ब्लॉग में आप का स्वागत है  साथ ही आप का शुक्रिया

roshni के द्वारा
July 5, 2012

दिव जी आज के घिनोने सच को बाखूबी बयाँ कर रही है आपकी रचना बहुत बढ़िया बधाई आभार

    div81 के द्वारा
    July 10, 2012

    रौशनी जी, नमस्कार बहुत दिनों बाद मंच पर और अपने ब्लॉग पर अआप के दर्शन हुए अच्छा लगा… आप का शुक्रिया 

ANAND PRAVIN के द्वारा
July 5, 2012

आदरणीय दिव्या दीदी, सादर प्रणाम मंच पर वापस आया सोचा कुछ अच्छा मिलेगा ………..अच्छा तो मिला पर सच्चा मिला सुन्दर लेखनी आज नारी जीवन बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहा है आज क्या सायद पहले से ही मानव ही मानवता को जब भूल जाए तो कोई क्या कर सकता है आपके इस कविता के आकरी शब्द जो लाल अक्षरों में लिखे है काफी पिरादायक है ……..हमें सोचना चाहिए मैंने इसपर एक कविता भी लिखी थी “अबला” जो शायद मेरे द्वारा लिखी गई कुछ अच्छी कविताओं मेनन से हैं……..कवी जरुर पोस्ट करूंगा ………….जो भी हो सुन्दर कविता के लिए बधाई …….देर से आने के लिए क्षमा………और एक टिप्स …….आधुनिक नारी है……..टेंसन लेने का नहीं देने का………..हा हा

    div81 के द्वारा
    July 10, 2012

    आनंद भाई, खुश रहो :) मंच में देख के अच्छा लगा शिकायत है भाई हमको आप से हमें लगा चलो आप की शादी के बहाने सभी मंच वालो से मिलना होगा मगर आपने तो निमंत्रण ही नहीं दिया किसी को भी ये बहुत गलत बात है | फेसबुक में नवयुगल की तस्वीर देखी बहुत अच्छी और प्यारी जोड़ी……..मगर नाराजगी अपनी जगह कायम है अभी भी | आप की कविता का इन्तजार रहेगा ………….. क्षमा मांग के शर्मिंदा मत करो और जल्दी से अपनी कविता पोस्ट कर दो ………………….. शुक्रिया

div81 के द्वारा
July 4, 2012

क्या मंच से दूरी के कारण मंच के साथियों ने मेरा नाम बदल दिया है ??????? ……………….. या लगता है सब को दीप्ती आप का नाम पसंद है | खैर नाम मे क्या रखा है :) :) :P :) :P

rekhafbd के द्वारा
July 1, 2012

दीप्ति जी ,हमारे समाज का एक घिनोने चेहरे को उजागर करती हुई यह रचना लेकिन कब तक चुप रह सकते है ऐसे लोगों को तो कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए ताकि आगे से कोई ऐसा क्राइम न कर सके ,आभार

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय रेखा जी, सादर नमस्कार अरुणा शानबाग ये नाम सारे समाज को शर्मिंदा करने के लिए काफी है एक लड़की जिसकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने एक हैवान को इंसान बनने का सबक सिखाया था और उसकी सजा उसे मिली ३७ सालो से वो कोमा मे लकवा ग्रस्त एक शरीर मात्र है और उसको इस स्थिति तक पहुँचाने वाले दरिंदे को अदालत ने सोहनलाल पर अरुणा की हत्या की कोशिश और कान की बाली लूटने का आरोप लगा। हैरानी की बात ये है कि उसपर बलात्कार की कोशिश का आरोप तक नहीं लगा, पुलिस ने ऐसी कोई धारा नहीं लगाई। फिर भी सोहनलाल को सात साल की सजा मिली, सजा काट कर वो रिहा हो गया। लेकिन अरुणा आज भी 37 साल से बेसुध पड़ी है। कड़ी सजा क्या और किसे मिलेगी एक लड़की अपना सब कुछ गँवा चुकी होती है और हर पल एक सजा वाली जिंदगी जी रही होती है और बलात्कारी को सजा भोग के खुलेआम फिर से घूम रहा होता है ऐसे कानून के रहते लोगो का हौसला पस्त नहीं होता उनको डर नहीं है न समाज कि न कानून की तो कहाँ से घटेगी अपराधों कि संख्या | आप का शुक्रिया

chaatak के द्वारा
July 1, 2012

दिव्या जी, ह्रदय को झकझोर देने वाली पंक्तियाँ और हमें आत्म-मंथन के लिए मजबूर करने वाला निष्कर्ष ! सच्ची तस्वीर को पटल पर रखने पर बधाई!

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय चातक जी, सादर नमस्कार !! आप का तहे दिल से शुक्रिया …………………

pritish1 के द्वारा
July 1, 2012

अपने समाज और वर्त्तमान परिस्थितियों पर लज्जा आती है………पता नहीं क्यूँ हम कुछ कर नहीं पाते…….क्यूँ रोकने में असमर्थ हूँ ऐसे अनर्थ को……….. किन्तु समाज के परिवर्तन के लिए प्रयत्नरत हूँ और रहूँगा…….. प्रीतीश

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय, प्रीतिशजी, सादर !! अँधियारा दूर करने के लिए एक दिया ही काफी होता है आप प्रयत्नरत रहिये कारवां जरुर बनेगा और इस समाज मे परिवर्तन भी जरुर आएगा……………… आप का तहे दिल से शुक्रिया

jagojagobharat के द्वारा
July 1, 2012

दिव्या जी वर्तमान पर एक बहुत ही सुन्दर पोस्ट .

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आप का तहे दिल से शुक्रिया…..

vasudev tripathi के द्वारा
June 30, 2012

दिव्या जी, समाज के कलुषित किन्तु वास्तविक चित्र को स्पष्ट करती सरहनीय पंक्तियाँ!!!

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    त्रिपाठी जी, सादर नमस्कार !! आप का ह्रदय से आभार …………………….

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 30, 2012

आज की सच्चाई की तस्वीर खींचती एक सशक्त रचना ! बधाई !

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आचार्य जी, सादर प्रणाम आप का तहे दिल से शुक्रिया

VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
June 30, 2012

बहुत अच्छा लिखा है आपने , दिव्या जी |

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय विवेक जी, सादर आप का बहुत बहुत शुक्रिया

SAVI के द्वारा
June 30, 2012

बहन दिव्या, तुम्हारी कविता ने दिल को झकझोर दिया| मैं बस इतना कहना चाहती हूँ, “इतना कुछ सहती है नारी, अपने परिवार का सहारा है नारी| काश समझ ले सभी इस बात को, माँ, बहन,पत्नी,बेटी होती है नारी| जिस समाज में होती है अपमानित, उसी समाज की जननी है नारी|”

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीया दीदी, सादर मंच में और मेरे ब्लॉग में आप का स्वागत है मेरी कविता को पूर्णता प्रदान करने के लिए आप का ह्रदय से आभार

allrounder के द्वारा
June 30, 2012

नमस्कार दिव्या जी, व्यक्ति की मानसिक बीमारी का परिचायक है इस प्रकार की यातनाएं, जिनका शिकार कई मासूमों को होना पड़ता है, कहने को हम कह सकते हैं की इनके खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए किन्तु लड़की की दृष्टि से हमारा सामाजिक ढांचा उसको ऐसा करने से रोकता है, और कोई यदि हिम्मत करके पीड़ित लड़की आगे भी आये तो हमारा कानून इतना लचर है, की गुनाहगार की जगह पीड़ित को इतना शर्मशार होना पड़ता है की शायद उसे अपने निर्णय पर पछताना पड़े, ऐसे मैं उसके सामने अपनी इहलीला समाप्त करना ही उचित लगता है ! उफ़ ! कितना दर्दनाक है ये पीड़ित और पीड़ित परिवार के लिए !

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    सचिन जी, नमस्कार कविता के मर्म के साथ लड़कियों कि स्थिति को समझने के लिए आप का ह्रदय से आभार लड़कियां विरोध करती है मगर जब अकेली लड़की को ग्रुप मे छेड़ा जा रहा होता है तो उस वक्त आप पास के लोग भी आँख कान बंद कर के चले जाते है कोई नहीं विरोध करता ऐसे समय मे जब कि संगठन की शक्ति के आगे कोई भी नहीं टिक सकता मगर तब कोई आगे नहीं बढ़ता हमारा सामाजिक ढांचा, कानून व्यवस्था, लोगो कि मानसिकता सब मे सुधार कि आवश्यकता है | एक बार फिर से आप का ह्रदय से आभार

Alka Gupta के द्वारा
June 30, 2012

दिव्या जी, बलात्कार पीड़िता की अंतर्व्यथा का यथार्थ चित्रण किया है….. ऐसी घटनाएँ पढ़ कर या सुनकर मन बहुत ही व्यथित हो जाता है …. समाज की सच्चाई को उजागर करती उत्तम रचना के लिए बधाई

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीया, अलका जी, सादर प्रणाम !! सच ऐसी घटनाओ को सुना कर मन बहुत व्यथित हो जाता है साथ भी रोष भी होता ऐसे समाज मे जहां महिलाओं को सम्मान नहीं सिर्फ एक भोग्या कि नजर से देखा जाता है | सराहना भरी प्रतिक्रिया के लिए आप का ह्रदय से आभार

dineshaastik के द्वारा
June 30, 2012

दीप्ति जी, एक  लड़की की वास्तविक  पीड़ा के शब्द, जब भी ऐसी घटना सुनने को मिलती है तो मुझे ऐसा  लगता है कि जैसे यह उस  लड़की के साथ  ही नहीं बल्कि  हमारे समाज  के साथ  घटित हुआ   है। कृपया इसे पढ़कर अनुगृहीत करें- मंदिरों की लूट भारत की बरबादी http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/06/30/%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B2%E0%A5%82%E0%A4%9F-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%B0/

    dineshaastik के द्वारा
    June 30, 2012

    क्षमा चाहता हूँ कि दिव्या की जगह दीप्ति लिख गया।

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय, दिनेश जी, सादर नमस्कार !! आप का तहे दिल से शुक्रिया

akraktale के द्वारा
June 30, 2012

दिव्या जी सादर, समाज के एक दरिंदगी भरे चेहरे को उजागर करती हुई सत्य पर आधारित रचना बेकल करती है किन्तु इतने से खामोश बैठ जाना उनको बढ़ावा देना ही तो होगा. आज हम संगठन की शक्ति को भूल कर अकेले हो चले हैं और ऐसी समाज विरोधी ताकतें उसी का लाभ ले कर फलफूल रही है. अच्छी संदेशात्मक रचना पर शुभकामनाएं.

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय, अशोक जी, सादर नमस्कार !! अभी कुछ महीनो पहले कि एक घटना आप को बताती हूँ हमारी कॉलोनी मे एक परिवार है जिसमे पति, पत्नी और तीन साल कि छोटी बच्ची है इनका आपस मे अक्सर झगडा होता रहता है एक रात ऐसे ही इनके घर से चीखने चिल्लाने की आवाजे आ रही थी रोज का झगड़ा समझ किसी ने ध्यान नहीं दिया मगर आवाजे बढती जा रही थी हम से रहा नहीं गया तो अपनी दीदी के साथ उनके घर चले गए वहाँ का नजारा देख के हम डर गए पत्नी मट्टी तेल से पूरी तरह भीगी हुई है पति उसको पिट रहा है बच्ची एक तरफ डरी हुई सहमी सी रोये जा रही है भाग के हमने पापा जी को बुलाया और दूसरे लोगो को बुलाने लगे कॉलोनी मे उस वक्त सब थे मगर किसी भी घर के दरवाजे नहीं खुले ये हमारे समाज का असली चेहरा है जहां रोड पर इंसान तडफ तडफ के मर जाता है और लोग उसके बगल से निकल जाते है | इस समाज को कैसे संगठित किया जाए कि विरोधी ताकत फलफूल न सकें | आप का तहे दिल से शुक्रिया

Ravinder kumar के द्वारा
June 29, 2012

दिव्या जी , सादर नमस्कार. आप ने अपनी कविता के माध्यम से समाज को दर्पण दिखाया है के अपने आप को शिक्षित, सभ्य, नारी को देवी मानने वाले समाज का वास्तविक रूप कौन सा है ? बदकिस्मत एक बलात्कार पीड़ित नहीं होती हैं बदकिस्मत हैं वो समाज जहां बलात्कार होता हैं बेहतरीन कविता की श्रेष्ठतम पंक्तियों के लिए आप को साधूवाद और भविष्य के लिए शुभकामनाएं. नमस्ते जी.

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय, रविंदर जी सादर नमस्कार !! कविता के मर्म को समझने के लिए और सराहना भरी प्रतिक्रिया के लिए आप का ह्रदय से आभार…

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 29, 2012

स्नेही दिव्या जी, शुभाशीष आपका काव्य वास्तविक चित्रण है, सत्य के बहुत नजदीक है. पर जीना है इसी गंदे समाज में. पहल तो करनी ही होगी, किसी न किसी को. कोई न कोई तो सूली लटकेगा ही. चेतना जाग्रत होगी, साहस बढेगा तो ये ही तेज़ाब फेंकने वाले अपना मुह छिपाते घूमेंगे. सार्थक रचना हेतु बधाई.

    jlsingh के द्वारा
    June 30, 2012

    बिलकुल सही…. दिव्या जी, आदरणीय कुशवाहा जी की राय से मैं सहमत हूँ … हम चूंकि विरोध नहीं करते इसलिए उनका हौसला बढ़ता जाता है. विरोध तो करना ही होगा…. जुल्म के खिलाफ!

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी, सादर प्रणाम !!! प्रोह्त्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए आप का ह्रदय से आभार….

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरनीय, जे.एल.सिंह जी, सादर नमस्कार !! आप का तहे दिल से शुक्रिया

rita singh 'sarjana' के द्वारा
June 29, 2012

दिव्या बहन हकीकत ब्यान करती इस सशक्त कविता के लिए बधाई l

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीया रीता दीदी, सादर नमस्कार !! आप का तहे दिल से शुक्रिया….

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
June 29, 2012

दिव्या जी नमस्कार. यथार्थ…समझ में ही नहीं आता, आज का समाज इतना विकृत क्यों होता जा रहा है. व्यक्ति की नैतिकता ही समाप्त होती जा रही है. रिश्तों का सम्मान करना ही लोग भूलते जा रहे हैं. कहने को तो हम तरक्की कर रहे है शायद हम और हमारा समाज गर्त में जा रहा है. यह समाज अब ऐसे नहीं सुधरने वाला…यहाँ नैतिकता का पाठ पढाना भी बेवकूफी है. अब हर लडकी को मजबूत बनना ही पड़ेगा. अपने सम्मान के लिए..अपने परिवार के सम्मान के लिए…

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय अजय जी, सादर नमस्कार …. एकाकी परिवार, और एकाकी जीवनयापन, व्यक्तिवादी सोच ये सब नतीजा है समाज के बिखराव का हम तरक्की तो कर रहे है मगर अपने नैतिकता और सामाजिकता को भूल कर आज किसी को परवाह नहीं है न परिवार का भय है न समाज का और लचर कानून व्यवस्था के करना कानून का भी भय नहीं है लोगो मे ऐसी स्थिति मे समाज से अपराधों कि संख्या बढ़ेगी ही | आप का बहुत बहुत शुक्रिया

June 29, 2012

बहुत बढिया चित्रण किया है दिव्या जी आपने …लेकिन यह हकीक़त दुर्भाग्य से शराफत के साथ जीवन जीनेवाले लोगो के साथ ज्यादा होता है…जिम्मेदार कौन है ? इसपर व्यापक बहस हो सकती है, लेकिन हमें यह ध्यान जरुर रखना चाहिए कि ऐसी घटनाये ज्यादातर शहरों में होती है जहां व्याक्तिकेंद्रित जीवन लोग जीते है. उन्हें समाज कि परवाह नहीं रहती. हम क्या पहन रहे है, कैसी गतिविधिओं में शामिल है, हमारी बोलचाल और व्यवहार कैसा है ?….जबतक उपरोक्त के प्रति समग्र चिंतन समाज में नहीं होगा तबतक समस्याएं जस की तस रहेगी .

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    अभिषेक रंजन जी, सादर नमस्कार नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 1973 में 2919 बलात्कार की घटनाएं दर्ज हुई | १९७३ का जो सामाजिक ढांचा था उसमे कपडे, गतिविधियां हमारा बोलचाल और व्यवहार ये सब आज के समय से लाख दर्जे अच्छा था यानि उस वक्त भी दूषित मानसिकता के लोग थे और ऐसा घृणित कृत्य तब भी घटित हो रहा था | समाज कि सबसे छोटी इकाई परिवार ही है और जब तक परिवार से ही महिलाओं के प्रति आदर करना नहीं सिखाया जायेगा तब तक ऐसी घटनाये घटती रहेगी | आप का बहुत बहुत शुक्रिया

santosh kumar के द्वारा
June 29, 2012

आदरणीय दिव्या बहन ,..सादर नमस्कार समाज की काली बदनुमा सच्चाई को आपने बहुत पीड़ा भरे शब्द दिए हैं ,..सच कहा आपने यह समाज ही बदकिस्मत है ,..फिर भी यही कहूँगा कि गन्दी करतूतों का हिम्मत से जबाब देना ही चाहिए ,..एकदिन पत्नी किसी को थप्पड़ मारते मारते रुक गयी थी ,..कारण बताया कि गधे को लात मारने से क्या फायदा लेकिन बर्दाश्त की हद होती है जो संयोग से टूटी नहीं थी ,..जाहिल समाज में इस दंश को ख़त्म करने का एक ही तरीका है ,..मजबूत प्रतिरोध !!…सादर

    div81 के द्वारा
    July 4, 2012

    आदरणीय संतोष भाईसाहब, सादर प्रणाम बिलकुल सही कहा आपने कि इन गन्दी करतूतों का हिम्मत से जवाब देना चाहिए प्रतिरोध तो हर लड़की करती है और नतीजा सब के सामने आ जाता है अगले दिन……………… यहाँ सिर्फ सबकी सोच बदलने कि जरूरत है जिसमे हर घर मे महिलाओ को सम्मान और आदर दिया जायेगा और आदर देना सिखाया जायेगा तो कोई भी लड़की असुरक्षित नहीं रहेगी समाज मे ………………… आप का तहे दिल से शुक्रिया


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