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सभ्य समाज का घिनौना चेहरा

Posted On: 15 Jul, 2012 Others में

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किस समाज में हम रह रहे है ???? क्या हम इस समाज को विकसित और सभ्य कह सकते है ??? ये तो रोज ही घटित हो रहा है समाज में | कहाँ रोक पा रही है लड़कियां ऐसी हैवानी सोच को और कहाँ रोक पा रहे है हम इन घटनाओं को | रोज ही समाचर पत्र में, टेलीविजन में हम ये खबर देख सुन रहे है कि भीड़ ने लड़की का सामूहिक दुराचार किया, लड़की का बलात्कार कर गला घोंट के मार दिया गया, अश्लील क्लिपिंग बना के दुराचार किया गया ब्लैकमेल किया गया | ताज़ा घटना गुवाहाटी में ११ वी में पढ़ने वाली लड़की के साथ छेड़छाड़ की घटना जिसमे उसके कपड़े फाड़े गए और उसे बालो से खिंचा गया और भीड़ में जिसका जो मन किया उस लड़की के साथ उसने वो किया | ये भयावह है कुछ मनचले छेड़छाड़ कर रहे है, धीरे धीरे भीड़ बढ़ रही है और हर कोई उस घृणित कृत्य में शामिल होता जा रहा है | कुछ लोग है जो जागरूक है तो वो रोक नहीं रहे है, उसका विरोध नहीं कर रहे है वो रिकोडिंग कर रहे है | क्या ये घटना रोकी नहीं जा सकती थी ???क्या इस हादसे का इतना विकराल रूप लेने से पहले ही इसका खात्मा नहीं हो सकता था | संगठन की शक्ति में तो बहुत दम होता है | तो क्या अब ये मान लिया जाए कि समाज की मानसिकता पूरी तरह से घृणित और विकृत हो गयी है | क्यूँ की वो भीड़ का हर चेहरा ही तो अपने समाज का प्रतिनिधि कर रहा था | एक एक कर के लोग आ रहे थे और उस में शामिल होते जा रहे थे | किसी ने भी विरोध नहीं किया कोई भी बचाने वाला हाथ आगे नहीं आया किसी की नजर शर्म से नहीं झुकी वो सिर्फ एक लड़की के शारीर को बेहयाई से देखती रही मनचाहे तरीके से खेलती रही |
अभी पिछले हफ्ते ही अपनी कविता दंश पोस्ट करी थी | जिसको पढ़ के अधिकतर माननीय ब्लोगर्स का मशवरा था लड़किया इक्कीसवी सदी की है कब तक डर कर और चुप रहोगी | खामोश बैठ जाना ऐसी घृणित मानसिकता के लोगो को बढ़ावा देना होगा |
ये भी कहा गया कि चूँकि हम विरोध नहीं करते है तो इनका हौसला बढ़ता है |
कैसे किया जाय इन घृणित मानसिकता के लोगो का विरोध, हम वो मजबूत प्रतिरोध कहाँ से लाये \ दोषी ठहरा दिया जाता है इस समाज में लड़कियों को गुवाहाटी में जो सभ्य समाज को शर्मसार कर देने वाली घटना घटी | उसमे भी दोष लड़की का निकला दिया जायेगा | क्यों वो लड़की अकेले निकली, लड़की के कपड़ो को दोष दे दिया जायेगा कि क्यों उसने ऐसे कपड़े पहने थे| उस लड़की के साथ क्यूँ कोई मर्द नाम का जीव नहीं था जो उसको प्रोटेक्ट करता या उस मर्द के साथ होने से ठप्पा लग जाता की इस लड़की का खेवनहार साथ है | अभी लड़की मजबूर और कमजोर नहीं है उसके साथ एक मर्द जो है | वो उसे मजबूत सुरक्षा देगा |
सभ्य समाज में छूट लड़कियों को नहीं मिलनी चाहिए कतई भी नहीं |
समाज के ठेकेदारों ने जब निर्धारित कर ही दिया है कि लड़कियों की सुरक्षा सिर्फ मर्दों के ही हाथों में है तो क्यों वो लड़की मातृसत्तात्मक समाज से होते हुए भी असहाय हो जाती है, मर्दों के सामने गुहार लगाती है छोड़ देने की, याद दिलाती है घर में माँ बहनों की, जिस समाज में सत्ता औरतो की है उस समाज में जब इतना घिनौना कृत्य होता है तो हमारे मर्दों के समाज (पितृसत्तात्मक) का हम समझ ही सकते है क्या हाल होगा |
वहाँ भीड़ में कोई किसी को नहीं पहचानता था | एक कि देखा देखी सभी पर हैवानियत सवार हो रही थी उस भीड़ में |
ये है असली चेहरा समाज का जहाँ सब लोग बड़ी -बड़ी बाते तो करते है मगर मौका मिलने पर हाथ साफ़ करने से परेहज नहीं है |
देखा है ऐसी भीड़ को मैंने जब लड़की हौसला करके ऐसे छिछोरे मनचलों को जवाब दे रही होती है तो भीड़ सिर्फ चटपटी मसालेदार घटना को देखने के लिए जमा हुई होती है और घिनौनी हंसी हँस रहे होते है उस भीड़ के लोग, क्यों कोई नहीं आता लड़की का साथ देने के लिए ये ही भीड़ को कहते हुए सुना है सती सावित्रि के कपड़े देखो | तो क्या आप को ये परमिशन मिल गयी है आओ बतमीजी करो अपनी नियत को क्यूँ नहीं साफ़ रखते | नंगापन ऐसे वाहियात लोगो की नजर में होता है |
ये वो ही वाहियात लोग है जो एक गरीब माँ को खुले में अपने बच्चे को स्तनपान कराते हुए देखते है तो अपने मतलब की चीज देख कर अपनी ओछी मानसिकता को तुष्ट करते हुए देखा है मैंने |
मैंने सलवार सूट पहने लड़की के साथ भी भद्दे इशारे करते लोगो को देखा है और छोटी तरुणी के अंगों को गंदी नजरो से देखते हुए भी देखा है |
आप साड़ी में हो या सूट में हो या पूरी तरह से पर्दे से ढकी हो गंदी मानसिकता के लोग आप को बिना छुए ही चीर- हरण कर सकते है | यहाँ पर जब तक पांडव अपनी पत्नी को दाव में लगाते रहेंगे तब तक ऐसे दु:शासन ज़िन्दा रहेंगे | यहाँ जब तक पिता धृतराष्ट्र की तरह रहेंगे तब तक दु:शासन चीरहरण करते रहेंगे यहाँ जब तक माताएँ गांधारी बनी रहेगी तब तक दु:शासन जैसे पुत्र से समाज की हर एक लड़की इनकी गंदी नियत से बची नहीं रहेगी |
दोष तो पूरे समाज का ही है जो धृतराष्ट बना हुआ है |
हम नारियाँ गांधारी बनी हुई है |
उस लड़की का दोष इस तरह भी निकाला जा सकता है कि वो रात को पब से निकली थी | शरीफ घरों की लड़कियां यूँ अकेले घर से नहीं निकलती वो भी रात को इस तरह तो सिर्फ शरीफ घरों के लड़के निकलते है | अकेले और रात में भी सिर्फ शरीफ घरों के लड़कों को निकलने की छूट है |
वो लड़की रात को निकली थी पब से तो क्या दिन के उजास में लड़कियों को बक्स दिया जाता है ?????????????????? लड़कियां सुरक्षित कहाँ है यहाँ पर | कहीं सगा सम्बन्धी ही बुरी नियत रखता है लड़की पर और मौका मिलने में जाहिर भी कर देता है अपनी कामलोलुप नज़रों से, शरीर को सहलाते गंदे और लिजलिजा स्पर्श से जतला देते है कि लड़की होना दोष है तुम्हारा | बसों में सफ़र करते समय पुरुषों द्वारा छेड़खानी, अश्लील फ़ब्तियाँ और शीलहनन की कोशिशें महिलाओं के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है।
स्कूल, कॉलेज, रास्तों में ऑफिस में, सिनेमाहाल में ट्रेन, बस टेम्पो ओटो कहीं भी तो सुरक्षा की गारंटी नहीं देता ये समाज लड़कियों को |

और फिर दोष भी मढ़ दिया जाता है लड़कियों पर कि लड़कियां पहन क्या रही है, लड़कियों कि गतिविधियाँ क्या है, लड़कियों कि बोलचाल और व्यवहार क्या है?
मैंने अपने ही समाज में देखा है कि छ साल की बच्ची से लेकर ८० साल कि वृद्धा तक यहाँ सुरक्षित नहीं है |
जागरण में परिवार के साथ गयी एक ६ साल की लड़की को एक टेंट लगाने वाला दुराचार का शिकार बना देता है, ६० साल कि वृद्धा अकेले घर जा रही थी रास्ते में कुछ शराबियों ने अपनी गंदी नियत का शिकार बना दिया, पिकनिक में परिवार के साथ आई नाबालिक लड़की जो खेलते खेलते परिवार की आँखों से ओझल हो गयी तो एक अनजान व्यक्ति ने उसका दुराचार करके मार दिया घर के आंगन में खेल रही बच्ची को पड़ोसी युवक ने दुराचार का शिकार बनाया | इन घटनाओं कि फ़ेहरिस्त लंबी है ये घटना यहाँ घटित हुई और सब जगह घटित हो रही है तो क्या जो लोग ये सोचते है की लड़कियों के पहनावे के कारण लड़कियों के साथ छेड़छाड़ बतमीजी बलात्कार होता है तो ये छोटी बच्चियां जिनको देख कर मन में सिर्फ वात्सल्य ही उमड़ता है उन बच्चियों का क्या दोष या वो ६० साल कि वृद्धा जो माँ दादी की उम्र की है उनके कपड़ो में क्या दोष था |
माँ बहन की गलियां तो सभी देते है तो इज़्ज़त कौन करेगा नारियों की लड़की रूप में ही जन्म लेना मुश्किल हो गया है अगर लड़कियां जन्म ले भी लेती है तो उसका दिनों दिन बढ़ना चिंता का विषय हो जाता है जब तक लड़कियों को भोग्या समझा जायेगा तब तक दयनीय स्थिति रहेगी हमारे समाज में लड़कियों की, जहाँ नारियों को पूजा जाता है वहाँ देवता निवास करते है तो मान लेना चाहिए कि अब हमारे समाज में दानव राज है |
पहले अपनी घृणित सोच को बदलना होगा
धृतराष्ट और गांधारी बनाना छोड़ना होगा की हमारा पिता पति बेटा ऐसा नहीं कर सकता, सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों औरतों का सम्मान करना आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है |

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए



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106 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Vidyadhar S Patil के द्वारा
December 30, 2012

We must be the change we want to see in the world ! Thanks & Regards

sabiya maniyar के द्वारा
December 19, 2012

HI, ap ne sahi kaha hai aj ke jamane me to ladkiyo ka jina hi mushkil hai, par kyo hai ye sab kuch hame ma ki kok se hi ladayi shuru karna hoti hai pehle to jeevan me ane ke liye fir papa ki ladli ban ne ke kiye fir samaz me sar utha kar jeene ke liye fir pati ke julmo ko seh ne ke liye fir bhi hama ri jeet nhi hoti hai itni ladayi ladne ke bad bhi hum hari hue hai kyo hai hamare sath esa kab khatam hoga ye sab………………………………….

Santosh Kumar के द्वारा
July 25, 2012

आदरणीय दिव्या बहन ,..सादर नमस्ते ज्वालंत पोस्ट और आपकी भावनाओं को सलाम है ,..हमारा सबकुछ बाजारू हो चला है ,..सोच भी !…मशाल जलाती रचना के लिए सादर अभिनन्दन

kavitarawat के द्वारा
July 25, 2012

सच कहा आपने रोज ही ऐसे दुराचार की खबर पढ़कर खून खौल उठता है मन में आता है ऐसे दुराचारियों को बीच चौराहे पर लाकर उल्टा लटकाकर गोली से उड़ा देना चाहिए ..यही इनके रोग का इलाज होगा … बहुत बढ़िया जागरूक करती प्रस्तुति ..आभार

Dr. Anwer Jamal Khan के द्वारा
July 24, 2012

पहले सोच को बदलना होगा.

chaatak के द्वारा
July 24, 2012

दिव्या जी, जो भी हो रहा है गलत हो रहा है कारण सिर्फ एक है समाज और परिवार कमजोर पड़ रहा है जगमगाते शहरों की जगमगाती गलियों में जो कालिख पुत रही है वो गावों और कस्बों की रातो को भी मुंह चिढ़ा रही है| बेशर्म हो चुकी पत्रकारिता अब सिर्फ आबरू लुटने का वीडियों बना कर अपनी टी. आर. पी. बढ़ने तक सीमित है| लियोने इनकी कलाकार(?) और महेश और पूजा इनकी नज़र में आदर्श (?) हैं और अपने कैमरे की तीसरी आँख से इन्हें हर लड़की को इसी रूप में दिखाना है|

Meenakshi Srivastava के द्वारा
July 24, 2012

दिव्या सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक ब्लागर बनाने की बहुत-२ बधाई. काश कि वो समय शीघ्र आ जाये ” जो इस सभ्य समाज के घिनौने रूप को बदल जाये “. आपने मशाल जला दी है …अवश्य ..प्रभाव दिखाई देगा . मीनाक्षी श्रीवास्तव

Puneet Vyas के द्वारा
July 24, 2012

Hello Divya, If bad people are in excess in this world,but good people are also not in shortage. I don’t agree with all the points you have made. all fishes are not bad.

Ramesh Nigam के द्वारा
July 23, 2012

@ Priya Divya, This is in continuation of my comment dated the 19th and your reply of the 20th. Absolute or Ideal conditions are never feasible. In Hindu period, the women had full liberty and dignity, which helped them scale heights like men in various fields. Change is the law of nature. The Hindu system, culture and the society developed aberrations. We could not face the invaders, who looted every thing and sexually exploited Hindu ladies, whom they treated as a bounty and nothing else. By hook and crook all the invaders destroyed virtues of our society and today we are bereft of our Language, Philosophy, Culture, Ethics and mission of life . Nowhere at home or school or in society, we are told to follow moral & ethical values/standards. The only mission of life is to earn money by any means, eat, drink and be merry. The cultural pollution is multiplying unbridled. Unfortunately, no agency is conscious on this front and the society is going to hell. THANKS TO PRESENT SYSTEM

Dr. Aditi Kailash के द्वारा
July 22, 2012

दिव्या जी, गुवाहाटी की घटना सभ्य कहे जाने वाले समाज के मुँह पर करारा चाँटा है….क्या हमारा समाज इतना नीचे गिर गया है कि उसकी नजर में महिलाओं के लिये कोई इज्जत नही रही…..भीड का हिस्सा गलत काम रोकने के लिये बनना चाहिये ना कि गलत काम में साथ देने के लिये……इस घटना के लिये जिम्मेदार कौन है, निश्चित ही ये समाज जो आने वाली पीढीओं को सही रास्ता नही दिखा पा रही है…..हम सभी भी इस समाज का एक हिस्सा है, बद्लाव जरुरी है और बद्लाव की शुरुआत हमें अपने आप से, अपने घर से और अपने आस-पास से करनी होगी…….. दिव्या जी, समय की कमी के कारण पहले हम आपका ये लेख नही पढ पाये थे, बहुत ही अच्छा लिखा आपने, आपको ढेर सारी बधाइयाँ……

ashokkumardubey के द्वारा
July 22, 2012

बहुत खूब दिव्या, “आग जलनी चाहिए” आपके लेख से ऐसी ही आग शोला बनकर उबल रही है ,आपने आज औरतों ,लड़कियों ,मासूम बच्चियों पर जो जुल्म हो रहा है उसका सही चित्रण किया है और सही मायनो में आज के माँ गांधारी और बाप धिर्त्राष्ट्र ही बने दिखाई एते हैं क्यूंकि जैसी घटनाएँ रोज घटित हो रही है उससे यही समझ में आता है आखिर क्या बात है, उन हैवान युवाओं एवं लाचार युवतियों दोनों को जन्म देने वाली माँ ही है जो एक नारी ही होती है आखिर ये दुष्ट लोग क्यूँ कर पैदा हो रहे हैं? उस माँ की कोख से , जहाँ तक मैं समझ सकता हूँ यह सारा दोष हमारे देश की सिक्छा में आया गिरावट का है स्कूलों में भी अब चरित्र निर्माण पर कोई ध्यान नहीं हम इंजिनीअर , मनेजर वैज्ञानिक तो बना रहे हैं पर एक अच्छा इन्सान कोई बने इसकी पढाई जीरो है फिर तो ऐसी मानसिकता के लोग की हिन् बहुतायत होगी और बुरी ख़बरों को मिडिया भी खूब तेजी से और ज्यादा करके दिखाता है जिससे लोगों में नफरत का माहौल ही बनता है आज के समाज में मुझे नहीं लगता औरते इतनी मजबूर हैं उनको भी सामान अधिकार देने की बात हमारी सर्कार भी कर रही है और आज हर छेत्र में लडकिया अव्वल आ भी रही हैं पर अफ़सोस महिलाएं ही महिलाओं की मदद नहीं कर रही है समाज के इस पहलु पर भी विचार करने की जरुरत है वर्ना यहाँ तो नवरात्रे में कंजका खिलाने को लोग कन्याओं को ढूंढते फिरते हैं उनकी पूजा करते हैं फिर उसे प्रेम से भोजन कराते हैं समाज का यह दृश्य और फिर गोहाटी जैसी घटना ये दोनों तो समाज के लोग ही तो कर रहे हैं क्या कहियेगा इस समाज को अतः लड़कियों को अपनी सुरक्छा कैसे की जाये इसके लिए और मजबूत बन्ने की जरुरत है जुडो कराटे सिखने की जरुरत है और इतना बलवान और साहसी बन्ने की जरुरत है की एक लड़की दस लड़के पर भारी पड़े वर्ना दरिन्दे तो यूँ ही दरिंदगी करते रहेंगे क्यूंकि उनको अपना कानून कोई सजा भी तो नहीं दिलवा पता पुलिस उन अपराधियों को पकडती भी है तो वे जमानत पर छूट जाते हैं जब तक ऐसे गुनाहगारों को सख्त से सख्त सजा नहीं मिलती ऐसे अपराध रोज दुहराए जायेंगे क्यूंकि दरिंदो की नजर में कोई माँ नहीं कोई बहन नहीं होती .

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
July 22, 2012

समाज कहाँ और पतन की किस गर्त में चला जा रहा है ! यह सिलसिला कबतक चलेगा ? क्या कहीं इसका अंत है ? या फिर यह अंतहीन है ? इसका जवाब किसके पास है और कौन उत्तरदायी है ? यह सुनिश्चित करना पडेगा | जिनको उत्तर देना है वे कहीं अन्यत्र व्यस्त हैं , इस बात की उन्हें कोई चिंता नहीं ! ऐसे में मुझे दुष्यंत कुमार की निम्न पंक्तियाँ याद आती हैं .. कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं | गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं || अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ! ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं!! दिव्या जी, मैं आप को धन्यवाद देता हूँ कि आप ने ऐसी गंभीर और ज्वलंत समस्या को अपनी धारदार लेखिनी के माध्यम से पाठकों के सामने रखा है | पुनश्च ……बेस्ट ब्लौगर बनने पर अतिरिक्त बधाई !!

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 22, 2012

आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार …. सादर अभिवादन ! दिव्या बहिन ने इस मंच पर “दंश” नामक शीर्षक के तहत अपनी एक रचना 29 june -2012 को पोस्ट की थी ….. अभी कल के अखबार में ही पढ़ा था की सरकार ने लड़कियों पर तेजाब फेंकने वालों के लिए सजा को बढ़ा कर दस लाख का जुर्माना तथा दस साल की सजा तक कर दिया है …. अक्सर ही हम अखबारों में देखा करते है की समाचारपत्र द्वारा “IMPECT” शीर्षक के तहत अपनी पुराणी खबर और प्रशासन द्वारा उस पर कार्यवाही को बतलाया और दिखलाया जाता है चित्रों के माध्यम से …. आपसे प्रार्थना है की अगर किसी ब्लागर के लेख के बाद सयोंगवश ही अगर कुछ इस तरह से होता है तो उसका उत्साहवर्धन भी आपको करना चाहिए ….. जागरण पर मैं इसके शुरूआती दिनों से हूँ …. इस विषय पर शायद ही कोई दूसरी कविता इस मंच पर पहले इस तरह से लिखी गई होगी ….. आपका इस दिशा में उठाया गया कोई भी कदम इस गरिमामय मंच की गरिमा + स्तर तथा इसकी विश्वसनीयता को आसमान की बुलंदियो तक पहुंचा देगा , जिसकी की हम सभी कामना भी करते है ….. एक सकारात्मक और सार्थक पहल की आशा में अग्रिम आभार सहित

anju के द्वारा
July 21, 2012

भले ही हम भोतिक स्तर unati kar rahe ho yadi mansikta pangu ho chuki hai to nikrisht hi socheng or karenge iske liy hume pariwar or samaj me hi jagrukta lani hogi kewal bhog pravriti ko hi shreshtha ke singhasan per na virajman kare balki naitik mulyo ko prathmikta de tabhi Bhartiyata or bhartiy mulya surakhshit rahenge or phalenge.

ajaykr के द्वारा
July 21, 2012

आदरनीय दिव्या जी,सादर प्रणाम | गुवाहाटी की घटना सभ्य समाज के मुख पर कालिख हैं |ऐसी ना जाने कितनी घटनाये हमारे देश में रोजाना होती हैं ,उन्हें राष्ट्रीय शर्म तक घोषित किया जाता हैं पर उनके रोकने का कोई उपाय नही सुझाया जाता |भांड मीडिया ,अश्लील फूहड़ फिल्मे ,गंदे डायलाग ,युवा पीढ़ी की मानसिकता को पंगु बना रहें हैं ,यहाँ कोई सरकारी रोक टोक नही हैं टी वी पर आती अडल्ट फिल्मे ,केबिन दार कैफे ,बिना नियम कानून के चलते हैं …….मेरा उद्देश्य किसी पर कीचड उछालना नही हैं …………………. रिमोट सदैव अपने हाथ में हैं ……जिंदगी में हर चीज का चुनाव करतें हैं हम लोग …… चाहे तो बुद्धू बक्सा देखें या ना देखे अपना चुनाव हैं | चोरी हत्या बलात्कार से भरे सुबह के अखबार पढ़ना ना पढ़ना अपने हाथ में हैं ,विशेष करके सुबह ,जब हमारा दिन को प्रोग्राम करने का वक्त होता हैं ……. मानव मस्तिष्क की प्रोग्रम्मिंग हम करना ही भूल गए हैं ,टीवी से लोग ट्यूसन लेते हैं ,अश्लीलता को फैशन कहते हैं ,,,,,,हमारा मस्तिष्क दूसरों के इशारे पर चलता हैं | जरूरत हैं खुद को और apne बच्चों को बचपन सही शिक्षा देने की,उन्हें बनाने की जरूरत होती हैं ,बच्चे पैदा नही होते उन्हें बनाना होता हैं [मैं खुद डॉ हूँ ,इसी आधार पर कह रहा हूँ] इस समाज में किसी लड़की से बलात्कार होता हैं तो उसे समाज में जीने नही दिया जाता ,पीडिता /पीडिता कह के सब अपना उसका मानसिक बलात्कार करते हैं |सबसे बड़ी सामाजिक गलत मानसिकता हैं ये ……………यौन अंगों की शुचिता सिर्फ महिलाओ तक ही क्यूँ जब की इसमें कोई अपूरणीय क्षति नही होती ,महिलाओं ने अपनी पसंद से हमेशा यौन सम्बन्ध बनाये हैं …..और कभी कभी अपनी मर्जी के खिलाफ पति के लिए भी…….

rita singh 'sarjana' के द्वारा
July 20, 2012

most viewed blogar बन्ने के लिए बधाई ,

munish के द्वारा
July 20, 2012

दिव्याजी, हम उसी समाज में जी रहे हैं जिसका निर्माण हमने किया …….. ! आखिर कब हमने समाज में आ रही गिरावट के लिए एकजूट हो कदम उठाये ……. कब हमने आधुनिक शिक्षा के साथ साथ नैतिक शिक्षा पर बल दिया, कब हमने पडोसी पर आये संकट को अपना समझा…….! सब अपने स्वार्थ के वशीभूत काम को महत्त्व देते रहे ………. स्त्रियों ने कभी भी वास्तविकता के आधार पर कभी एकजुट हो आवाज उठाई, जितने भी नारी संगठन हैं क्या केवल वो दिखावा मात्र नहीं हैं क्या वास्तव में उन्हें नारियों का समर्थन मिला …….. ! नारियों ने केवल उस संकट को संकट समझा जो उस पर स्वयं पर आया, दूसरी औरत पर आये संकट के लिए कभी किसी ने आवाज उठाई और यदि उठाई भी तो क्या उसको समर्थन मिला ………. हमारे समाज में दामिनी जैसी केवल फिल्में ही बनतीं हैं परन्तु एक भी दामिनी नहीं मिलती क्यों ……….? वास्तव में, इसमें दोष स्त्री या पुरुष होने का नहीं है दोष है हमारे चारित्रिक और नैतिक पतन का हमारे निजी स्वार्थों ……….. आप स्वयम आकलन कीजिये की आप और हम समाज के लिए क्या प्रतिदिन एक घंटा भी देते हैं यदि नहीं तो क्या केवल सभ्य होने या न होने का केवल आरोप लगाने के लिए हम नींद से जागे हैं………! आपका तो मुझे पता नहीं लेकिन इन सब घटनाओं का आकलन १९९३ में जब ग्लोबलाइजेशन की शुरुआत हुई थी तो देश के कुछ सामाजिक संगठनों ने की थी और उस समय आन्दोलन भी चलाया था इसके दुष्परिणामों को लेकर पर समाज तब उन्हें पिछड़ी सोच वाला …….. दकियानूसी कहता रहा और किसी ने भी उसी समय आने वाले संस्कृति के पतन पर ध्यान नहीं दिया ………… ! अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है बस हम सबको अपने बंद कमरों से बाहर निकल एकजुट होकर समाज कल्याण के लिए आवाज उठानी होगी……… अन्यथा आप भी लिखती रहिये मैं भी लिखता रहूँगा और ये वहशियाना घटनाएं भी घटती रहेंगी……..

vartika के द्वारा
July 20, 2012

प्रिय दिव्या ! आपके लेख में लडकियों की पीड़ा साफ़ जाहिर होती !! मैं आपके हर अक्षर से पूर्णत सहमत हूँ !! लड़कियों के साथ प्रतिदिन घटित होती हुई घटनाओ से तो ये साफ जाहिर है !! मैं इसका जिम्म्मेदार पुरुषवादी मानसिकता के साथ साथ लोगो की घटिया वा अश्लील सामग्री की ओर रूचि को मानती हूँ ! अच्छा वा ज्ञान देने वाले साहित्य को पढ़कर ही लोगो की सोच में परिवर्तन किया जा सकता हैं!!!

Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
July 20, 2012

दिव्या जी, आपने बड़ी दृढ़ता से सच्चाई को लिखा है.हमारे समाज में आदमी के रूप में भेड़िये घुस गए है, जिनका विनाश होना जरूरी है.दुख तो तब होता होता है जब ऐसी कुत्सित मानसिकता के लोग ऐसी घटनाओं के बाद भी आराम से बाहर घूमते रहते हैं.जब दोषी और उनका दोष साफ दिखाई दे रहा हो तो न्याय में देरी क्यों? ऐसे लोगों को सार्वजानिक रूप से कठोर से कठोर दंड दिया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में गंदी मानसिकता के लोग अपने नापाक कर्मो से पहले सौ बार सोचें.

minujha के द्वारा
July 20, 2012

दिव्या जी पहले बहुत सारी बधाईयां  सम्मान प्राप्त होने की खुशी में आलेख में जिस सच को आपने प्रस्तुत किया है ,वो हमारे  अस्तित्व ,हमारी सोच पर कई शोचनीय प्रश्न खङा करता है क्या वास्तव में हम कभी इंसान बन पाएंगे,आपकी व्यथा  आपका आक्रोश जायज है,बहुत सारी शुभकामनाएं

div81 के द्वारा
July 20, 2012

आपका शुक्रिया !!

dineshaastik के द्वारा
July 20, 2012

ब्लागर ऑफ दा वीक बनने का हार्दिक शुभकामनायें…..

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 19, 2012

दिव्या बहिन ….. सादर अभिवादन ! मैं भी आदरणीय विनीता जी की नीचे कही बातों से अपनी सहमति रखता हूँ ….. लेकिन साथ में यह भी जोड़ना चाहूँगा की इसमें आपकी व्यथित आत्मा की पीड़ा मानसिक उथल पुथल साफ़ दिखाई दे रही थी ….. मैंने भी अनेको ऐसे लेख लिखे है जिनको लिखते समय दिमाग में दर्द तक सहा है यह भी कैसा अजीब इत्तेफाक है की ऐसी मानसिक अवस्था में लिखे गए सारे ही लेख फीचर्ड भी हुए जिनको की सिर्फ वन सीटिंग में लिखा ….. यह लेख वाकई में इस सन्मान का हकदार है मेरी तरफ से भी ढेरों मुबारकबाद मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी+ जय हो मुनिश्री तरुण सागर जी

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    आदरनीय राजकमल भाई, सादर प्रणाम !! आप की पारखी नजर की पहले भी दाद दी है और आज फिर से दूंगी आप दिल के भावो को बखूबी पहचान जाते हो | आप का आशीर्वाद यूँ ही बना रहे …….. आप का ह्रदय से आभार

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
July 19, 2012

दिव्या जी सार्थक आलेख एक एक घटनाओ को दिखाती हुयी मानसिक रोगियों के करतूतों को उजागर करती हुयी जैसा की आप ने सब कुछ करते हुए देखा जरुर विरोध तो किया ही होगा अगर आप ने किया होगा तो इसी तरह से लोग भी यदा कदा विरोध तो करते रहते हैं लेकिन जमावड़ा देख चुपके से लोग निकल जाना भी पसंद करते है क्योंकि एकता नहीं बन पाती एक मार खाए बाकी तमाशा देखें सब तो मीडिया वाले भी नहीं की जो भी मरे जिए केवल फोटो उतारो और चैनेल की रेटिंग बढाओ बचाओ नहीं बहुत सी बाते हैं जहाँ हम सब की आप की सब की कमी है हाथ जोड़ कर चलना होगा ….. एक बात और जो आप ने लिखा की लोग लड़की की ये कमी वो कमी निकाल देंगे जरुर कमी निकलती है अपना समाज अभी यूरोप नहीं बना बहुत समय लगेगा उस तरह की मानसिकता लाने में न माने तो लोग बाद में पछताते हैं मानसिकता बदलती है कानून का राज होता है कड़ी सजा होती है तब जा के कुछ स्थिति नियंत्रण में आती है ..इस लिहाज से रात में नाईट क्लब अकेले प्रश्न तो उठता ही है …. मै बुराई का कतई समर्थक नहीं और वे जानवर से भी बदतर हैं जिन्होंने ये घृणित कार्य किया उन्हें आजीवन कारावास या फांसी जो भी हो कम है ….. बधाई आप को बेस्ट ब्लागर ऑफ द वीक चुने जाने पर… भ्रमर ५

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    आदरणीय भ्रमर जी, सादर प्रणाम !! बिलकुल किया है ऐसे लोगो का विरोध और साथ भी दिया है | विरोध करना बहुत जरुरी है सिर्फ एक का नहीं सभी लोगो को मिल कर विरोध करने की जरूरत है | मैं इस बात का समर्थन नहीं कर रही हूँ की बार से निकली वो लड़की सही थी मगर इस बात का हक किसने दिया है की उसके साथ बतमीजी करी जाए छेड़छाड़ करी जाए | और दूसरी बात, रात में बार से निकलना उसकी गलती थी तो यहाँ दिन के उजाले में साडी, सूट पहने लड़कियों के साथ बच्चियों और बूढी महिलाओ के साथ बतामिजियाँ और छेड़छाड़ होती है उसके लिए कसूर वार किसे ठहराया जायेगा | | इस घटना के पीछे हमारे पूरे समाज की गलती है जो घटिया पब्लिसिटी चाहती है, सस्ती लोकप्रियता चाहती है और विकास के नाम पर पश्चिम का अन्धानुकरण हो रहा है वो भी गलत है इसी लिए कहा की परिवार से ही अपने आदर्शो और मूल्यों को सिखने की आवश्यकता है | आप का तहे दिल से शुक्रिया

vinitashukla के द्वारा
July 19, 2012

यहाँ मैं बधाई नहीं कहूंगी क्योंकि इस आलेख को आपने बधाई पाने के लिए नहीं लिखा पर इतना अवश्य कहूंगी कि जे. जे. ने बेस्ट ब्लॉगर सम्मान के लिए सही पोस्ट का चयन किया. ऐसे ही लिखती रहें. शुभकामनायें.

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    विनीता जी, बिलकुल, मेरे भावो को समझने के लिए और आप की शुभकामनाओ के लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया

SAVI के द्वारा
July 19, 2012

दिव्या बहन, बेस्ट ब्लागर ऑफ द वीक बनने पर बहुत-बहुत बधाई……

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    दीदी आप का शुक्रिया

avermaaa के द्वारा
July 19, 2012

बेस्ट ब्लागर ऑफ द वीक चुने जाने पर बहुत-बहुत बधाई…… आपकी अमूल्य टिप्पणी आमंत्रित है ….. http://avermaaa.jagranjunction.com/2012/07/19/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80/

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    आप का शुक्रिया

jlsingh के द्वारा
July 19, 2012

दिव्या बहन जी, नमस्कार! ऐसी घिनोनी घटनाओं से सारा देश शर्मसार है, कही न कही हमारे ही संस्कारों में कमी रह जाती है जो ऐसी विकृत मानसिकता वाले लोग इतनी घटिया हरकत करते है ,ऐसे लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए | इस आलेख में आपका आक्रोश जबर्दस्त बनकर निकला था आपको इसका पुरस्कार मिलना ही चाहिए था…..’बेस्ट ब्लागर आफ द वीक’ बनने पर हार्दिक बधाई!

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    आदरनीय भाईसाहब, सादर प्रणाम जी बिलकुल विकास के नाम पर हम अपने संस्कार मूल्य भूलते जा रहे है और इसका नतीजा नैतिक पतन के रूप में सामने आ रहा है | आप का ह्रदय से आभार

tejwani girdhar के द्वारा
July 19, 2012

बहुत ही सटीक

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    आप का तहे दिल से शुक्रिया

rekhafbd के द्वारा
July 19, 2012

दिव्या जी ,ऐसी घिनोनी घटनाओं से सारा देश शर्मसार है कही न कही हमारे ही संस्कारों में कमी रह जाती है जो ऐसी विकृत मानसिकता वाले लोग इतनी घटिया हरकत करते है ,ऐसे लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए |बेस्ट ब्लागर आफ द वीक बनने पर हार्दिक बधाई

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    रेखा जी, बिलकुल हमारे संस्कारों और आदर्श मूल्यों की कमी ही है जो ऐसे विकृत मानसिकता वाले लोगो की संख्या दिनोंदिन बढती जा रही है | परिवार, समाज, प्रशासन हर संस्था को एक नयी शुरुवात करने की आवश्यकता है और साथ में कड़ी सजा का प्रावधान भी | आप का तहे दिल से शक्रिया

yogi sarswat के द्वारा
July 19, 2012

बहुत बहुत बधाई दिव्या जी

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    शुक्रिया आप का

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
July 19, 2012

अभी पिछले हफ्ते ही अपनी कविता दंश पोस्ट करी थी | जिसको पढ़ के अधिकतर माननीय ब्लोगर्स का मशवरा था लड़किया इक्कीसवी सदी की है कब तक डर कर और चुप रहोगी | खामोश बैठ जाना ऐसी घृणित मानसिकता के लोगो को बढ़ावा देना होगा | ये भी कहा गया कि चूँकि हम विरोध नहीं करते है तो इनका हौसला बढ़ता है | धृतराष्ट और गांधारी बनाना छोड़ना होगा की हमारा पिता पति बेटा ऐसा नहीं कर सकता, सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों औरतों का सम्मान करना आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है | स्नेही दिव्या जी,  सादर आपका लेख एवं नीचे प्रतिक्रियाएं पढ़ीं.  समाज के विकृत रूप का चित्रण वास्तविक है जिसे आपने खूबसूरत ढंग से प्रस्तुत किया है.  कारण कोई भी हों समाज में चारित्रिक पतन बहुत तेजी से हुआ है.  अपनी रक्षा स्वयं को ही करनी होगी. साथ ही लोगों को काफी सशक्त भूमिका निभानी होगी.  क्रष्ण का आना बहुत जरूरी है पर आज के समय के क्रष्ण आयेंगे जरूर पर क्या वे उस काल के क्रष्ण होंगे. शस्त्र शिक्षा. जूडो , कराटे एवं अन्य आधुनिक मूर्छा हथियार की आवश्यकता है. समाज में जाग्रति लानी होगी जब ऐसा अपराध घटित हो रहा हो तो लोग मूक दर्शक न रह कर संघर्ष करें. पुलिस पेट्रोलिंग जरूरी है.  रचना के साथ साथ आपको सम्मान मिला. मुझे अति प्रसन्नता है. बधाई. 

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    आदरनीय प्रदीप जी, सादर प्रणाम !! मंच में एक बार फिर से आप को देख के बहुत खुशी हुई और अच्छा लगा जान कर की अब आप की तबियत ठीक है | आप की बात से पूर्णत: सहमत हूँ कि अपनी रक्षा स्वयं को ही करनी होगी और लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए जूडो, कराटे इतियती में निपूर्ण होना होगा | आप का बहुत बहुत शुक्रिया …………………… आप के स्वास्थ्य की मंगल कामना के साथ

om shukla के द्वारा
July 19, 2012

आप की बात से मैं सहमत हूँ क्योकि यह देश आज भ्रस्टाचार का शिकार हो गया हैऔर लोग सुधरने की जगह बिगारते जा रहे है |

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    आदरनीय ॐ शुक्ल जी, आप का ह्रदय से आभार

Ramesh Nigam के द्वारा
July 19, 2012

It is a narration of facts in a sensational way, but of no avail. LEKHIKAA US SAMAAJ KEE UPAJ HAIN JO GUD TO KHAANAA CHAAHTAA HAI PAR GULGULE KO SAU SAU GAALIYAAN DETAA HAI. SAMAAJ KO DHIKKAARNE VAALEE AISEE RACHNAYEN KHOOB VAAH VAAHEE BATORTEE HAIN. CINEMA, TV PAR ADHNANGEE YUVTIYAAN COMPROMISING POSE, DWIARTHEE SAMVAAD KYAA KUCHH NAHEEN CHAUBEESO GHANTE PAROSAA JAATAA HAI. PATR PATRIKAAON MEN BHEE CHHAPTEE SAAMAGREE KITNEE UTTEJAK HOTEE HAI KAUN NAHEEN CHATKHAARE LE KAR DEKHTAA. AISE PAAKHANDEE SAMAAJ KEE IN VIBHOOTIYON KO KYAA KAHEN JO HUMAN BEING KEE BIOLOGY KAA JARAA BHEE GYAAN NA RAKHNE VAALON SE JO PAROSEE JAA RAHEE NAGNTAA KO TO HAJAM KAR JAATE HAIN PAR USKE EFFECT PAR HAAY TONA MACHAATE HAIN. i never support the sexual crime. I want to fight the root cause.

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    मैं यहाँ पर आप को आदरनीय निशा जी के ब्लॉग की चंद लाइन पेस्ट कर रही हूँ उम्मीद है आप उन पंक्तियों को गहराई से समझेंगे नारी पूर्ण सुरक्षित तो शायद कभी भी नहीं रही उसका अपमान तो हमेशा ही हुआ है,उसको उपभोग की वस्तु सदा ही माना गया है, उसकी शारीरिक संरचना सदा शत्रु बनी रही. इसके प्रमाण उपलब्ध हैं,हमारे पौराणिक ग्रंथों में जब धोखे से नारियों का अपहरण हुआ या शील हरण हुआ ,ऐतिहासिक वृतांतों में नारियों का अपहरण,राजाओं के रनिवासों में सुन्दर नारियों का संग्रह मानों अलमारियों में सुन्दर वस्त्र सजा कर रखे गये हों,सुन्दर नारियों को प्राप्त करने के लिए राज्यों को बर्बाद कर देना,आदि..ये प्रवृत्ति बढ़ती गयी मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन के बाद.जब मुस्लिम आक्रमणकारियों ऩे धन सम्पत्ति ,मंदिरों को तोडना और स्त्रियों को लूट कर अपने हरम की शोभा बनाया.आक्रमणकारियों ऩे तो चाहे वो मुस्लिम रहे हों,पुर्तगाली,या फिर ब्रिटिश सभी इन कुत्सित कार्यों में संलिप्त रह कर नारी को सदा अपमानित किया. urat ne janam diya mardo ko mardo ne use bazar दिया……………….. निशा जी की पोस्ट का लिंक दे रही हूँ पढ़िएगा गौर से ……………………… http://nishamittal.jagranjunction.com/2012/07/17/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A4/#comments

Harish Bhatt के द्वारा
July 19, 2012

दिव्या जी ….बेस्ट ब्लागर ऑफ द वीक बनने पर बहुत-बहुत बधाई……

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    आप का शुक्रीया

allrounder के द्वारा
July 19, 2012

हार्दिक बधाई दिव्या जी, आपको इस ज्वलंत मुद्दे को बेवाकी से रखने और श्रेष्ठ ब्लौगर चुने जाने पर !

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    आप का शुक्रीय

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
July 19, 2012

दिव्या जी ….बेस्ट ब्लागर ऑफ द वीक बनने पर बहुत-बहुत बधाई……

    div81 के द्वारा
    July 20, 2012

    शुक्रिया

vinitashukla के द्वारा
July 18, 2012

दिव्या जी, मेरा मानना है कि जो पुरुष इस तरह का काम करते हैं, वे पुरुष कहलाने लायक ही नहीं हैं. किसी स्त्री को बेइज्जत करते समय उन्हें, एक पल को भी वह मां याद नहीं आती; जिसने उसे अपनी देह का लहू पिलाकर पाला था. एक अबला बच्ची को वस्त्र- विहीन करते समय, यह एहसास तक नहीं होता कि ऐसा करते समय वे दरअसल, अपनी ही मां के- ममता से गीले हुए आंचल को उघाड़ रहे हैं…उसके दिए हुए संस्कारों को(यदि वाकई में उन्हें कोई संस्कार दिए गये हों तो!) सरेआम नीलाम कर रहे हैं. जिस बहन ने उन्हें राखी बांधी थी- उसका वही सम्मान, सरेबाजार कलंकित कर रहे हैं. एक बेहद जरूरी और सार्थक चर्चा के लिए धन्यवाद.

    div81 के द्वारा
    July 19, 2012

    आदरणीया विनीता जी, सादर प्रणाम बिलकुल इस तरह की विकृत मानसिकता के लोगो पुरुष कहलाने के लायक ही नहीं ये पुरे समाज के लिए कलंक है | विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए आप का ह्रदय से आभार

narayani के द्वारा
July 18, 2012

नमस्कार दिव्या जी अब समय की यह पुकार दबंग से ना डरो ,करो उनका प्रतिकार कब तक दंश देंगे ,हमे नारी होने का मर्द होने का दावा करते ये,???????????? सारा ये जहर अब देना होगा उतार आपका आक्रोश बिलकुल जायज है ,अब नारी को ही नारी का साथ देना होगा . बहुत बधाई आपको . धन्यवाद नारायणी

    div81 के द्वारा
    July 19, 2012

    नारायणी जी, नमस्कार !! बिलकुल सही कहा आप ने ……….अब समय की यह पुकार दबंग से ना डरो ,करो उनका प्रतिकार कब तक दंश देंगे ,हमे नारी होने का मर्द होने का दावा करते ये,???????????? सारा ये जहर अब देना होगा उतार………. आप का तहे दिल से आभार

yogi sarswat के द्वारा
July 18, 2012

धृतराष्ट और गांधारी बनाना छोड़ना होगा की हमारा पिता पति बेटा ऐसा नहीं कर सकता, सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों औरतों का सम्मान करना आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है ! bilkul sateek evam yathart lekh diya hai aapne , divya ji ! guwahati ki ghatna to matra ek udaharan hai jo media ke madhyam se logon tak pahuncha , sach to ye hain ki aaj har gali aur har jagah aisa ho raha hai ! bahut satya likha hai aapne

    div81 के द्वारा
    July 19, 2012

    आदरणीय योगी जी, सादर प्रणाम रोज ही इस तरह की अमर्यादित घटनाये घट रही है | कुछ घटनाये मिडिया के जरिये सामने आ जाती है मगर बहुत से ऐसे है जो लोग मर्यादा और डर से बोलते नहीं शिकायत नहीं करते ऐसी अनगिनत घटनाये है |अभी वक़्त है की कुछ सार्थक कदम उठाये जाए समाज द्वारा भी प्रशासन के द्वारा कड़े कानून बने जिनका कडाई से पालन हो और साथ ही महिलायों को भी मजबूत बनना होगा ऐसी घटनाये न घटे उसके लिए उनको भी ऐसे विकृत मानसिकता वाले लोगो को सबक सिखाना होगा | आप का ह्रदय से आभार

yamunapathak के द्वारा
July 18, 2012

दिव्याजी, आपका आक्रोश जायज़ है.

    div81 के द्वारा
    July 19, 2012

    आदरनीय यमुना जी, नमस्कार आप का शुक्रिया

Punita Jain के द्वारा
July 18, 2012

दिव्या जी, आपने बिल्कुल सही कहा —सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों औरतों का सम्मान करना आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है | —महिलाओं की सुरक्षा और उनके प्रति समाज के नजरिये और जिम्मेदारी पर सवाल उठाता गम्भीर और सार्थक लेख |

    div81 के द्वारा
    July 19, 2012

    पुनीत जैन जी, सादर प्रणाम लेख को समय देने के लिए और आप की प्रतिक्रिया के लिए आप का ह्रदय से आभार

avermaaa के द्वारा
July 18, 2012

मस्तिष्क में उपज रहे शब्द इस अतिसुधारवादी समाज की दलीलों से सामंजस्य बैठने में खुद को असमर्थ पा रहे है। हम सिर्फ दोषारोपण की विचारधारा को अपनाते हुए अपने आप को समाज की श्रेष्ठता सूची में सम्मिलित कर अपने कर्तव्य के निर्वाह की इतिश्री कर ले रहे है। कुछ बात है कि आँगन और देहली पर धूल है, आज चन्दन खामोश है हँसता बबूल है।

    div81 के द्वारा
    July 19, 2012

    आदरनीय अवेमा जी, सादर प्रणाम दोषारोपण वाली विचारधारा नहीं अपनाई है मैंने, अपने लेख के जरिये ये कहने की कोशिश करी है कि हम जिस संस्कार विहीन और असंवेदनशील समाज में रह रहे है उसमें परिवर्तन कि आवश्यकता है और ये परिवर्तन अपने परिवार अपने आप से करना जरुरी है नहीं तो विनाश दूर नहीं | अपना समय लेख को देने के लिए आप का आभार

Alka Gupta के द्वारा
July 17, 2012

दिव्या जी , कुत्सित मानसिकता और कुसंस्कारों के परिणामस्वरूप ही ऐसी घटनाएँ आये दिन सुनते और देखते रहते हैं…… स्वस्थ मानसिकता ,स्वस्थ सोच और अच्छे संस्कार नहीं मिलेंगे तब तक ऐसी घटनाएं समाज में होती ही रहेंगी और यहाँ परिवार के मुख्य सदस्यों की एक अहम् भूमिका है तभी समाज की यह बुराई दूर की जा सकती है… बहुत अच्छा लिखा है

    div81 के द्वारा
    July 18, 2012

    आदरणीया अलका जी, सादर प्रणाम बिलकुल जब तक स्वस्थ सोच और अच्छे संस्कार नहीं मिलेंगे तब तक परिवर्तन की उम्मीद करना बेमानी सा है | समाज की सब से छोटी इकाई जब मजबूत और अच्छे किरदारों को जन्म देगी तभी समाज से गंदगी हटनी शुरू होगी | आप का तहे दिल से शुक्रिया

Chandan rai के द्वारा
July 17, 2012

दिव्या जी , आपके विचारों को पढ़कर बहुत अच्छा लगा , आप ने अश्भ्य समाज की कलई खोल दी है , हमारे समाज की मर्दानगी बस सोशल साईट तक सिमित रह गई है , या स्त्री को दायरा बताने में !

    div81 के द्वारा
    July 18, 2012

    चन्दन जी, सादर नमस्कार आप के विचारों को जानकर बहुत खुशी हुई,  दुःख होता है ऐसी घटनाये देखने सुनने को मिलती है | सच कहा आपने आप का बहुत बहुत शुक्रिया

Mohinder Kumar के द्वारा
July 17, 2012

दिव्या जी, इस विष्य पर इतना पढ लिया और देख लिया कि अब लगता है हमारी मानसिकता किसी भी विषय को तिल से ताड बनाने की बन गई है… इतना तो किसी शहीद के बारे में भी नहीं लिखा जाता और न ही मिडिया में देखा जाता. है.. अधिक से अधिक एक दिन और बस. घटना तो घट चुकी है और देखना यह है कि अपराधियॊ को क्या सजा मिलती है और क्या क्या बातें ऐसी घटना को दौबारा होने से रोक सकते हैं. इसके लिये रात को किसी का भी देर तक वाहर रहना उचित नहीं… चाहे वो लडका हो या लडकी. पहनावे और आचरण का भी इसमे काफ़ी हद तक रोल है. हम न जाने क्यों एक घटना को अन्य घटनाओं के साथ मिला कर देखने लगते हैं. और किसी निर्णय पर पंहुचने से ज्यादा उसे उलझा कर एक डिवेट बना देते हैं.

    div81 के द्वारा
    July 18, 2012

    मोहिंदर कुमार जी, सादर बहुत दुःख हुआ ये जान कर की आप इस विषय को तिल का ताड़ बोल रहे है आये दिन होने वाली समयस्या जो कि विकराल रूप लेती जा रही है अब नहीं संभलेंगे तो कब संभलेंगे हम | मेरे भाई इंडियन आर्मी में है और जब कारगिल युद्ध हुआ था उस वक्त हमें पता है क्या बीत रही थी पुरे परिवार पर कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिको को भी मजाक बना कर रख दिया है हमारे नेताओ ने आप कारगिल शहीदों के विषय में अधिक पढ़ना चाहते सुनना चाहते है तो जा कर उन परिवारों से मिल कर आइयेगा जिनका बेटा शहीद हुआ है | उन शहीदों की आत्मा भी रोती होगी देख के यहाँ का हाल कि बाहरी दुश्मनों से तो हम लड़ कर वीरगति को प्राप्त हो गए मगर देश में रहने वाले क्या कर रहे है अपने देश का हाल वो नौजवान तो देश की लिए मर मिट जाते है और देश के अंदर ही जो अमानवीयता हो रही है उसके लिए आप क्या कर रहे है किसी सर्थक मुद्दे को भी आप तिल का ताड़ बोल रहे है | पहनावे और आचरण को दोष दे रहे है आप यहाँ पर सूट साडी पर्दे में रहने वाली महिलाये भी सुरक्षित नहीं रात में तो क्या यहाँ दिन के उजाले में भी महिलाये सुरक्षित नहीं है न बहार न घर के अंदर | जेजे मंच में आप को सार्थक मुद्दों पर ही पढ़ने को मिलेगा अगर आप को लगता है की तिल का ताड़ है तो माफ़ी चाहूंगी मगर आप को यहाँ पर ये ही पढ़ने को मिलेगा | प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
July 17, 2012

दिव्या जी, आपने जो लिखा है वह पूर्ण रूप से सत्य है… “आप साड़ी में हो या सूट में हो या पूरी तरह से पर्दे से ढकी हो गंदी मानसिकता के लोग आप को बिना छुए ही चीर- हरण कर सकते है | यहाँ पर जब तक पांडव अपनी पत्नी को दाव में लगाते रहेंगे तब तक ऐसे दु:शासन ज़िन्दा रहेंगे | यहाँ जब तक पिता धृतराष्ट्र की तरह रहेंगे तब तक दु:शासन चीरहरण करते रहेंगे यहाँ जब तक माताएँ गांधारी बनी रहेगी तब तक दु:शासन जैसे पुत्र से समाज की हर एक लड़की इनकी गंदी नियत से बची नहीं रहेगी | दोष तो पूरे समाज का ही है जो धृतराष्ट बना हुआ है |” आधुनिक समय से समाज में ऐसी घटनाएं दिन-बदिन बढती चली जा रही हैं…टेलिविज़न, इंटरनेट, मोबाइल, फिल्मे सब के सब कहीं न कहीं ऐसी घटिया सामग्री पेश कर रहे हैं जिससे छोटे-छोटे बच्चे ही नहीं बड़े-बड़े अक्लमंद लोगों की सोंच और उनकी मानसिकता कुंठित होती चली जा रही है वे सही-गलत के चक्कर में न पड़कर बस अपनी छणिक वासना को किसी तरह से तृप्त कर लेना चाहते हैं और jab सामाजिक बन्धनों के चलते वे ऐसा नहीं कर पाते तो कुछ लड़कियों-औरतों के कपड़ों और उनके चरित्र पर उंगलियाँ उठाते हुए अपनी छिछोरी हरकतों को अंजाम देते हैं और स्वयं को समाज में फैलती हुयी अश्लीलता को ख़त्म करने का ठेकेदार बतलाने लगते हैं….जिस तरह से अश्लीलता का कारोबार फैलता चला जा रहा है वह बहुत ही भयावह हो चूका है आज लडकियां अपने ही घरों की चारदीवारी के अन्दर पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं…इसके बहुत से कारण हैं और इसे फैलाने वाले उद्योगपतियों को तथा सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि उन्हें इन सब से बहुत मोटा मुनाफा होता है…कोई भी अपना कर्त्तव्य सही से नहीं निभा रहा है…सामान्य जनता भी आधुनिकता के नाम पर ऐसी चीज़ें स्वीकार करती चली जा रही है जो स्वयं उसके परिवार और समाज के लिए बहुत घातक है…इसका आज से ही पुरजोर विरोध करना होगा हमें और आपको वर्ना न जाने इसकी भेंट कितनी मासूम लड़कियां, बच्चियां और औरतें हो जाएँ….

    div81 के द्वारा
    July 19, 2012

    अनिल कुमार जी, सादर प्रणाम आप के विचार जान के बहुत अच्छा लगा बिलकुल पूरी तरह से आप की बात से सहमत हूँ | विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए और आप के विचारों के लिए आप का ह्रदय से आभार

SAVI के द्वारा
July 17, 2012

दिव्या बहन, यह सब घटनाएँ हमारे कमजोर कानून व्यवस्था के कारण हो रही है| मैं यहाँ पर एक उदाहरण दे रही हूँ, आयरलैंड में रात के एक बजे एक बीस वर्षीय युवती शराब के नशे में सडक के किनारे पड़ी थी| उसके आस पास से लोग आ जा रहे थे पर कोई उसका फायदा उठाने की कोशिश नहीं कर रहा था | और ये वहां आम बात है | क्योंकि वहां का कानून महिलाओं की अस्मिता को लेकर बहुत सख्त है| हमारे यहाँ के कानून को हम एक अरसे से देखते आ रहे हैं और इस संदर्भ में भी जल्दी ही हम लोगों को पता लग जायेगा की कितने लोगों को इस घटना में सजा हुई कितने लोग कमजोर कानून का सहारा लेकर छुट गये| एक बात और पहले यदि कोई युवक ऐसी घटना में लिप्त पाया जाता था तो उसका परिवार ही उसका बहिष्कार कर देता था| आज अगर अपने घर का कोई युवक ऐसा अपराध करें तो हम उसे थोडा-सा डांटकर उसे बचाने का प्रयास करना शुरू कर देते हैं| तो आप समझ ही सकती हैं, जब ऐसे युवको को परिवार का सहारा हैं| कानून का सहारा हैं, तो समाज में नारी का स्थान कहाँ पर है|

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    आप ने इस घटना का जिक्र पहले भी किया है दुःख होता है हम ऐसे समाज में रह रहे है जहाँ पर महिलाओ को सुरक्षा भी नहीं मिल रही है एक तरफ तो औरतो मान सम्मान की बाते करते है नेता और दूसरी और इन्ही के कारनामे आये दिन पढ़ने को मिलते है चाहे मधुमिता कांड हो या भंवरी जब तक हमारे समाज में औरतो को भोग्या समझा जाता रहेगा तब तक महिलाओ कि स्थिति सुधरने वाली नहीं | मैंने भी ये ही कहने कि कोशिश करी है की महिलाओ को भी गांधारी बनाना छोडना होगा और पुरुषों को भी जो ये सोचते है की हमारे परिवार का लड़का ये नहीं कर सकता | इस विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया

shashibhushan1959 के द्वारा
July 16, 2012

आदरणीय दिव्या जी, सादर ! ऐसी घटनाएं दिल हिला देती हैं ! आक्रोश बढ़ा देती हैं ! पर एक बात की विवेचना की जानी चाहिए की क्या इसके पहले तमाम पुरुष सभ्य थे ! सदाचारी थे ! तो कलतक जो सभ्य थे, सदाचारी थे वे एकाएक बलात्कारी कैसे हो गए ? क्या वजह है, ऐसी घटनाओं में वृद्धि की ? ऐसा क्या हो गया इन कुछ वर्षों में जो स्थितियां इतनी भयावह हो गईं ? क्या आज के लड़के पागल हो गए हैं ? या उनकी मानसिक स्थिति अचानक ही विकृत हो गई है ? क्या कोई खतरनाक वायरस फैल गया है समाज में ? आखिर क्या हो गया है ? कौन से ऐसे परिवर्तन हुए हैं जिनका यह दुष्प्रभाव है ? इन कारणों का विश्लेषण करना होगा, निष्पक्ष रूप से ! इस घातक बिमारी की जड़ क्या है, क्यों पिछले कुछ वर्षों से ऐसी घटनाएं बढ़ गईं ? क्यों पुरुष वर्ग इतना लोलुप हो गया ! क्यों स्त्रियाँ पुरुषों के आगे दीन बनी हुई हैं ? क्यों नहीं वे ऐसे लोगों को सबक सिखा रहीं ? तमाम कर्मक्षेत्र में पुरुषों की बराबरी कर रही स्त्रियाँ, इस क्षेत्र में पीछे क्यों हैं ? ऐसी घटनाओं के समय महिलायें ही महिलाओं का साथ क्यों नहीं देतीं ? इन सब प्रश्नों पर भी विचार होना चाहिए ? इन बातों का विश्लेषण होना चाहिए ? सादर !

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, सादर प्रणाम हमारा समाज विघटनकारी दौर में है एकल परिवार का बढ़ना विकास के लिए स्टेट्स मेंटेन करने के लिए एकल परिवार में माता पिता का जॉब करना और बच्चो का आया के हाथो पालन पोषण होना संस्कार कौन डालेगा इन बच्चो में, बच्चे गलत करे है तो माता पिता इसको स्वीकारने कि जगह बचाने का उपाए सोचने लग जाते है पहले तो इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते और फिर पैसो से मुह बंद कर दिया जाता है विकार तो पैदा होना ही है न | विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार

allrounder के द्वारा
July 16, 2012

नमस्कार दिव्या जी, गोवाहाटी मैं हो हुआ वह बहुत ही शर्मनाक हादसा है, हालाँकि इसमें गौर करने वाली बात ये है की दोषी लोग चिन्हित किये गए हैं, और जिस प्रकार से इस मामले को गंभीरता से लिया गया लगता है दोषियों के विरुध कड़ी कार्यवाही होगी ! रही बात मानसिकता की तो मनुष्य मैं एक पाशविक गुण सदा रहा है और ऐसी मानसिकता के लोगों मैं ये पाशविक गुण अकेली लड़की को देखकर जागृत हो जाता है, जिसे रोक पाना सदियों से संभव नहीं हो पाया है, ये मानसिकता इतनी आसानी से बदलने वाली नहीं है, हाँ कानून को थोडा शख्त बनाया जा सकता है और दोषियों को दण्डित कर ऐसी विकृत मानसिकता के लोगो के सामने नजीर पेश की जानी चाहिए जिससे भविष्य मैं ऐसा करते समय उन्हें इस बात का कुछ भान हो की वे क्या कर रहे हैं !

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    सचिन जी नमस्कार !! आप कि बात से सहमत हूँ कि जो मनसिकत सदियों से चली आ रही है उसको यूँ तुरंत नहीं बदला जा सकता वैसे ही कानून व्यवस्था और प्रशासन को भी तो नहीं बदला जा सकता न, यहाँ तो चेहरे बदल जाते है मगर सरकार वो ही रहती है sarakar बदल भी जायेगी तो वो ही होगा नीतियां वही रहेगी कुछ लोग आगे भी आते है तो उनको मार दिया जाता है |

sadhna srivastava के द्वारा
July 16, 2012

दिव्या जी घिनौने चेहरे का इंसान कभी सभ्य नहीं हो सकता…. अभी कुछ दिनों पहले इस so called सभ्य मंच पर भी एक छोटी सी बात का बतंगड़ बना था…. यहाँ तो सभी पढ़े लिखे विद्वान् सम्मानित लोग हैं (i do not know they are in real or not)…जब यहाँ ऐसा हो सकता है तो guawahati में क्यों नहीं हो सकता…. आप किसी के बोलने की बात करती हैं…. मैंने यहाँ पर भी देखा कि लड़कियां, महिलायें भी खूब बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहीं थी…. तो फिर पुरुषों पर तो भरोसा किया ही नहीं जा सकता….!! उस लड़की को बचाने कोई आगे नहीं आया कोई बड़ी बात नहीं है ये…. कायरों की जमात में हिम्मतवाले नहीं मिलते…..!! और बात छोटी हो या बड़ी गलती तो हमेशा लड़की की ही निकाली जाती है…. !! जब तक इन so called मर्दों पर dependency ख़तम नहीं होगी ये सब नहीं रुकने वाला…. मैं तो कहूँगी ऐसे वाहियात लोगो को सजा खुद उस लड़की को देनी चाहिए…. On the spot…!! कानून सरकार….. सब बकवास है….!! भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है…. !!

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    साधना जी नमस्कार !! बिलकुल सही कहा आपने उस लड़की को ही उन सब कायरो को सजा देनी चाहिए और सभी लड़कियों को अपने पास एक होकी रखनी चाहिए on the spot फैसले भी आने लगेंगे और अखबार में ये खबर कि फलां जगह लड़की के साथ छेड़छाड़ की घटना घटी आने कि जगह ये आएगी फलां जगह लड़के को उसके किये कि सजा मिली | आप का तहे दिल से आभार

bharodiya के द्वारा
July 16, 2012

अच्छे पोलिस ओफिसर की सराहना करो । उसे सपोर्ट करो । गुंडों को छुडानेवाले वकिल और न्यायतंत्र का विरोध करो । और कभी कभी अपने हाथ कानून का डंडा उठा लिया करो । तालिबानों का ये तरिका अच्छा है जब हमारी सरकारें निष्फल है तो । गुंडों पर भाषण का असर नही होता । गुंडे समाज का हिस्सा होता है, हर समाजमें होता है । पोलिस का गठन भी गुंडों के लिए ही बनाया गया है । पोलिस को ही प्रेरित करना होगा अपना काम बराबर करे । बिच में राक्षस हक आयोग(मानव हक आयोग) अपनी टांग मारता रहता है तो उस की टांग भी तोडो ।

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    आदरणीय जी, सादर प्रणाम आप की बात से सहमत हूँ | इस बेशकीमती प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
July 16, 2012

आदरणीया दिव्या जी सादर नमस्कार जी हाँ…अब हमारे समाज में दानव राज ही है और कुछ भी नहीं बदलने वाला . जब महाभारत काल से ऐसा ही होता चला आ रहा है तो ऐसा कैसे सोचा जा सकता है कि अचानक से हमारे समाज में परिवर्तन हो जायेगा. पहले एक-दो दु:शासन थे अब तो बहुतेरे दु:शासन हैं….. पहले लोगों में कुछ शर्म-हया भी थी आज तो इंसान अपना सब कुछ भूलता जा रहा है. उसके अंदर का डर ही समाप्त होता जा रहा है. वह मानसिक रूप से और भी अधिक विकृत होता जा रहा है. हमारा समाज भोगवाद की ओर बढ़ रहा ओर निरंतर ही बढ़ता जा रहा… कैसे उम्मीद किया जाये कि घृणित सोच में परिवर्तन होगा….यह मेरी नकारात्मकता नहीं है, यह आज की वास्तविकता है…. सिर्फ पुरुष वर्ग को दोष दे कर इस तरह की घटनाओं की निंदा करके पल्ला झाड लिया जाये यह उचित भी नहीं है. क्या एक पिता..एक भाई…पुरुष नहीं है…क्या वह चाहेगा कि उसके घर की बहन-बेटियों के साथ ऐसा ही कुछ होने पाए…. जो लोग ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं ना तो उनके लिए कोई माँ होती है..ना ही कोई बहन होती है..ना ही बेटी…उनके पूरे परिवार के संस्कार ही ऐसे होते हैं…जहाँ उनके घर के पुरुष परायी स्त्रियों के साथ अभद्रता करते हैं और उनके घर की स्त्रियां पराये पुरुषों के साथ……यहाँ तक अपने घर के लोगों के साथ, अपने रिश्तेदारों के साथ भी ऐसा करने से बाज़ नहीं आते…. यहाँ मैं आदरणीया सरिता जी की बातों से सहमत हूँ…. जंगली जानवर अगर खुले में घूमने लगते हैं तो लोग उनसे बच के घरों में कुछ दिन भले छिप जायें लेकिन आखिरकार तो उन्हें मारना ही पड़ता है . स्थायी उपचार बचने में नहीं बल्कि उन्मूलन में है … अब वह जानवर चाहे पुरुष रूप में हो या स्त्री रूप में….. काफी आक्रोश है आपके अंदर…आज यह रूप भी देखने को मिला… आभार….

    div81 के द्वारा
    July 16, 2012

    आदरणीय अजय जी, सादर प्रणाम आप ने भी शायद ध्यान से नहीं पढ़ा मैंने पुरुष समाज को कटघरे में नहीं खड़ा किया है | अंत की लाइन को ध्यान से पढ़ा गया होता तो शायद आप ये नहीं कहते धृतराष्ट और गांधारी बनाना छोड़ना होगा की हमारा पिता पति बेटा ऐसा नहीं कर सकता सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों औरतों का सम्मान करना आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है | बिलकुल भोगवाद के कारण स्थिति बत से बत्तर होती जा रही है | पूरी सामाजिक व्यवस्था को बदलने की जरूरत है, पारिवारिक, सामाजिक क़ानूनी रूप से परिवर्तन की जरूरत है | आपने अपना कीमती समय इस लेख को दिया आप का आभार सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

    Ajay Kumar Dubey के द्वारा
    July 16, 2012

    धत् तेरे की……अरे मेरा आशय यह नहीं था कि आप पुरुष समाज को कटघरे में कर रही हैं….मैं आपकी ही बात को दुहरा रहा था. कल से आज तक मैंने आपकी यह पोस्ट कई बार पढ़ डाली है. और ध्यान से ही पढ़ी है. कल से ही प्रतिक्रिया देने की कोशिश करता रहा हूँ. हर बार कुछ ना कुछ गडबड हो गयी और विचारों का घमंजा बन गया. घमंजा समझती हैं ना….वैसे खाने में बड़ा टेस्टी होता है…

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    अजय जी, घमंजा ये पहली बार सुन रही हूँ खाने की शौक़ीन हूँ तो कृपया करके इसकी रेसेपी बताइयेगा :)

    Ajay Kumar Dubey के द्वारा
    July 17, 2012

    दुनिया में कोई भी चीज मुफ्त में नहीं मिलती…

    rameshbajpai के द्वारा
    July 18, 2012

    प्रिय श्री दुबे जी यह ठीक है की मुफ्त की चीज कोई लेना नहीं चाहता ,पर स्वाद चखने के लिए दुकानदार भी रोक नहीं लगाते , मै यहाँ दिव्या बिटिया की हौसला आफजाई करने आया था पर घमंजा के फेर में पड गया | एक बात बता दू कलम की पैनी धार के साथ इनका शौर्य ,साहस भी जग जाहिर है | शुभकामनाओ सहित

    div81 के द्वारा
    July 19, 2012

    आदरनीय चाचा जी, सादर प्रणाम हौसला अफजाई के लिए आप का ह्रदय से आभार

    div81 के द्वारा
    July 19, 2012

    आदरनीय अजय जी, मेरे ख्याल से एक चीज है जो बिलकुल मुफ्त मिलती है राय चंद होते है  उनकी राय बिलकुल मुफ्त मिलती है :)

akraktale के द्वारा
July 16, 2012

दिव्या जी सादर नमस्कार, आपने भाषण तो बहुत लंबा झाड दिया किन्तु बताएं की क्या समाज का यह घिनौना चेहरा क्या एक दिन में ही बन गया? आपने खुद एक लम्बी सी फेहरिस्त बनाकर लिखा है की हर दिन ऐसी घटनाएं हो रही हैं. फिर क्या कारण था की वह लड़की इन सब बातों से बेखबर रही. क्या उसके माता पिता का दोष नहीं है जिन्होंने उसे कोई हिदायत नहीं दी? फिर आप ही बताएं की क्या एक सत्रह साल की लड़की को जन्मदिन मनाने के लिए बियर बार में जाना क्या उचित था? कल की ही बात है निशा जी के कांवड़ यात्रा के आलेख में लिखा था इस धार्मिक यात्रा में भी असामाजिक तत्व भी शामिल होते हैं. आप ही बताये की जब धार्मिक यात्रा में ऐसे लोग शामिल है तो फिर बिअर बार के सामने क्या संत खड़े रहेंगे? मै आसाम में ब्रम्ह्पी के साथ हुई घ्रणित घटना का समर्थन नहीं कर रहा हूँ किन्तु क्या एक ही दिन में सब बदल जाएगा? नहीं ना. तो फिर पहले समाज को बदलने की जरूरत है, प्रशासन को उसकी भूमिका याद दिलाने की जरूरत है, असामाजिक तत्वों के हौंसले तोड़ने की जरूरत है,महिलाओं को अपनी सुरक्षा उपाय बढाने की जरूरत है. बहुत काम हैं जो सुरक्षित और सभी समाज बनाने के लिए करना है तब तक एहतियात बरतने के अलावा कोई चारा नहीं है.सिर्फ समाज को चार पंक्तियों में कोसने से कुछ होने वाला नहीं है.वरना तो मेरे हाथ में आज का अखबार भी है जिसमे छः वर्ष की मासूम से दुष्कृत्य के प्रयास, पांच लोगों द्वारा कार में गैंग रेप, मशहूर एथलीट पिंकी को जान का खतरा और कानपुर में छेड़छाड़ के बाद ब्लेट से पिटाई का समाचार भी छपा है.

    div81 के द्वारा
    July 16, 2012

    आदरणीय अशोक रक्तले जी, सादर प्रणाम माफ़ी चाहूंगी मैंने तो दिल की बात कही थी और वो आप को भाषण लगा और वो भी लंबा (अक्सर लंबे भाषण उबाऊ होते है जिनको कि हम सरसरी नजर से पढते है या सुनते है ) तो मुझे भी ऐसा ही लगा आपने मेरे लेख को ध्यान से नहीं पढ़ा अब वो लंबा था तो हो सकता है छूट गया हो जो लेख में कहा है उसी लाइन को दोहरा रही हूँ ……..वो लड़की रात को निकली थी पब से तो क्या दिन के उजास में लड़कियों को बक्स दिया जाता है ?????????????????? लड़कियां सुरक्षित कहाँ है यहाँ पर | कहीं सगा सम्बन्धी ही बुरी नियत रखता है लड़की पर और मौका मिलने में जाहिर भी कर देता है अपनी कामलोलुप नज़रों से, शरीर को सहलाते गंदे और लिजलिजा स्पर्श से जतला देते है कि लड़की होना दोष है तुम्हारा | बसों में सफ़र करते समय पुरुषों द्वारा छेड़खानी, अश्लील फ़ब्तियाँ और शीलहनन की कोशिशें महिलाओं के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है। स्कूल, कॉलेज, रास्तों में ऑफिस में, सिनेमाहाल में ट्रेन, बस टेम्पो ओटो कहीं भी तो सुरक्षा की गारंटी नहीं देता ये समाज लड़कियों को | मैं समाज को कोस नहीं रही हूँ मैं भी चाहती हूँ बदलाव हो ………….. और एहतियात बरतने कि जरूरत है बिलकुल है | नवाज देवबंदी का शेर याद आ रहा है: ‘बद नजर उठने ही वाली थी किसी की जानिब लेकिन, अपनी बेटी का ख्याल आया तो दिल कांप गया।’ माफ़ी चाहूंगी अगर कोई बात बुरी लगी हो तो

jlsingh के द्वारा
July 16, 2012

धृतराष्ट और गांधारी बनना छोड़ना होगा कि हमारा पिता पति बेटा ऐसा नहीं कर सकता, सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों औरतों का सम्मान करना आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती है मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है | आदरणीय दिव्या बहन, नमस्कार! निश्चय ही हम सब काफी नीचे (या कहें कि गर्त में) चले गए हैं. ये तो ठीक ऐसा ही हुआ, जैसे किसी फिल्म में कोई सीन चल रहा है और सभी मजे ले रहे हैं! हमारी मानसिकता को हो क्या गया है? कभी थाने में अपनी ही सहकर्मी से दुराचार, तो सेना के जवान का वह्सीपन … जितनी भी भर्त्सना की जाय कम है! कुछ करना जरूरी हो गया है. सरकारी स्तर पर भी और सामाजिक स्तर पर भी!…….

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    आदरणीय भाईसाहब, सादर प्रणाम फिल्मे भी समाज का आइना होती है कभी समाज से प्रेरणा लेकर फ़िल्म बनती है कभी समाज फिल्मो को देख कर सीखता है | सच कहा आपने हम गर्त में ही जा रहे है और बेहयाई इतनी की गलत को गलत भी नहीं मान रहे है दोष दुसरो में तलाशा जा रहा है | जी बिलकुल सरकारी और सामाजिक स्तर पर परिवर्तन की आवश्कता है ………………… आप का तहे दिल से शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
July 16, 2012

घिनौने कृत्य के दोषी गुनाहगारों और समाज के प्रति आपका आक्रोश पूर्णतया सही है,हमारे संस्कार खो रहे हैं.बहुत अच्छा आलेख दिव्या.ऐसे लोगों के लिए कोई भी सजा कम है

    rajkamal के द्वारा
    July 16, 2012

    आदरणीय निशा जी हमारी हातिमताई महामहिम प्रतिभा पाटिल जी को भी समझा दीजिए की वोह फांसी की सजा माफ़ी अपराधी के अपराध की संगीनता को मद्देनजर रखते हुए ही करती

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    आदरणीय निशा जी, सादर प्रणाम विकास के नाम पर हम अपनी सभ्यता और संस्कारों को त्यागते जा रहे है उसी का दोष परिणाम है हम विनाश के मुह में खड़े हो कर तमाशा देख रहे है | आप का तहे दिल से शुक्रिया

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    आदरणीय राजकमल भाई, सादर प्रणाम आप कि बात से पूर्णत: सहमत हूँ अपराध की संगीनता को मद्देनजर रख कर ही राष्ट्रपति को कुछ निर्णय लेने चाहिए थे | पहले तो फैसले ही सालो साल नहीं होते ऊपर से उसको भी माफ कर दिया जाए तो खौफ किस के दिल में होगा |

dineshaastik के द्वारा
July 16, 2012

दिव्या जी पीड़िताओं का आक्रोश व्यक्त है आपके आलेख में। दोषी कौन यह प्रश्न तो उठना स्वभाविक है। समाज ही दोषी है जिसने ऐसी व्यवस्था बनाई है कि जिससे हम इंसान से अपराधी और अपराधी से हैवान बनते जा रहे हैं। समाज के हम भी अंग है अतः दोषी हम भी हुये। अपराधी एवं हैवानों की सत्ता में घुसपैठ होने के कारण पुलिस तमाशबीन बनकर रह गई है। क्या अब यह व्यवस्था बदलने की जरूरत नहीं है? http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/07/13/हम-ऐसे-खुदा-को-क्यों-मानें/

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, सादर प्रणाम बिलकुल दोषी पूरा समाज है जिसमे ऐसी व्यवस्था फलफूल रही है और हम शर्म महसूस करने कि जगह दूसरों में दोष तलाश रहे है | शुक्रिया

seemakanwal के द्वारा
July 15, 2012

इन्सान न जाने क्यों हैवान बनता जा रहा है .

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    हर इंसान के अंदर एक साधू और एक शैतान बसता है बस ये संस्कार और माहौल के ऊपर है की इंसान साधू बनता है या हैवान और हमारा आज का समाज संस्कार विहीन होता जा रहा है |

sumit के द्वारा
July 15, 2012

abhi bhi kuch nah kiya gaya to ye hadse sadko pe nahi , gharo me honge,,,,

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    ये हादसे घरों में भी होने शुरू हो गए है महिलाये घरों में भी सुरक्षित नहीं है अपनी दुश्मनी, बदनीयती के चलते घरों में भी घुस कर महिलाओ कि आबरू लुटी जा रही है ………………….

sinsera के द्वारा
July 15, 2012

दिव्या जी नमस्कार , आपका नाम तो सुना था लेकिन कन्फर्म करने के लिए पिछली पोस्ट पर जाना पड़ा . गुवाहाटी की इस निहायत शर्मनाक घटना पर आपकी प्रतिक्रिया बिलकुल जाएज़ है . जंगली जानवर अगर खुले में घुमने लगते हैं तो लोग उनसे बच के घरों में कुछ दिन भले छिप जायें लेकिन आखिरकार तो उन्हें मारना ही पड़ता है . स्थायी उपचार बचने में नहीं बल्कि उन्मूलन में है …

    div81 के द्वारा
    July 17, 2012

    आदरणीय सरिता जी, सादर नमस्कार आप से मुलाकात पहले हुई है ओ बी ओ मंच मे, शायद आप को याद न ह वैसे आप की सारी रचनाये पढ़ी है और पसंद भी किया है कई बार काम कि अधिकता और जेजे साईट में कुछ न कुछ समस्या के चलते कमेन्ट नहीं कर पाती | आप की बात से पूर्णत: सहमत हूँ इनका स्थायी उपचार ही करना होगा | आप की प्रतिक्रिया देख कर बहुत खुशी हुई आप का शुक्रिया


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