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कोई है इनका भी

Posted On: 10 Oct, 2012 में

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पितृपक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति करने का महापर्व है। एक तरफ जहाँ हम मृत प्रियजनों और पूर्वजो को याद करते है उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण करते है वहीं दूसरी और हमारे घर में उपेक्षित से हो गए है हमारे वृद्ध और बुजुर्ग | कई घर में हालात और भी दयनीय है | वो उनको वृद्धाश्रम में छोड़ आते है या घर से दर दर कि ठोकर खाने  को छोड़ देते है |एक ऐसे ही वृद्धाश्रम है जहाँ मैंने देखा है वो बुजुर्ग दिल में ये ही आस लिए जी रहे है की उनके जाने के बाद उनके बेटे या परिजन मुखाग्नि दे उनकी मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी | मगर ये आस अधूरी लिए ही वो इस दुनिया से चले जाते है |

उन्ही पलो में लिखी गयी मेरी रचना…………………………

_______________________________________________________________________________________________________

2002093001150101


बूढी कमजोर तरसती हुई आँखे
राह देख रही है अपनो के आने का
कोई है जो आएगा
कभी तो यहाँ से ले जायेगा
दिन ढल जाता है उम्र जैसे
बीते कई पड़ाव एक जैसे
कभी इंतजार रहा तेरा
इस दुनिया में आने का
अब इंतजार है दुनिया से जाने का
मगर फिर भी दिल में

उम्मीद एक शेष है
वो आएगा और एक सहारा

कंधे का उसका भी हो जायेगा
बूढी कांपती  बेबस बाँहे
तलाश रही है कोई सहारा
कोई आये थामे इसे
कर दे उसका उद्धार
जैसे कभी थामी थी वो उँगलियाँ
नरम नाजुक नन्ही हथेलियाँ
थमा था कई बार जिसे
थपका था कई बार जिसे
आज वो काँप रही है
कोई नहीं जो थामे उसे
फिर भी आस मन में एक जगी है
कोई आगेगा और देगा मुखान्गिन उसे
मगर ये जगी आस भी रह जायेगी प्यासी
रोएगी रात भर तरसती निगाहें
फिर जागेगी और संजोएगी सपने कई
कोई है उसका भी
जो आएगा और तारेगा उसे भी
धुंधली आँखों और तरसती बाहों
का ख्वाब फिर टूट जायेगा
कोई है इस दुनिया में इनका भी
मगर यहाँ नहीं आयेगा मगर यहाँ नहीं आएगा
……………………………………………………………………………………….



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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Abhinav Srivastava के द्वारा
October 19, 2012

बहुत दिनों बाद आपको पत्र… दिल को छू लेने वाली आपकी रचना पर आपको बधाई… और एक उम्मीद कि पढ़ कर किसी न किसी की तो अंतरात्मा जागेगी…!

yogi sarswat के द्वारा
October 18, 2012

बूढी कांपती बेबस बाँहे तलाश रही है कोई सहारा कोई आये थामे इसे कर दे उसका उद्धार जैसे कभी थामी थी वो उँगलियाँ नरम नाजुक नन्ही हथेलियाँ थमा था कई बार जिसे थपका था कई बार जिसे आज वो काँप रही है जमाना अगर ऐसा बदलता है जो अच्छा है की ये जमाना यहीं , यूहीं ठहर जाए , इसको बदलने की जरुरत नहीं ! ऐसे शब्द दिल में झनझनाहट पैदा कर देते हैं और सोचने पर मजबूर भी ! क्या हमारे साथ ऐसा नहीं होगा ? गज़ब के शब्द , दिल में उतर गए दिव्या जी

sumit के द्वारा
October 17, 2012

वृद्धओ की आज की स्थिति दिखाती सुंदर कविता ……………….

    div81 के द्वारा
    October 17, 2012

    प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार सुमित जी |

sudhajaiswal के द्वारा
October 17, 2012

दिव्या जी, क्षमा करें शब्द छूट गए कृपया “पास हो तो उनकी कदर नहीं करते” पढ़ें|

    div81 के द्वारा
    October 17, 2012

    सुधा जी, क्षमा मांग के शर्मिंदा न करें ऐसा हो जाता है, भाव समझ गयी थी | हो जाता है ऐसा कभी :)

sudhajaiswal के द्वारा
October 17, 2012

दिव्या जी, हमारे समाज की विडम्बना यही है पास हो तो उनकी करते बाद में स्वांग रचाते हैं| बहुत अच्छी रचना के लिए हार्दिक बधाई!

    div81 के द्वारा
    October 17, 2012

    आदरणीया सुधा जी, सदार नमस्कार ब्लॉग में आप का स्वागत है ,…..  आप की बात से पूरी तरह से सहमत हूँ | इसी बात का दुःख है अपनों के होते हुए भी ये बुजुर्ग ओल्ड एक होम में अंत समय व्यतीत कर रहे है | प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार

ashishgonda के द्वारा
October 15, 2012

आदरणीय! दिव्या दीदी, संभवतयः आज पहली बार पढ़ रहा हूँ आपको. बहुत ही ह्रदयस्पर्शी रचना, मैं श्राद्ध आदि कर्म करने में कोई बुराई नहीं मानता, लेकिन केवल उन्हें ये सब करना चाहिए जो जीते-जी भी अपनों की सेवा किये हो. ये मेरी व्यक्तिगत राय है, कृपया कोई भी इसे अन्यथा न ले.

    div81 के द्वारा
    October 17, 2012

    स्नेही, आशीष जी,  आप का ब्लॉग में स्वागत है , आप की बात से पूरी तरह से सहमत हूँ प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 12, 2012

नमस्कार दिव्या जी .. दिल को छु लेने वाली रचना / ये हमारे समाज की कडवी हकीकत है .. जीते हुए की कद्र नहीं करते और जब मर जाते है तो उन्हें माला पहनाते है .. पता नहीं कौन कौन से कर्मकांड करते फिरते है / ये दुनिया ढकोसलो पे चलती हैं .. … बहुत -२ बधाई

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    नमस्कार महिमा जी, काश हम फिर से अपनी संस्कृति को सही मायनो में समझ जाए और अपने जीवन में अपना ले तो जो ये घृणित कृत हो रहा है वो थम जाए | आप का आभार महिमा जी

ANAND PRAVIN के द्वारा
October 12, 2012

वैसे आपकी जानकारी के लिए बतला दूँ………..मैंने एक और पोस्ट किया था……….. http://anandpravin.jagranjunction.com/2012/10/07/कहाँ-समझा-जवाना-है आजकल सभी महिला शक्तियों से मुझे भीख मांग मांग वोट और कमेन्ट लेने पर रहें है……….क्या दिन आ गया है

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    वैसे फिर से जानकारी बढ़ने के लिए आप का फिर से शुक्रिया…………. आप सुपर फास्ट चल रहे है और मैं कछुवा चाल में आप को पकड पाना मुश्किल होता जा रहा है :) भाई दिन खरब चल रहे है मेरे भी कमेन्ट के लिए किस को कहने अब आप बताइए आप तो महिला शक्ति के पास जा रहे हो हम कहाँ जाए :P मजाक कर रही हूँ | वैसे सच में क्या दिन आ गए है ????????????????

ANAND PRAVIN के द्वारा
October 12, 2012

आदरणीय दिव्या दीदी, सादर प्रणाम इस दुनिया में यूँ तो इंसान कई रोगों से ग्रसित है किन्तु वास्तव में जो रोग इंसान के साथ आजकल इंसानियत को भी खाती जा रही है वो है बुढापे का रोग…………इंसान अक्सर दुनिया की मौलिक तथ्यों को भूल जाता है की कभी उसे भी ऐसे दिन देखने पड़ेंगे……………….मैंने भी लिखा था “वो चल रहा”………किन्तु आपकी लेखनी के आगे कहीं नहीं ठहरती …………फिर भी जो भी हो मैं अपने आप में गौरवान्वित हूँ ऐसे मुद्दे को उठाने के लिए…..और आपको न सिर्फ बधाई देता हूँ बल्कि धन्यवाद भी कहना चाहूँगा एक सफल रचना के लिए…..सम्वेदना से भरी हुई एक पूर्ण रचना जो की आपके विशाल ह्रदय को दर्शाती है……………………लिखते रहें…….. वैसे आपके जानकारी के लिए बतला दूँ की आपके रचना को सबसे पहले शायद मैंने ही पढ़ा था और पञ्च में पांच वोट दे आपको पूर्ण बहुमत दिया था……………फिर भी कमेन्ट देर से देने के लिए क्षमा

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    आदरणीय आनंद भाई, सादर नमस्कार भाई आप हम से आगे निकल गए हो और आप को पढ़ के हम गौरवान्वित होते है बहुत ही धार दार लेखनी है आप की :) आप ऐसे ही लिखते रही खूब तरक्की करो :) वैसे जानकारी बढ़ाने के लिए शुक्रिया, मेहरबानी, करम और क्षमा मांग के शर्मिंदा मत किया कीजिये अच्छा लगा आप के विचारों को जानकार आप का आभार

shashibhushan1959 के द्वारा
October 12, 2012

आदरणीय दिव्या जी, सादर ! “”फिर भी आस मन में एक जगी है कोई आगेगा और देगा मुखान्गिन उसे मगर ये जगी आस भी रह जायेगी प्यासी रोएगी रात भर तरसती निगाहें फिर जागेगी और संजोएगी सपने कई”" बहुत भाव विह्वल करती रचना ! कैसे लोग इतने निष्ठुर, इतने हृदयहीन, इतने नीरस हो पाते होंगे ? अपने बच्चों के साथ खेलते हुए क्या उन्हें अपने माता-पिता की याद वाकई नहीं आती होगी ! क्या वे कभी नहीं सोचते होंगे की उनका बच्चा भी उनके साथ यहीं कर सकता है ! ऐसे नीच लोग मंदिरों में किस मुंह से जाते होंगे ? और समाज क्यों ऐसे लोगों के प्रति भी निर्दय नहीं होता ! ऐसे लोगों का सामाजिक वहिष्कार नहीं करता ? सादर !

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    आदरणीय शशि भूषण जी, सादर प्रणाम इन बुजुर्गो को देखती हूँ तो मैं भी ये ही सोचती हूँ की कितने पाषाण दिल के होंगे वो जिन्होंने इतनी बेदर्दी से इनको घर से अलग कर दिया है | ऐसे लोग भी होते है दुनिया में जो इस तरह का बर्ताव करते है ये दुखद है | आप की बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए आप का आभार

akraktale के द्वारा
October 11, 2012

दिव्या जी               सादर, वृद्धों के मन कि पीड़ा पर लिखी सुन्दर कविता और उससे भी बढकर सीधे हकीकत बयान करता चित्र. सच है आज जरूरत है हम इनके दर्द को समझें.

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    आदरणीय अशोक जी, सादर प्रणाम अपने जो दर्द दे जाते है उस दर्द को शायद ही कोई भर पता हो मगर सच इन बुजुर्गो को जरूरत है हमारे साथ और अपनत्व की … आप का तहे दिल से शुक्रिया

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 11, 2012

आईये हम पहल करें. बहुत सुन्दर भाव एवं रचना हेतु बधाई. काफी दिनों बाद आप मंच पर आयीं आदरणीया दिव्या जी, सस्नेह.

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    आदरणीय चाचा जी, सादर प्रणाम आप का तहे दिल से शुक्रिया कुछ काम की अधिकता कुछ अपना आलस्य कुछ नेट की दिक्कत सब मिला के मंच से अनुपस्थित थी | याद रखने के लिए आप का एक बार फिर से शुक्रिया :)

jlsingh के द्वारा
October 11, 2012

आदरणीय दिव्या बहन, नमस्कार! ह्रदय विदारक, करुण चित्र उपस्थित करती हुई रचना ! कोई है उसका भी जो आएगा और तारेगा उसे भी धुंधली आँखों और तरसती बाहों का ख्वाब फिर टूट जायेगा कोई है इस दुनिया में इनका भी मगर यहाँ नहीं आयेगा मगर यहाँ नहीं आएगा…..

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    आदरणीय भाई साहब, सादर प्रणाम ऐसी बुजुर्गो के विषय में सुना के पढ़ के ही हमें दुःख होता है जाने वो कैसे पाषण दिल के लोग होते है जो उन्हें ऐसे ओल्ड एज होम छोड़ के आ जाते है | आप का शुक्रिया

seemakanwal के द्वारा
October 10, 2012

मगर फिर भी दिल में उम्मीद एक शेष है वो आएगा और एक सहारा कंधे का उसका भी हो जायेगा बूढी कांपती बेबस बाँहे मार्मिक रचना ,हार्दिक बधाई .

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    आदरणीया सीमा जी, सादर आप का तहे दिल से शुक्रिया

Santosh Kumar के द्वारा
October 10, 2012

आदरणीय दिव्या बहन ,.सादर नमस्ते बहुत भावुक करने वाली रचना ,…हार्दिक साधुवाद

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    आदरणीय संतोष भाई, सादर प्रणाम आप की कहानी जो की ऐसे ही पलो को बयां कर रही थी पढ़ी उसको को पढ़ के मैं खुद बहुत भावुक हो गयी थी | आप का तहे दिल से शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
October 10, 2012

ह्रदय स्पर्शी रचना बहुत भावुक बनाने वाला प्रस्तुति करन दिव्या ,इसी लिए मैंने श्राद्ध वाले ब्लॉग में ये बात लिखी थी कोई आये थामे इसे कर दे उसका उद्धार जैसे कभी थामी थी वो उँगलियाँ नरम नाजुक नन्ही हथेलियाँ थमा था कई बार जिसे थपका था कई बार जिसे आज वो काँप रही है कोई नहीं जो थामे उसे

    div81 के द्वारा
    October 13, 2012

    आदरणीया निशा जी, सादर प्रणाम पिछले साल भी आपने श्राद्ध पर एक ब्लॉग लिखा था और इस बार भी लिखा हालत वो ही है या कहे की बत्तर हुए है जिन बुजुर्गो के छत्रछाया में सुकून और आराम है उन्ही को घर से बेदखल कर दिया जा रहा है और भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है | बहुत ही निंदनीय है ये सब …………… आप का शुक्रिया

    nishamittal के द्वारा
    October 14, 2012

    दिव्या श्राद्ध पर ब्लॉग गत वर्ष नहीं उससे पूर्व वर्ष लिखा था परन्तु जिस बात को पद्य में तुमने इतनी अच्छी तरह सुन्दर भावों के साथ व्यक्त किया है,वो निस्संदेह प्रभावशाली है और एक कठिन कार्य ही है .


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