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तलाश

Posted On: 4 Dec, 2012 Others में

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आज जब मैं निकली
खोये हुए अपने
ज़मीर कि तलाश में
तो चाह मैंने अपनी
रूह को जगाना
कभी मिन्नते दे कर
और कभी लानत दे कर
जो चाह मैंने उसको
जगाना तो पाया
मेरी रूह बहुत जख्मी थी
कुछ जख्म सुख चुके थे
मगर कुछ ताजा
और हरे भी थे
मेरी रूह सिसक ही तो रही थी
तभी मेरा ध्यान पास आते
एक बच्चे पर गया
भिखारी था शायद
या पास की ही
मलिन बस्ती का
बच्चा था वो
मेरी ही तरफ
वो बढ़ रहा था
रूखे होठ, पिचके गाल
मैले कुचले कपडे
बदहाल सा वो
मेरी ही जानिब तो
वो बढ़ रहा था
मैंने निगाह चुरा के
नाक सिकुड के
उसके पास आने
कुछ मांगने से पहले
तेजी से कदम
आगे बढ़ा लिए
बच गयी
आज फिर मैं
और मेरी रूह के
जिस्म में
एक नयी चोट
उभर आई
और मेरा जमीर
फिर से आज
मुझे नहीं मिला
कहीं आपको मिले
तो बताना
मैं उसकी तलाश में हूँ
cripple1


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48 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

alkargupta1 के द्वारा
December 14, 2012

दिव्याजी, आज ज़मीर वाकई कहीं अँधेरी गलियों में खो गया है….श्रम और प्रयत्न से कहीं मिलें जो जारी है…. और जिन्हें मिल गया वह आज इंसान नहीं कोई फ़रिश्ता ही होगा………….. उत्कृष्ट रचना के लिए बधाई

Arunesh Mishra के द्वारा
December 10, 2012

बहुत खूब दिव्या जी…

Rajesh Dubey के द्वारा
December 9, 2012

जमीर तो किसी के पास नहीं है. सबको अपनी-अपनी जमीर की तलाश है. सुन्दर कविता, बधाई.

ANAND PRAVIN के द्वारा
December 8, 2012

दिव्या दीदी, सादर प्रणाम तलाश आपकी हमें भी तरास गई, यह आपके ही कलमों की जादूगरी है शायद………….. बहुत ही सुन्दर ……..समाज विदुषियों के ही आवाह्नों को आज तलाश कर रहा है क्योंकी उन्होंने ही आज समाज से मुंह मोड़ा हुआ है……मैं महिला शक्तियों को कोस नहीं रहा अपितु उन्हें उनके सामर्थ को दिखाने की अपील कर रहा हूँ………..आ अवश्य इस अपील की अग्रदूत हैं…………जोरदार लेखनी पर हार्दिक आभार

rekhafbd के द्वारा
December 7, 2012

दिव्या जी और मेरा जमीर फिर से आज मुझे नहीं मिला कहीं आपको मिले तो बताना मैं उसकी तलाश में हूँ,खूबसूरत रचना हार्दिक बधाई

Mohinder Kumar के द्वारा
December 7, 2012

दिव्या जी, जो आपने इस कविता के माध्यम से दर्शाया है वह हम में से हर एक ने कभी न कभी महसूस किया है और न जाने क्यों रूह की बात को न मान कर, नजरें चुरा कर आगे निकल गये हैं. शायद मानसिक तौर पर कभी ठगे जाने की छाप हमें भाव हीन कर देती है. लिखती रहिये.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
December 7, 2012

तलाश जारी है

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
December 7, 2012

बड़ी जादुई कलम है आपकी दिव्या जी . तलाश जारी है … कृपया हमरी पोस्ट्स का भी अवलोकन करने की कृपा करें : http://www.praveendixit.jagranjunction.com dhanyawaad!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 7, 2012

ऐसा अक्सर हो जाता है. मौके पे इंसान चूक जाता है और कभी न घबराना अब न कोई बहाना अबकी न चुके निशाना सुन्दर रचना बधाई. सस्नेह

Malik Parveen के द्वारा
December 7, 2012

दिव्या जी नमस्कार, बहुत ही सुंदर तरीके से आपने ज़मीर ki halat bayan ki है … hum sab jante हैं samjhte हैं फिर भी khud ही ज़मीर ko छलनी करते हैं हर रोज कितनी दफा करते हैं पता होता है फिर भी करते हैं …….. बधाई आपको सुंदर और भावुक रचना के लिए …

Rahul Vaish के द्वारा
December 7, 2012

धन्यवाद. आपका राहुल वैश्य ( रैंक अवार्ड विजेता), एम. ए. (जनसंचार), एवं भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रयासरत ‘फेसबुक’ पर मुझे ज्वाइन करे : vaishr_rahul@yahoo.com

    Vicki के द्वारा
    October 17, 2016

    There is something about adding candy bars into cookies that get me really fainacsted. I have never tried making any myself. I think it is about time I did. Those cookies look tempting, SRC rocks !

mayankkumar के द्वारा
December 6, 2012

आपका लेख पढ़ कृतज्ञ हुआ ……. कलम का करिष्मा वाकई अद्भुत है …… !! हमारे ब्लाॅग तक भी जावें … !!! सधन्यवाद !!

vaidya surenderpal के द्वारा
December 6, 2012

दिव्या जी , नमस्कार ! बहुत ही अच्छी प्रस्तुति के लिये हार्दिक बधाई.   

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 6, 2012

अति उत्कृष्ट निर्बंध प्रस्तुति के लिए दिव्या जी ! आप को हार्दिक बधाई !

Ashish Mishra के द्वारा
December 6, 2012

मिलता है कहीं-कहीं………… हर कही नहीं हर कहीं मिले तो रंगे दुनिया ही कुछ और हो………. बेहतरीन रचना. http://ashish2012.jagranjunction.com

akraktale के द्वारा
December 6, 2012

दिव्या जी              सादर, सुन्दर रचना हकीकत को बयान कर रही है,बधाई स्वीकारें.

    div81 के द्वारा
    December 6, 2012

    आदरनीय अशोक जी, सादर प्रणाम ! आप का तहे दिल से शुक्रिया

sinsera के द्वारा
December 5, 2012

ज़मीर को ढूंढने की तड़प आपकी कविता में साफ झलक रही है, लेकिन उत्तर भी आपके लेख में ही छुपा है, आपने शायद ध्यान नहीं दिया…. दिव्या जी देखिये वो…… दो छोटे मासूम बच्चे कैसे अपने नादान कांधों पर ज़मीर को सहारा देकर ले जा रहे है…कह नहीं सकती की बड़े हो जाने पर शायद वो ज़मीर का बोझ न उठा सकें और उसे ले जा कर कहीं पटक दें….

    div81 के द्वारा
    December 6, 2012

    आदरणीया सरिता जी, सादर प्रणाम! ध्यान तो दिया है और इस तस्वीर को ढूंडने के चक्कर में पोस्ट तीन दिन देरी से पोस्ट हुई | जो कहना चाह रही थी उसको तस्वीर ने बेहतर तरीके से समझा दिया | और दाद देनी होगी आप के पारखी नजर कि :) अपनी उपस्थिति से ब्लॉग में चार चाँद लगाने के लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया :)

yogi sarswat के द्वारा
December 5, 2012

बच गयी आज फिर मैं और मेरी रूह के जिस्म में एक नयी चोट उभर आई और मेरा जमीर फिर से आज मुझे नहीं मिला दिव्या जी , नमस्कार ! हम में से ज्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं जिनकी रूह इस बात की गवाही देती है की ये भी इसी संसार का प्राणी है , ये भी मानव है किन्तु जेब में हाथ डालते ही उनका भी ध्यान आ जाता है जो घर पर हैं ! हालाँकि हमें इतना निष्ठुर भी नहीं हो जाना चाहिए ! अच्छे लोग ही अछि रचनायें करते हैं जैसे आप ! बहुत दमदार , भावों से ओतप्रोत और कहीं न कहीं दिल की गहराई तक पहुंचे शब्द ! बहुत दिनों के बाद आप को पढने में मिला , और बेहतर मिला ! बधाई , ऐसे शब्द इस मंच तक लाने के लिए !

    div81 के द्वारा
    December 6, 2012

    आदरणीय योगी जी, सादर प्रणाम आत्मा कई बार कचौटती है मगर फिर मोह माया के फेर में उसको थपक के सुला देते है कुछ मजबूरियां है कुछ दिल कि कमजोरी है ये हमारी | मुक्त कंठ से प्रशंसा के लिए आप का ह्रदय से आभार …………

jlsingh के द्वारा
December 5, 2012

आदरणीय दिव्या बहन, सादर अभिवादन! काफी दिनों बाद एक संवेदनशील रचना लेकर उपस्थित हुई! आज फिर मैं और मेरी रूह के जिस्म में एक नयी चोट उभर आई और मेरा जमीर फिर से आज मुझे नहीं मिला ………. सादर बधाई!

    div81 के द्वारा
    December 6, 2012

    आदरणीय भाईसाहब, सादर प्रणाम लंबे अंतराल के बाद जब भी मंच में आई हूँ आप सभी का प्यार और अपनत्व भावविभोर कर जाता है | आप का ह्रदय से आभार हौसला बढती प्रतिक्रिया के लिए और इस अपनत्व के लिए आभार

Santosh Kumar के द्वारा
December 4, 2012

दिव्या बहन ,..सादर अभिवादन अभिनंदनीय रचना ,,..एक सच्ची सरल ह्रदय कवियत्री की चाँद से ज्यादा निर्मल और सागर से गहरी भावनाएं ,.आपको शत शत अभिनन्दन बहन !

    div81 के द्वारा
    December 6, 2012

    आदरनीय भाईसाहब, सदर प्रणाम मुक्त कंठ से प्रशंसा के लिए आप का ह्रदय से आभार भाईसाहब आप कि स्वलिखित कविता जो बहुत ही प्यारी है जिसमे गहरी भावनाओं का समावेश है अगर आप कि इजाजत हो तो उसको मैं सब के साथ साझा करना चाहूंगी :)

    Santosh Kumar के द्वारा
    December 7, 2012

    दिव्या बहन ,.सादर अभिवादन वो लाइनें आपको समर्पित है ,..आपकी हैं ,.आप जो चाहें करें ..सादर

ajaykr के द्वारा
December 4, 2012

दिव्या जी,सचमुच कमाल की रचना …………….बधाई |जमीर तो जगाना हिन् होंगा |

    div81 के द्वारा
    December 6, 2012

    अजय जी सादर नमस्कार ! आप का तहे दिल से शुक्रिया ……. बिलकुल ज़मीर जगाना होगा नहीं तो आगे पछतावो के कुछ नहीं मिलेगा एक बार फिर से आप का शुक्रिया

minujha के द्वारा
December 4, 2012

दिव्या जी,खूबसूरत रचना ,बधाई जमीर तो कब का दफन हो चुंका हमारे अंदर बस उसकी यादें हमें कभी कभी ,उसके अस्तित्व की याद दिला जाती हैं……

    div81 के द्वारा
    December 6, 2012

    आदरणीया मीनू जी, सादर प्रणाम सही कहा आप ने कि जमीर कि यादें उसके अस्तित्व कि याद दिला देती है नहीं तो उसको कब का हम आगे निकलने कि दौड में पीछे छोड़ आये है | आप का बहुत बहुत शुक्रिया

sudhajaiswal के द्वारा
December 4, 2012

दिव्या जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, बदलते वक्त के साथ जमीर को खुदगर्जी ने जगाना छोड़ दिया है, हार्दिक बधाई|

    div81 के द्वारा
    December 6, 2012

    सुधा जी, बदलते हुए वक्त ने बहुत कुछ छिना है उसमे हमारा ज़मीर भी है जो गहरे कहीं दुबक के जा बैठा है | आप का तहे दिल से शुक्रिया

December 4, 2012

बहुत ही अच्छी प्रस्तुति के लिये बधाई

    div81 के द्वारा
    December 5, 2012

    आदरनीय डॉ० हिमांशु शर्मा जी, सादर प्रणाम मेरी कोशिश कि सरहाना के लिए आप का ह्रदय से आभार

sumit के द्वारा
December 4, 2012

काबिल-ऐ-तारीफ रचना,,,,,,, सच में हम सबका ज़मीर कितना ज़ख्मी है ………

    div81 के द्वारा
    December 5, 2012

    सुमित जी आप का तह एडिल से शुक्रिया

abodhbaalak के द्वारा
December 4, 2012

ह्म्म्मम्म, सच है दिव्या जी, आज हम लोग हर रोज़ अपने ज़मीर का सौदा करते हैं, और अगर वो जागने की कोशिश करता है तो थपक थापक कर सुला देते हैं, ये है नए युग की दें जहाँ हर कोई अपने आपमें …… दिल को छू लेने वाली रचना, सदा की तरह

    div81 के द्वारा
    December 5, 2012

    अबोध बालक जी, सादर प्रणाम, आप का मंच में और ब्लॉग में एक बार फिर से स्वागत है | बहुत सयम के पश्चात आप की प्रतिक्रिया प्राप्त हुई……  सुखद अनुभिती हुई   सही कहा आपने हम लोग रोज ही अपने ज़मीर का सौदा करते है और कभी ज़मीर जागने लगता है तो उसको सुला देते है …. इसी बात का अफ़सोस है आप को मेरी कोशिश पसंद आई आप का तहे दिल से शुक्रिया ………………. मंच में सभी को आप के लेख का इन्तजार है आप कब वापसी कर रहे है …. एक बार फिर से आप का तहे दिल से शुक्रिया

mayankkumar के द्वारा
December 4, 2012

आपका लेख वाकई नज़रों को आपकी कलम की ओर खींचता प्रतीत होता है …… सधन्यवाद … !!

    div81 के द्वारा
    December 5, 2012

    मयंक कुमार जी, सादर थोडा बहुत लिख लेती हूँ … खुले दिल से कि गयी आप कि प्रशंसा के लिए आप का ह्रदय से आभार …

shalinikaushik के द्वारा
December 4, 2012

sundar bhavabhivyakti badhai

    div81 के द्वारा
    December 5, 2012

    आप का तहे दिल से शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
December 4, 2012

एक सुन्दर प्रतीकात्मक प्रस्तुति पर बधाई दिव्या दिल को छूने वाली रचना. आज फिर मैं और मेरी रूह के जिस्म में एक नयी चोट उभर आई और मेरा जमीर फिर से आज मुझे नहीं मिला

    div81 के द्वारा
    December 5, 2012

    आदरणीया निशा मैम, सादर प्रणाम आप को मेरी कोशिश पसंद आई इस सराहना  के लिए आप का ह्रदय से आभार


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