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मौन तोडिये कि हम जिन्दा है

Posted On: 19 Jul, 2014 Others में

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बेटियां माँ के गर्भ मे सुरक्षित नहीं है, महिलाये घर और बाहर सुरक्षित नहीं है, लड़कियों के मन मे हमेशा असुरक्षा की भावना रहती है , हमारे घर परिवार मे बच्चे लड़कियाँ सुरक्षित नहीं है चाहे कोई अपना करीबी उसके साथ शोषण करे या बाहर का मगर बच्चे भी सुरक्षित नहीं है ये किस तरह के समाज का निर्माण हो गया जिसमे हम रह रहे है जिस समाज में हम रह रहे है उस समाज को विकसित/ विकासशील समाज कहेंगे पर क्या सच में हम एक विकसित समाज का हिस्सा है क्या सच में विकसित मानसिकता वाले लोग रह रहे है ???क्या ऐसे ही समाज को विकसित कहते है जहाँ लड़कियां कहीं भी सुरक्षित नहीं स्कूल, कॉलेज, रास्तों में ऑफिस में, सिनेमाहाल में ट्रेन, बस टेम्पो ओटो कहीं भी तो सुरक्षा की गारंटी नहीं देता ये समाज लड़कियों को | फिर कैसे कहें की हम विकसित समाज में रहते है |
दिनोदिन बढती जा रही बलात्कार की घटनाएं अब उन घटनाओ ने एक विकृत सा रूप इख्तियार कर लिया है बलात्कार के बाद दरिंदगी की सारी सीमाए पार कर उन्हें मार देना वो भी अमानवीयता के साथ | बलात्कार की घटना चाहे दिल्ली में घटित हो या किसी छोटे से गाँव में दहशत में हर एक वो इन्सान आ जाता है जो किसी बहन का भाई है किसी का पति हो किसी का पिता हो या पूरा नारी समाज क्यों की ये एक घटना नहीं ये संख्या है जो दिनोदिन बढती जा रही है | आज किसी के साथ हुआ है कल वो ….. किसी के साथ भी तो हो सकता है न वो कल
रोज के अख़बार में ये ही सब है, रोज के समाचार चैनल्स में यही सब है | गाँव कस्बे शहर कहीं कोई जगह सुरक्षित नहीं लड़कियों के लिए इतना कुछ देखने सुनने में आ रहा है फिर भी हम चुप शांत है | कहते है जब पडोसी के घर में आग लगी हो तो अपने घर तक लपटें पहुँचने में देरी नहीं लगती मगर हैरानी की बात है रोज कोई बलात्कार की खरब हम तक पहुँच रही है फिर भी हम सब शांत है हमारे अंदर का विद्रोह क्यों दिन-ब-दिन कम होता जा रहा है ?? क्यों सहने की आदत सी पड़ गयी है हम में ?? क्यों आँखे खुली होते हुए भी हम चिर निंद्रा की सी कैफियत में जी रहे है ?? क्या होता जा रहा है हमारे समाज को ??? क्यों बेटियां लड़कियां या कहूँ नारी जाति पर इस तरह की हैवानियत हो रही है ?? क्यों अत्याचार बढ़ते जा रहे है ??
कन्याओं को, लड़कियों को, नारियों को देवी रूप में देखने पूजने वाला समाज कब ऐसे समाज में तब्दील हो गया जहाँ रोज उसके साथ हैवानियत का खेल हो रहा है
मैं सभी पुरुष वर्ग को कटघरे में नहीं खडा कर रही हूँ मगर ये जो एक तबके का पुरुष है जो गाहे बगाहे अपना पौरुष लड़कियों पर दिखाने लगा है उस तबके के पुरुष हमारे समाज में कहाँ से आ गए है जो लड़कियों को चौक चौराहों में घर में पड़ोस में कहीं भी नग्न कर देता है अपनी हैवानी नजरो से अपनी पाशविक हरकतों से गंदे इशारो अश्लील फब्तियों से
रेप बलात्कार ये शब्द आज किसी बच्चे से भी पूछो तो वो भी जनता है इनका क्या अर्थ है …. लड़कियां क्यों हमारे समाज में भोग की वस्तु बन गयी है | दिल्ली रेप केस जिसे कई नाम दिए गए दामिनी के नाम से कई योजनाये शुरू करी गयी जब दिल्ली रेप केस हुआ था तो दिल्ली ही नहीं पूरा भारत जाग गया था बेहोशी तोड़ी थी हर हाथ ने केंडल लेकर मार्च किया था हर कोई चाहता था दरिन्दे बलात्कारियों को फांसी की सजा दी जाए | तवरित कार्यवाही हो पर हमारा कानून वो अपने नियमो से चलता है वो ये नहीं जनता की एक लड़की के साथ बलात्कार सिर्फ एक बार नहीं होता है वो एक लड़की के साथ नहीं होता है उसके साथ उसके शारीर के साथ उसकी आत्मा भी इस दंश को पल पल झेलती है | एक पूरा परिवार उसके अरमान सपने सबके साथ ही तो बलात्कार होता है … क्या आप को लगता है वो लड़की वो परिवार इस सदमे से उभर पाता होगा वो वहशी छुवन क्या वो लड़की भुला पाती होगी …. हर एक नजर में वो खुद के लिए बलात्कार होने का अंश देखती होगी |
दामिनी ने जगा दिया था पर हम फिर से सो गए है हम डरते तो है ये घटना हमारे साथ हमारे अपनों के साथ न हो जाए पर हम चुप रहते है कुछ कहते नहीं ये मौन ये ख़ामोशी को तोड़ने का वक़्त है एक आवाज बनने का वक़्त है जिसमे गूंज हो तो सिर्फ इस बात की “नहीं स्वीकार हमें हमारे समाज में ऐसे दरिन्दे जो बहन बेटी माँ की इज्जत नहीं करना जानते है” जिनकी सोच हरकते जानवरों से भी बत्तर हो गयी है | उन्हें जीने का अधिकार नहीं फांसी की सजा भी मिले तो त्वरित कार्यवाही के साथ | मानवाधिकार और कानून की नजर में एक बार सुधरने का जीने का हक मिलता है हर अपराधिक को मेरा ये सवाल उन जैसी सोच वालो से ही है की जब लड़की के साथ हैवानियत होती है उसके प्राइवेट पार्ट को क्षत-विक्षप्त कर दिया जाता है, बलात्कार के बाद उन्हें पेड़ पर लटका दिया जाता है या किसी चौराहे खेत खलिहान पर अधमरा छोड़ दिया जाता है मरने के लिए क्या ऐसे वहशियों को समाज में जीने का अधिकार है क्या उनको एक और मौका मिलना चाहिए ??क्या यही सब आप के परिवार के साथ हो तो भी ये ही सोच होगी की जीने का मौका मिले दरिंदो को
हमेशा माँ बाप इस डर में जीते है की कहीं उनकी बेटी की तरफ कोई गलत नजर न उठे, कोई हादसा ऐसा न हो की बेटियां के होठो से मुस्कराहट छीन जाए या कुछ ऐसा की कल उनके जीने की आरजू ही न ख़त्म हो जाए इस डर के साए में आज हर माँ बाप है इस डर से बेहतर है हमें उस डर को खत्म कर दें जो हमें सोते जागते हर समय परेशां कर रहा है | हाथो में केंडल ले कर निकलने से कुछ नहीं होगा ,घर चौराहों, ऑफिस की बहस में भी इसका हल नहीं निकलने वाला अपनी सोई आत्मा को, डर को दिल से निकालना होगा, जगाना होगा |
चुभने लगता है ये आक्रोश जब हम बहुत जोश के साथ निकलते है और फिर वो आवाज कब ख़ामोशी इख़्तियार कर लेती है क्यों चुप्पी साध लेते है कुछ दिनों के बाद क्या कर लोगे चौक चौराहे में जाके मोमबत्ती जला के या एक पीडिता के लिए संवेदना स्वरूप मौन प्रदर्शन करके क्यूँ नहीं प्रतिकार करते हो जब कोई मनचला छेड़ता है लड़की को क्यूँ नहीं आवाज बुलंद करते हो? जब घर में ही निकलता है घृणित मानसिकता का कोई तो क्यूँ हो जाते हो खामोश? क्यूँ ये ख़ामोशी किस लिए? ये उदासीनता अब तोड़नी होगी इसे एक आग एक आक्रोश धधकती रहनी चाहिए तब तक जब तक की खत्म न हो जाए समाज से पाशविक, विकृति मनोवृति वाले वहशी लोग
लड़कियों तुम कमजोर नहीं हो तुम्हरी आत्मा को कोई छलनी कर रहा है तुम मार दो, बन जाओ अब रणचंडी दुर्गा जिसके सामने दैत्य भी हारे है …

लड़ना होगा आप ही, और लड़ेगा कौन
शस्त्र उठाओ नारियों, तोड़ो अब तो मौन



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39 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

दिव्या के द्वारा
July 30, 2014

नेट की समस्या के कारण मैं समय पर अपना आभार व्यक्त नहीं कर पाई | अभी भी नेट बहुत स्लो है और कमेंट जा ही नहीं रहा | एक प्रयास कर रही हूँ … आप की प्रतिक्रिया और शुभकामनाओ के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया

    Jean के द्वारा
    October 17, 2016

    M.W. : Faulkner stole the title THE SOUND AND THE FURY from Shaasepekre. Although he was smart enough to steal only the very best, I don’t think he should get the credit for the brilliance of that title.

anuradha के द्वारा
July 30, 2014

बहुत सही लिखा आपने…मौन तो टूटना ही चाहिए और साथ ही कड़ी सजा भी ऐसे दरिंदों के लिए…आपको ढेर साड़ी शुभकामनायें. अनुराधा

    anuradha के द्वारा
    July 30, 2014

    बहुत सही लिखा आपने…मौन तो टूटना ही चाहिए और साथ ही कड़ी सजा भी ऐसे दरिंदों के लिए…आपको बहुत बहुत शुभकामनाये अनुराधा

Santlal Karun के द्वारा
July 29, 2014

आदरणीया दिव्या जी, “मैं सभी पुरुष वर्ग को कटघरे में नहीं खडा कर रही हूँ मगर ये जो एक तबके का पुरुष है जो गाहे बगाहे अपना पौरुष लड़कियों पर दिखाने लगा है उस तबके के पुरुष हमारे समाज में कहाँ से आ गए है जो लड़कियों को चौक चौराहों में घर में पड़ोस में कहीं भी नग्न कर देता है अपनी हैवानी नजरो से अपनी पाशविक हरकतों से गंदे इशारो अश्लील फब्तियों से |” … आप के द्वारा पस्तुत तथ्य अत्यंत विचारणीय हैं | आप ने गम्भीरातापूर्वक और प्रभावशाली ढंग से तथ्यों को उठाया है | … इस महत्त्वपूर्ण आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के चयन पर हार्दिक बधाई !

    div81 के द्वारा
    July 30, 2014

    आदरणीय आप की शुभकामनाओ और कीमती प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रिया

yamunapathak के द्वारा
July 28, 2014

दिव्या जी बेस्ट ब्लॉगर के रूप में चयनित होने की बहुत बहुत बधाई….

    div81 के द्वारा
    July 30, 2014

    आदरणीया यमुना जी आप की शुभकामना के लिए आभार

sanjay kumar garg के द्वारा
July 28, 2014

सशक्त आलेख, आदरणीया दिव्या जी, आभार!

    div81 के द्वारा
    July 30, 2014

    आ० संजय जी आप का तहे दिल से शुक्रिया

rita singh 'sarjana' के द्वारा
July 27, 2014

बहुत-बहुत बधाई दिव्या

    div81 के द्वारा
    July 30, 2014

    रीता दी आप का तहे दिल से शुक्रिया

rekhafbd के द्वारा
July 26, 2014

बहुत बहुत बधाई दिव्या

    div81 के द्वारा
    July 30, 2014

    आ० रेखा मैम आप का तहे दिल से शुक्रिया

sumit के द्वारा
July 26, 2014

बधाई दिव्या

    div81 के द्वारा
    July 30, 2014

    आप का तहे दिल से शुक्रिया

gchakravorty के द्वारा
July 26, 2014

हमे लगता है कि आज वर्तमान साय मे हमारे घर की वहु वेटियाँ पूर्व काल से भी कहीं अधिक असुरक्षित हैं, जबकि आज हमारा मानव समाज पूर्व से अधिक उन्नत एवं आत्म निर्भर है।

    div81 के द्वारा
    July 30, 2014

    सहमत आप से … सोच विकृत होती जा रही है समाज की ,,,.. आप का तहे दिल से शुक्रिया

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 26, 2014

दिव्या जी  शसक्त  लेख हर नारी चंडी नहीं बन सकती अपने स्वरूप को समझते ही व्यवहार करना बुद्धीमानी होगी क्या नर क्या नारी सभी समान रूप सॆ बलात्कार के शिकार होते हैं रूप अलग अलग होते हैं मनुष्य हैं जरूर किंतु जानवरो से ही बने हैं कभी बलात्कार किया कभी झेला ओम शांति शांति शांति ही जप सकते हैं 

    दिव्या के द्वारा
    July 30, 2014

    अपना समय और प्रतिक्रिया के लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया

pkdubey के द्वारा
July 26, 2014

लड़ेगा कौन शस्त्र उठाओ नारियों, तोड़ो अब तो मौन | अवश्य २-४ कटे जायेंगे,तो खौफ फैलेगा जनता में | और मीडिया को भी , रेपिस्ट को काटे जाते हुए समाचार बताना चाहिए|

    दिव्या के द्वारा
    July 30, 2014

    आप की शुभकामनाओ के लिए तहे दिल से शुक्रिया

jlsingh के द्वारा
July 26, 2014

बहुत बहुत बधाई दिव्या बहन आलेख सशक्त था तो बेस्ट ब्लॉगर का सम्मान तो मिलना ही चाहिए. आजकल इस मंच पर आपकी सक्रियता काम हो गयी है पर बीच बीच में इसी प्रकार अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज कराएं! पुन::सादर बधाई!

    दिव्या के द्वारा
    July 27, 2014

    आदरणीय भाई साहब आप की शुभकामनाओ के लिए तहे दिल से शुक्रिया

sadguruji के द्वारा
July 25, 2014

ये उदासीनता अब तोड़नी होगी इसे एक आग एक आक्रोश धधकती रहनी चाहिए तब तक जब तक की खत्म न हो जाए समाज से पाशविक, विकृति मनोवृति वाले वहशी लोग लड़कियों तुम कमजोर नहीं हो तुम्हरी आत्मा को कोई छलनी कर रहा है तुम मार दो, बन जाओ अब रणचंडी दुर्गा जिसके सामने दैत्य भी हारे है … लड़ना होगा आप ही, और लड़ेगा कौन शस्त्र उठाओ नारियों, तोड़ो अब तो मौन ! बहुत सार्थक और शिक्षाप्रद लेख ! इस उत्कृष्ट रचना के लिए और “बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक” चुने जाने की बधाई !

    दिव्या के द्वारा
    July 27, 2014

    आदरणीय सदगुरु जी, आप का तहे दिल से शुक्रिया

yogi sarswat के द्वारा
July 23, 2014

चुभने लगता है ये आक्रोश जब हम बहुत जोश के साथ निकलते है और फिर वो आवाज कब ख़ामोशी इख़्तियार कर लेती है क्यों चुप्पी साध लेते है कुछ दिनों के बाद क्या कर लोगे चौक चौराहे में जाके मोमबत्ती जला के या एक पीडिता के लिए संवेदना स्वरूप मौन प्रदर्शन करके क्यूँ नहीं प्रतिकार करते हो जब कोई मनचला छेड़ता है लड़की को क्यूँ नहीं आवाज बुलंद करते हो? जब घर में ही निकलता है घृणित मानसिकता का कोई तो क्यूँ हो जाते हो खामोश? क्यूँ ये ख़ामोशी किस लिए? ये उदासीनता अब तोड़नी होगी इसे एक आग एक आक्रोश धधकती रहनी चाहिए तब तक जब तक की खत्म न हो जाए समाज से पाशविक, विकृति मनोवृति वाले वहशी लोग लड़कियों तुम कमजोर नहीं हो तुम्हरी आत्मा को कोई छलनी कर रहा है तुम मार दो, बन जाओ अब रणचंडी दुर्गा जिसके सामने दैत्य भी हारे है … हिम्मत दिखानी होगी लड़कियों और महिलाओं को ! ठीक है , आप कह सकते हो पुरुष कहाँ गए ? लेकिन ये ऐसा मामला है जहां महिलाओं को कमान थामनी होगी , पुरुष उसके पीछे चलेगा और मुझे लगता है पुरुष इस युद्ध में महिलाओं के पीछे चलने को तैयार हैं ! उठो तो सही , चलो तो सही , बढ़ो तो सही , आवाज़ उठाओ तो सही , कब तक सरकार , पुलिस और महिला संगठनों के सहारे बैठे रहोगे ? सशक्त लेखन के साथ आपका स्वागत है दिव्या जी !

    दिव्या के द्वारा
    July 27, 2014

     अब चुप बैठने का समय नहीं न महिलाओं के लिए …सहमती के लिए दिल से आभार आपका योगी जी,

sudhajaiswal के द्वारा
July 22, 2014

दिव्या जी, बुराई का प्रतिकार किये बिना बुरे नहीं मिटती, आपके विचारों से पूर्ण सहमति है|

    दिव्या के द्वारा
    July 27, 2014

    … हर युग में बुराई रही है और उसका विनाश दमन भी हुआ है अब सभी नारियों को एक शक्ति बन के आना चाहिए जो विनाश करे ऐसे विकृत मानसिक लोगो का … शुक्रिया सुधा दी,

jlsingh के द्वारा
July 21, 2014

लड़कियों तुम कमजोर नहीं हो तुम्हरी आत्मा को कोई छलनी कर रहा है तुम मार दो, बन जाओ अब रणचंडी दुर्गा जिसके सामने दैत्य भी हारे है … लड़ना होगा आप ही, और लड़ेगा कौन शस्त्र उठाओ नारियों, तोड़ो अब तो मौन http://jlsingh.jagranjunction.com/2013/01/14/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%97-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%93/

    दिव्या के द्वारा
    July 27, 2014

    शुक्रिया भाई साहब आपका

deepak pande के द्वारा
July 20, 2014

NAARI KO AB SWAYAM HEE SAMBHALNA HOGA KOI MARD (NAMARD) SAHAYTA KO AANE WALA NAHEE

    दिव्या के द्वारा
    July 27, 2014

    दीपक जी आक का शुक्रिया

nishamittal के द्वारा
July 19, 2014

सुन्दर आलेख ,हर संवेदनशील व्यक्ति की भावनाओं और आक्रोश को अभिव्यक्त करता हुआ

    दिव्या के द्वारा
    July 27, 2014

    अब ये आक्रोश शब्दों में ही नहीं हकीकत में भी दिखाने का वक्त आ गया है | आप का तहे दिल से शुक्रिया मैम


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